गौ-रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले जालोर के लोकदेवता, आज भी सांथू गांव नमन करता है उनकी वीरता और बलिदान

गौ-रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले जालोर के लोकदेवता, आज भी सांथू गांव नमन करता है उनकी वीरता और बलिदान


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Veer Fatta Ji Jalore: जालोर के सांथू गांव से जुड़े वीर फत्ता जी को स्थानीय स्तर पर गौ-रक्षा और वीरता के लिए याद किया जाता है. लोक मान्यता के अनुसार, उन्होंने गौ-रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे. उनके बलिदान और साहस की स्मृति आज भी गांव में श्रद्धा के साथ जीवित है.

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जालौर: राजस्थान के लोकदेवताओं की बात हो और जालोर के वीर फत्ता जी का नाम न आए, ऐसा हो नहीं सकता. खास बात यह है कि वीर फत्ता जी की पहचान सिर्फ एक लोकदेवता के रूप में नहीं है, राजस्थान सामान्य ज्ञान की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए भी उनका नाम खास महत्व रखता है. प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है कि गौ-रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले वीर फत्ता जी का मंदिर कहां स्थित है? इसका जवाब है जालोर जिले का सांथू गांव.

स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, वीर फत्ता जी का जन्म जालोर के सांथू गांव में राजपुरोहित गज्जाराणी परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम गजसिंह जी बताया जाता है. फत्ता जी साहसी होने के साथ घुड़सवारी और शस्त्र विद्या में भी निपुण थे. कहा जाता है कि करीब 60 वर्ष की उम्र में भी उनकी फुर्ती और युद्ध कौशल किसी युवा योद्धा से कम नहीं था.

मार गिराया और बाकी लुटेरे वहां से भाग गए
उनकी वीरगाथा उस दौर से जुड़ी बताई जाती है, स्थानीय निवासी भगवान सिंह ने लोकल18 को जानकारी दी कि जब इलाके में लुटेरों का आतंक था. एक दिन लुटेरों ने सांथू गांव के बाहर फत्ता जी के खेतों पर हमला किया और उनकी गायों को हांककर ले जाने की कोशिश की. जैसे ही फत्ता जी को इसकी खबर मिली, वे अकेले ही उनका सामना करने पहुंच गए. लोककथा के अनुसार, उन्होंने लुटेरों के मुखिया को मार गिराया और बाकी लुटेरे वहां से भाग गए.

अकेले ही हमलावरों का सामना किया
इसके बाद मामला और बढ़ गया. भागे हुए लुटेरों ने देलदरी गांव के कुछ काबावत राजपूतों के साथ मिलकर फत्ता जी पर दोबारा हमला किया. बताया जाता है कि करीब 25 से 30 हमलावरों ने उन्हें घेर लिया. इसके बावजूद फत्ता जी पीछे नहीं हटे. अपनी घोड़ी पर सवार होकर उन्होंने अकेले ही हमलावरों का सामना किया और कई दुश्मनों को मार गिराया.

अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचते
नीलकंठ मंदिर के रास्ते के पास हुए इस संघर्ष में फत्ता जी वीरगति को प्राप्त हुए. लोकमान्यता में उन्हें झुंझार वीर के रूप में भी याद किया जाता है. उनके इसी साहस और गौ-रक्षा के लिए दिए बलिदान ने उन्हें लोकआस्था में विशेष स्थान दिलाया. आज सांथू गांव में वीर फत्ता जी का भव्य मंदिर बना हुआ है. हर साल भाद्रपद शुक्ल नवमी यानी भादवे की नौम को यहां मेला भरता है. जालोर और आसपास के क्षेत्रों के साथ मारवाड़ के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और फत्ता जी के दरबार में धोक लगाते हैं.



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