पहले यूरोप को घेरते थे जयशंकर, अब निशाने पर US, जयशंकर के तेवर में क्या संकेत
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एस जयशंकर के हालिया बयानों में विदेश नीति की भाषा बदली दिख रही है. पहले वह यूरोप के दोहरे मानदंडों पर सबसे ज्यादा निशाना साधते थे. अब अमेरिका की नीतियों पर भी खुलकर सवाल उठा रहे हैं. रूसी तेल के मुद्दे पर उन्होंने अमेरिकी रवैये को असंगत बताया. उनका अमेरिका को “अधिक अकेली शक्ति” कहना भी महत्वपूर्ण है. हालांकि यह अमेरिका से दूरी नहीं बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का विस्तार ज्यादा दिखता है.
एस जयशंकर ने अपना रुख साफ कर दिया. (PTI)
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मुनच लीडर्स मीटिंग में दो टूक कह दिया कि अमेरिका ने खुद को एक ‘अकेली पड़ती ताकत’ के रूप में ढाल लिया है. एक तरफ जहां अमेरिका लगातार भारत पर रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर दबाव बना रहा है और अपनी चालें चल रहा है, वहीं जयशंकर ने खुलकर रूस के साथ पुरानी और मजबूत दोस्ती की वकालत की है. उन्होंने साफ किया कि जब पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश के साथ दुनिया खड़ी थी, तब रूस हमारे साथ खड़ा था. इतना ही नहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत अब सिर्फ ‘शांति की बात’ तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस और यूक्रेन दोनों के बीच अड़े मुद्दों (जैसे अनाज और ऊर्जा निर्यात) को सुलझाने के लिए खुद अपना शांति प्रस्ताव लेकर आगे आ रहा है.
अमेरिका की घटी साख और चीन का बढ़ता दबदबा
जयशंकर ने ग्लोबल लेवल पर हो रहे इस बड़े बदलाव का पर्दाफाश करते हुए कहा कि आज की दुनिया दो बड़ी चीजों से तय हो रही है. पहला अमेरिका का खुद को बदलना और दूसरा चीन का तेजी से ऊपर उठना. उन्होंने साफ कर दिया कि पुरानी ग्लोबल व्यवस्था को अमेरिका ने संभाल रखा था, लेकिन अब वह पकड़ कमजोर पड़ रही है. अमेरिका और चीन की तनातनी इतनी बढ़ चुकी है कि दुनिया का हर देश अपने हाथ में मौजूद हर हथियार और लीकेज का इस्तेमाल दूसरों पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है. कुल मिलाकर, भारत ने बिना डरे अपने नेशनल इंटरेस्ट को सबसे ऊपर रखना शुरू कर दिया है.
असली बदलाव अमेरिका से दूरी नहीं, विकल्प बढ़ाने का है
भारत के लिए अमेरिका बेहद महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है. रक्षा, तकनीक, व्यापार और चीन जैसे मुद्दों पर सहयोग जारी है. लेकिन रणनीतिक साझेदारी का मतलब रणनीतिक निर्भरता नहीं है. यही जयशंकर की मौजूदा भाषा का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है. भारत अमेरिका के साथ रहेगा. भारत रूस के साथ भी अपने पुराने हित बचाएगा. यूरोप के साथ संबंध भी आगे बढ़ाएगा. साथ ही चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और बातचीत दोनों रखेगा. यानी विदेश नीति का फॉर्मूला अब साफ है. दोस्ती सबके साथ, फैसला अपने हित में.
जयशंकर का निशाना बदला है, रणनीति नहीं
जयशंकर के तेवरों में बदलाव जरूर दिख रहा है लेकिन इसे अमेरिका से दूरी की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी. पहले उनका संदेश यूरोप के लिए था. जब उन्होंने कहा था कि यूरोप को लगता कि कि उनकी प्राब्लम दुनिया की प्राब्लम है और दुनिया की प्रॉब्लम यूरोप की प्रॉब्लम नहीं हे. अब वही संदेश अमेरिका तक पहुंच गया है. भारत अब पश्चिम से रिश्ते चाहता है.लेकिन पश्चिम की शर्तों पर विदेश नीति नहीं चलाना चाहता.