राहुल गांधी की आकाशवाणी कैम्पस के अंदर पेड़ के नीचे बैठे हुए तस्वीर मीडिया की सुर्खियों में बनी रही. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और SIR के मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग तक मार्च कर रहे राहुल की भिड़ंत पुलिस से हो गई और उन्हें रोक दिया गया. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा किसी तरह आकाशवाणी भवन के परिसर में प्रवेश करने में कामयाब रहे, जहां उन्होंने और अन्य विपक्षी नेताओं ने कई घंटे तक धरना दिया. पुलिस ने आखिरकार उन्हें वहां से हटाया और हिरासत में ले लिया. बाद में रिहा कर दिया गया. बीजेपी ने राजनीतिक ड्रामा और अराजकता करार दिया लेकिन राहुल का यै पैटर्न नया नहीं है. पिछले 15 सालों से वह इसी तरीके से विरोध का तरीका अपना रहे हैं. यह काम भट्टा पारसौल से लेकर आकाशवाणी तक कायम है.
राहुल गांधी वैसे तो 2004 में सांसद बन गए थे लेकिन 2011 में एक आंदोलन से वह सड़कों पर उतरकर लड़ने वाले नेता बने. इन सभी घटनाओं में एक साफ पैटर्न दिखाई देता है. राहुल गांधी की राजनीतिक लड़ाइयां बेशक बदलती हैं लेकिन बैरिकेड पार करने का उनका तरीका नहीं बदलता है. भट्टा परसौल में गांधी मोटरसाइकिल पर पुलिस को चकमा देकर निकल गए थे. मंदसौर में उन्होंने तमाम पाबंदियों के बावजूद राज्य की सीमा पार करने की कोशिश की. हाथरस में गाड़ी रोके जाने के बाद वह पैदल ही आगे बढ़ते रहे. ईडी के विरोध प्रदर्शनों के दौरान, वह विजय चौक पर बैठ गए और आसानी से तितर-बितर होने से इनकार कर दिया. और आकाशवाणी भवन में, पुलिस की तरफ से मार्च को कंट्रोल किए जाने के बाद उन्होंने आगे बढ़ने का एक और रास्ता ढूंढ लिया.
2011: भट्टा परसौल से इस तरीके की शुरुआत
विपक्ष का नेता बनने से बहुत पहले, राहुल गांधी कांग्रेस के एक युवा महासचिव और अमेठी से सांसद थे. मई 2011 में वह यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चल रहे किसानों के आंदोलन के लिए ग्रेटर नोएडा के भट्टा परसौल पहुंचे. प्रशासन ने भारी पुलिस बल तैनात किया था. इसके बावजूद गांधी सुबह करीब 4 बजे एक मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर गांव में घुसने में कामयाब रहे. ऐसा बताया जाता है कि पुलिस के होश उड़े हुए थे और उन्होंने राहुल गांधी को तब पहचाना जब वह किसानों से मिलने लगे.
उन्होंने पूरा दिन किसानों से मिलने, उनकी शिकायतें सुनने और धरने पर बैठने में बिताया. गांधी ने कहा था कि यहां पर जो हुआ है, उसे देखने के बाद मुझे खुद को भारतीय कहते हुए शर्म आती है. उन्होंने तत्कालीन मायावती सरकार पर ग्रामीणों पर अत्याचार करने का आरोप लगाया था. उन्होंने प्रदर्शनकारियों से यह भी कहा था कि जब तक आपकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं, मैं आपके साथ हूं.
यह टकराव उस रात तब खत्म हुआ जब यूपी पुलिस ने सीआरपीसी की धारा 151 के तहत राहुल गांधी को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें प्रदर्शन स्थल से दूर ले जाया गया और बाद में रिहा कर दिया गया. भाजपा ने उनके इस कदम को राजनीतिक ड्रामा और स्टंट करार दिया था. बीजेपी नेता राजनाथ सिंह ने तर्क दिया था कि कांग्रेस अगर वाकई में किसानों की मदद करना चाहती है, तो तत्कालीन यूपीए सरकार को पेंडिंग पड़े भूमि अधिग्रहण विधेयक को आगे बढ़ाना चाहिए था.
यह एक ऐसे राजनीतिक पैटर्न की शुरुआती मिसाल थी जो बार-बार दोहराया जाने वाला था. राहुल गांधी पुलिस के घेरे को पार करते हैं, विवाद की जड़ में मौजूद लोगों तक पहुंचते हैं, उनके साथ बैठते हैं, और आखिरकार हिरासत में ले लिया जाना उनके पॉलिटिकल मैसेज का हिस्सा बन जाता है. अब 14 साल के बाद आकाशवाणी पर भी यह तरीका बिल्कुल वैसा ही नजर आया. बस फर्क इतना था कि मोटरसाइकिल की जगह एक छोटे से गेट ने ले ली थी.
2016: OROP, एक अस्पताल और एक और हिरासत
नवंबर 2016 में ‘वन रैंक वन पेंशन’ (OROP) को लेकर हुए विवाद के बीच आत्महत्या करने वाले रिटायर्ड सैनिक राम किशन ग्रेवाल के परिवार से मिलने के लिए दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल जाने के बाद गांधी को हिरासत में ले लिया गया था. गांधी को अस्पताल के पास रोका गया और हिरासत में ले लिया गया. यह घटना तब बेहद नाटकीय हो गई जब ग्रेवाल के परिवार के सदस्यों को भी हिरासत में ले लिया गया. मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के अंदर राहुल ने एक अधिकारी से उस पूर्व सैनिक के परिजन के साथ किए जा रहे बर्ताव को लेकर तीखा सवाल किया.
