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Delhi High Court IIT Admission Rules: दिल्ली हाईकोर्ट ने आईआईटी में दाखिले से जुड़ी एक याचिका खारिज कर दी है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ सहानुभूति के आधार पर एडमिशन के सख्त नियमों और पात्रता शर्तों में कोई ढील नहीं दी जा सकती. जानिए इस अहम फैसले की पूरी कहानी और इसके मायने.
Delhi High Court IIT Admission Rules: दिल्ली हाईकोर्ट ने आशी अग्रवाल केस में अपना फैसला सुना दिया है
नई दिल्ली (IIT Admission Rules). इंजीनियरिंग के टॉप संस्थान आईआईटी में एडमिशन के लिए छात्र दिन-रात एक कर देते हैं. हर साल लाखों युवा जेईई परीक्षा देते हैं. कई सालों की कोचिंग, अनगिनत मॉक टेस्ट और स्ट्रेसफुल रातों के बाद कुछ होनहारों का ख्वाब पूरा होता है. लेकिन अगर कोई परीक्षा के नियमों, अंकों के फेरबदल या तकनीकी गड़बड़ियों के जाल में फंस जाए तो? क्या कोर्ट-कचहरी और सहानुभूति के सहारे आईआईटी में एडमिशन मिल सकता है? जेईई एस्पिरेंट आशी अग्रवाल का केस कुछ ऐसा ही है.
दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा आशी अग्रवाल का आईआईटी एडमिशन केस
आशी अग्रवाल ने IIT दिल्ली में दाखिले के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. छात्रा का आरोप था कि जेईई मेन में कुछ सवालों के मूल्यांकन में गड़बड़ियां थीं. उनका दावा था कि फिजिक्स और केमिस्ट्री के कुछ सवालों के नंबर गलत काटे गए. इस वजह से वह तय कटऑफ से चूक गईं और जेईई एडवांस्ड के लिए क्वॉलिफाई नहीं कर पाईं. उन्होंने परीक्षा केंद्र पर समय पर पहुंचने के बावजूद एंट्री न मिलने और ऑडिट लॉग में गड़बड़ी के भी दावे किए. छात्रा चाहती कि उसे IIT में एडमिशन के लिए सुपरन्यूमरेरी सीट दी जाए.
अदालत ने याचिका क्यों खारिज की?
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस जसमीत सिंह ने सभी पक्ष सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि तकनीकी गड़बड़ियों और ऑडिट लॉग जैसे तथ्यात्मक विवादों की तकनीकी जांच रिट याचिका के दायरे में नहीं की जा सकती. अदालत ने समझाया कि किसी को IIT में सीट दिलाने के लिए कई कड़ियां आपस में जोड़नी होंगी- पहले मूल्यांकन की गलती साबित हो, फिर अंक बदलें, फिर पात्रता बने और अंत में दाखिला मिले. इस तरह की संभावनाओं के आधार पर पूरी प्रवेश प्रक्रिया को दोबारा नहीं खोला जा सकता.
आईआईटी में एडमिशन के लिए पात्रता के नियम
इस मामले में सबसे बड़ा पेंच एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया का था. नियमों के मुताबिक, जेईई एडवांस्ड परीक्षा के लिए वही पात्र होते हैं, जिन्होंने पहली बार उसी साल या उससे ठीक 1 साल पहले 12वीं पास की हो. लेकिन याचिकाकर्ता छात्रा ने परीक्षा पास करने के वर्ष से जुड़ा नियम पूरा नहीं किया था. अदालत ने दो टूक कहा कि नियम सभी उम्मीदवारों पर समान रूप से लागू होते हैं और किसी एक को इसमें ढील नहीं दी जा सकती. इससे स्पष्ट होता है कि प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता और अनुशासन से समझौता नहीं किया जा सकता.