Gandhi Jayanti: केसर-गाजर, मावा और पिस्ता-पान से बनती है तिरंगा बर्फी, जानिए खंडवा की इस खास मिठाई का राज

Gandhi Jayanti: केसर-गाजर, मावा और पिस्ता-पान से बनती है तिरंगा बर्फी, जानिए खंडवा की इस खास मिठाई का राज


Sweet Tiranga Barfi: मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में एक ऐसी मिठाई तैयार होती है, जो स्वाद के साथ-साथ अपने तीन रंगों की वजह से भी खास पहचान रखती है. नाम है तिरंगा बर्फी केसरिया, सफेद और हरे रंग की यह बर्फी देखने में बिल्कुल तिरंगे जैसी नजर आती है. खास बात यह है कि इस मिठाई का इतिहास आजादी के दौर से जोड़कर देखा जाता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, करीब 105 साल से भी ज्यादा समय से खंडवा में तिरंगा बर्फी बनाने की परंपरा चली आ रही है. इसके पीछे महात्मा गांधी और आजादी के आंदोलन से जुड़ी एक कहानी भी यहां सुनाई जाती है. कहा जाता है कि गांधी जी जब खंडवा आए थे, तब उन्हें यह खास मिठाई खिलाई गई थी. इसके बाद तिरंगा बर्फी की पहचान और भी बढ़ती चली गई.

करीब 105 साल पुरानी बताई जाती है परंपरा
खंडवा में तिरंगा बर्फी की शुरुआत वर्ष 1920-21 के आसपास होने की बात कही जाती है. बताया जाता है कि खंडवा के अग्रवाल परिवार के मुखिया रामसहाय जी अग्रवाल ने इस खास मिठाई को तैयार करने की परंपरा शुरू की थी. मूल रूप से राजस्थान से आए इस परिवार ने खंडवा को अपना घर बनाया और यहां मिठाई का कारोबार शुरू किया. उस दौर में देश में आजादी का आंदोलन जोर पकड़ रहा था और तिरंगा लोगों के लिए देशभक्ति की पहचान बन रहा था. इसी दौर में तीन रंगों वाली यह बर्फी तैयार की गई, जिसने आगे चलकर खंडवा की अलग पहचान बना ली.

गांधी जी के लिए तैयार की गई थी तिरंगा बर्फी
परिवार से जुड़ी कहानी के मुताबिक, रामसहाय जी अग्रवाल महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थे और चाहते थे कि गांधी जी एक बार उनके हाथ की बनाई तिरंगा बर्फी जरूर चखें. स्थानीय तौर पर बताया जाता है कि जब महात्मा गांधी खंडवा आए, तब उन्हें यह खास मिठाई खिलाई गई. गांधी जी के खंडवा आने और उनके द्वारा तिरंगा बर्फी का स्वाद चखने की कहानी आज भी परिवार और स्थानीय लोगों के बीच सुनाई जाती है. इसी वजह से इस मिठाई को खंडवा के इतिहास और आजादी के दौर से जोड़कर देखा जाता है. उस समय यह सिर्फ एक मिठाई नहीं थी. तीन रंगों वाली बर्फी उस दौर के देशभक्ति के माहौल से भी जुड़ गई. लोग इसे देखते तो उन्हें तिरंगे की याद आती और धीरे-धीरे यह मिठाई खंडवा की पहचान बनती चली गई.

तीन रंगों में छिपा है इसका खास स्वाद
तिरंगा बर्फी को खास बनाने वाली सबसे बड़ी बात इसके तीन रंग हैं. केसरिया हिस्से में केसर और गाजर के मिश्रण का इस्तेमाल बताया जाता है, जबकि बीच का सफेद हिस्सा मावा और चीनी से तैयार किया जाता है. हरे हिस्से में पिस्ता और पान के स्वाद का हल्का इस्तेमाल किया जाता है. तीनों हिस्सों को अलग-अलग तैयार करने के बाद उन्हें एक साथ जमाया जाता है, जिससे बर्फी देखने में तिरंगे जैसी दिखाई देती है. यही वजह है कि इसे दूसरी सामान्य बर्फी से अलग माना जाता है. बाहर से देखने पर तीन रंग आकर्षित करते हैं और खाने पर अलग-अलग स्वाद का अनुभव मिलता है. परिवार का दावा है कि मिठाई की गुणवत्ता और सामग्री की शुद्धता पर लंबे समय से विशेष ध्यान दिया जाता रहा है.

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंची मिठास
तिरंगा बर्फी की कहानी सिर्फ एक मिठाई की नहीं, बल्कि एक परिवार की कई पीढ़ियों से चली आ रही मेहनत की कहानी भी है. रामसहाय जी अग्रवाल के बाद उनके पुत्र रामगोपाल जी ने इस कारोबार को आगे बढ़ाया. इसके बाद वर्ष 1986 में परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य दीपू अग्रवाल ने कारोबार संभाला और तिरंगा बर्फी को नई पहचान दिलाने का काम किया. अब परिवार की चौथी पीढ़ी पुलकित और निहुल अग्रवाल इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है. करीब एक सदी से ज्यादा समय में समय बदला, मिठाई की मांग बदली और लोगों की पसंद भी बदली, लेकिन तिरंगा बर्फी बनाने की परंपरा परिवार में जारी रही.

राष्ट्रीय पर्व पर बढ़ जाती है मांग
तिरंगा बर्फी की मांग वैसे तो पूरे साल बनी रहती है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर इसकी खास मांग देखने को मिलती है. तीन रंगों की वजह से लोग इसे इन मौकों पर खास तौर पर खरीदते हैं. इसके अलावा शादी-ब्याह, त्योहार और दूसरे खास अवसरों पर भी लोग इसे पसंद करते हैं. अब यह मिठाई सिर्फ खंडवा तक सीमित नहीं है. निमाड़ के दूसरे इलाकों के साथ आसपास के जिलों और प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों तक भी इसकी पहचान पहुंची है. खंडवा आने वाले कई लोग इस मिठाई को यहां की खास पहचान के तौर पर लेकर जाते हैं.

खंडवा की मिठाई में दिखता है आजादी का रंग
आज बाजार में कई तरह की मिठाइयां मिलती हैं, लेकिन तिरंगा बर्फी की पहचान उसके तीन रंगों और उससे जुड़ी पुरानी कहानी की वजह से अलग है. करीब 100 साल से ज्यादा समय से चली आ रही यह परंपरा खंडवा के खान-पान और स्थानीय इतिहास का हिस्सा बन चुकी है. गांधी जी से जुड़ी इसकी कहानी स्थानीय परंपरा के तौर पर आज भी सुनाई जाती है और यही कहानी इस मिठाई को सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक भाव भी देती है.

केसरिया, सफेद और हरे रंग में सजी यह बर्फी जब मिठाई की दुकान पर रखी होती है तो दूर से ही तिरंगे की याद दिलाती है. यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है. एक मिठाई, तीन रंग और खंडवा से जुड़ी सौ साल से ज्यादा पुरानी कहानी.



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