राहुल ने सख्ती से पूछा कि शर्म नहीं आती आपको? आप एक जवान जो मर गया है उसकी फैमिली को उठा कर लाए हैं. क्या जुर्म है उनका? इसके बाद इस मुद्दे पर हो रहे प्रदर्शनों में हिस्सा लेते समय राहुल को फिर से हिरासत में ले लिया गया. राहुल गांधी और कांग्रेस ने इस पुलिस कार्रवाई को पूर्व सैनिकों के साथ खड़े होने से रोकने की कोशिश के तौर पर पेश किया. वहीं दूसरी तरफ सरकार और बीजेपी का तर्क था कि कानून-व्यवस्था की स्थिति की वजह से यह प्रतिबंध लगाना जरूरी था.
2017 का मंदसौर आंदोलन
अगले साल राहुल गांधी फिर से एक किसान आंदोलन की ओर निकल पड़े. जून 2017 में मध्य प्रदेश के मंदसौर में एक आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी में पांच किसानों की मौत हो गई थी. राहुल ने मारे गए लोगों के परिवारों से मिलने के लिए जिले में घुसने की कोशिश की. स्थानीय प्रशासन ने उन्हें अनुमति देने से इनकार कर दिया था. उन्हें सीआरपीसी की धारा 151 के तहत नीमच के पास राजस्थान-मध्य प्रदेश की सीमा पर गिरफ्तार कर लिया गया. हिरासत में लिए जाने के बाद राहुल ने कहा कि मैं सिर्फ किसानों से मिलना चाहता हूं. भाजपा ने पॉलिटिकल टूर करने और फोटो खिंचवाने का माहौल बनाने का तंज किया.
2020 का हाथरस कांड
अगर भट्टा परसौल ने इस पैटर्न की नींव रखी थी, तो हाथरस ने इसकी सबसे शक्तिशाली मिसाल को जन्म दिया. अक्टूबर 2020 में 19 साल की एक दलित महिला की कथित तौर पर रेप और मारपीट के बाद मौत के बाद, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा हाथरस की ओर निकले थे. उनके काफिले को यमुना एक्सप्रेसवे पर रोक दिया गया. भाई-बहन पैदल ही आगे बढ़े. पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की. इस टकराव के दौरान राहुल गिर पड़े और आकिरकार उन्हें हिरासत में ले लिया गया.
2022 में ED दफ्तर से विजय चौक तक
नेशनल हेराल्ड मामले ने टकराव का एक और रूप सामने ला दिया. नेशनल हेराल्ड से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पूछताछ के लिए गांधी जून 2022 में प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेश हुए. इसके विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं ने बाहर प्रदर्शन किया. ईडी दफ्तर की ओर मार्च करने के प्रयासों के दौरान कई नेताओं को हिरासत में ले लिया गया.
एक महीने बाद, सोनिया गांधी से ईडी की तरफ से हो रही पूछताछ के खिलाफ कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के दौरान गांधी को खुद भी हिरासत में ले लिया गया था. 26 जुलाई को गांधी और अन्य कांग्रेस सांसदों ने विजय चौक पर धरना दिया और राष्ट्रपति भवन की ओर मार्च करने की योजना बनाई. दिल्ली पुलिस ने उन्हें रोक दिया और कई नेताओं को हिरासत में ले लिया. कांग्रेस ने संस्थानों के दुरुपयोग का आरोप लगाया.
2026 में पीएम आवास, संसद, प्रदर्शन
अब 2026 तक राहुल गांधी की स्थिति में ड्रामैटिक बदलाव आ चुका था. वह अब सिर्फ सड़क पर प्रदर्शन करने वाले कांग्रेस नेता नहीं रह गए थे. वह अब लोकसभा में विपक्ष के नेता थे. फिर भी सड़क की राजनीति का उनका पुराना तरीका वैसा ही बना रहा. जुलाई 2026 में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के बाद गांधी अपना विरोध प्रदर्शन सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दरवाजे पर ले गए. प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य विपक्षी नेताओं के साथ, उन्होंने जवाबदेही, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और संसद में चर्चा की मांग को लेकर 7 लोक कल्याण मार्ग के बाहर धरना दिया.
ऐसा कहा जाता है कि इस कदम से दिल्ली पुलिस के होश उड़ गए, क्योंकि उसने विजय चौक पर संभावित विरोध प्रदर्शन के लिए बंदोबस्त किए थे. लगभग 3 घंटे के बाद, पुलिस ने गांधी और कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया और बसों में भरकर ले गई. राहुल ने बाद में अपनी रणनीति को खुलकर स्पष्ट करते हुए कहा था कि अगर युवा सड़कों पर हैं, तो विपक्ष को भी होना चाहिए.
आकाशवाणी का आंदोलन
मंगलवार का विरोध प्रदर्शन इसका सबसे ड्रामाटिक रूप साबित हुआ. INDIA गठबंधन के चुनाव आयोग की ओर मार्च को पुलिस ने रोक दिया. राहुल गांधी बैरिकेड्स पर चढ़ गए, तिरंगा लहराया और एक तख्ती पकड़ी जिस पर लिखा था- Gyanesh, Its done bro!
इसके बाद जैसे ही पुलिस ने विपक्षी नेताओं को हिरासत में लेना और बसों में बिठाना शुरू किया, गांधी और प्रियंका आकाशवाणी भवन के अंदर दाखिल हो गए. इसके बाद परिसर के अंदर घंटों तक धरना चला और अंत में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाया. राहुल गांधी और प्रियंका उन लोगों में शामिल थे, जिन्हें हिरासत में लिया गया और रात में बाद में रिहा कर दिया गया.