भारत में चिकन तो दुनिया में बीफ के भाव में आग, चीन में घट गए पशु, क्या है वजह?

भारत में चिकन तो दुनिया में बीफ के भाव में आग, चीन में घट गए पशु, क्या है वजह?


Why Meat Getting Expensive: दुनिया की करीब 90 फीसदी आबादी किसी न किसी रूप में मांस खाती है. लेकिन अब मांस की थाली पर भी महंगाई का असर दिखने लगा है. दुनिया के बड़े बीफ उत्पादक देशों में मवेशियों की संख्या घट रही है. अमेरिका में सूखे ने चरागाह और चारे का संकट बढ़ाया है. ब्राजील में मवेशियों का चक्र बदल रहा है. चीन में घरेलू उत्पादन घट रहा है. दूसरी तरफ भारत में मुर्गी पालक चारे की बढ़ती कीमत से परेशान हैं और उत्पादन घटाने की तैयारी कर रहे हैं. यानी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में समस्या अलग है, लेकिन असर एक है. मांस की कीमत और उसकी सप्लाई प्रभावित हो रही है.

दुनिया में बीफ क्यों महंगा हो रहा?

अलजजीरा वेबसाइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीफ के मामले में सबसे बड़ी चिंता दुनिया के तीन बड़े उत्पादक देशों- ब्राजील, अमेरिका और चीन से जुड़ी है. ये तीनों मिलकर दुनिया के आधे से ज्यादा बीफ का उत्पादन करते हैं. लेकिन इन देशों में मवेशियों की संख्या और उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है. ब्राजील में 2026 की शुरुआत में मवेशियों की संख्या करीब 17.74 करोड़ रहने की संभावना है. 2024 में यह संख्या करीब 19.26 करोड़ थी. यानी दो साल में करीब 8 फीसदी की कमी आई है. अमेरिका में भी 1 जुलाई 2026 तक बीफ वाली गायों की संख्या 2.85 करोड़ थी, जो एक साल पहले की तुलना में 1 फीसदी कम है.

इस साल बछड़ों की संख्या में भी करीब 2 फीसदी की कमी का अनुमान है. चीन में भी जनवरी 2026 में मवेशियों की संख्या करीब 9.4 करोड़ रहने का अनुमान था. 2024 में यह करीब 10.5 करोड़ थी. यानी वहां भी करीब 14 फीसदी की कमी आई है. इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है. अमेरिकी कृषि विभाग यानी USDA के मुताबिक 2026 में वैश्विक बीफ उत्पादन करीब 1 फीसदी घटकर 6.16 करोड़ टन रहने का अनुमान है. ब्राजील, अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया में उत्पादन घटने की उम्मीद है.

सूखा सबसे बड़ी वजह

कुछ देशों में सूखे की वजह से पशुओं की संख्या घटने की रिपोर्ट है. लेकिन पूरी दुनिया के लिए सिर्फ सूखे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. सूखे की वजह से अमेरिका सबसे ज्यादा प्रभावित है. वहां सूखे के कारण मवेशियों के चरागाह कम हो गए हैं. ऐसे में घास और चरागारों की कमी के कारण किसानों को मार्केट से चारा खरीदना पड़ता है. इससे उनकी लागत बढ़त गई है. इतना ही नहीं बीफ के दाम बढ़ने पर ऐसा सोचा जाता है कि किसान रातोंरात मवेशियों की पैदावार बढ़ा देंगे. लेकिन मवेशियों की संख्या रातोंरात नहीं बढ़ सकती. इसलिए ऊंची कीमतों के बावजूद तत्काल आपूर्ति बढ़ाना मुश्किल है.

ब्राजील में मामला थोड़ा अलग

ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा बीफ उत्पादक है. लेकिन वहां मवेशियों की संख्या घटने की एक वजह कैटल साइकिल यानी मवेशी पालन का प्राकृतिक आर्थिक चक्र भी है. जब कीमत अच्छी होती है तो किसान ज्यादा मवेशी बेचते हैं. बाद में जब झुंड छोटा होने लगता है तो वे फीमेल मवेशियों को बेचने के बजाय प्रजनन के लिए बचाने लगते हैं. इससे तत्काल बाजार में मांस की उपलब्धता कम हो जाती है, लेकिन आगे चलकर झुंड फिर बढ़ सकता है. एक अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक ब्राजील 2026 में इसी तरह के चक्र के दौर से गुजर रहा है. वहां किसान मवेशियों की संख्या फिर बढ़ाने के लिए उन्हें रोक रहे हैं.

चीन में बीफ की कीमत क्यों चढ़ रही?

चीन दुनिया का सबसे बड़ा बीफ आयातक और उपभोक्ता है. वहां घरेलू मवेशियों की संख्या घट रही है और उत्पादन पर भी दबाव है. रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में चीन की बीफ सप्लाई 2024 की तुलना में काफी कम रहने का अनुमान है. घरेलू उत्पादन घटने के साथ आयात पर निर्भरता बढ़ती है. लेकिन वैश्विक बाजार में भी बीफ की उपलब्धता सीमित है. यही वजह है कि चीन में बीफ की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है. चीन के बीफ आयात में भी करीब 13 फीसदी की कमी का अनुमान है, क्योंकि वहां आयात को नियंत्रित करने के लिए टैरिफ कोटा जैसी व्यवस्था लागू की जा रही है.

भारत में चिकन की कहानी समझिए

भारत में कहानी बीफ से अलग है. यहां पोल्ट्री उद्योग को चारे की बढ़ती कीमत परेशान कर रही है. मुर्गियों के चारे में सोया मील एक महत्वपूर्ण प्रोटीन स्रोत है. जून में भारत के पोल्ट्री उद्योग के एक बड़े हिस्से ने सोया मील की कीमत बढ़ने के बाद उत्पादन करीब 25 फीसदी घटाने की योजना की बात कही थी. रिपोर्ट के मुताबिक एक महीने में सोया मील की कीमत 40 फीसदी से ज्यादा बढ़ गई थी. मई में इसकी कीमत करीब 66,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई, जो चार साल का उच्च स्तर था. एक महीने में इसमें करीब 41 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी.

चिकन फिर भी बीफ से अलग क्यों?

यहीं मांस की वैश्विक कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा आता है. एक गाय को बाजार के लिए तैयार होने में वर्षों लग सकते हैं. लेकिन चिकन कुछ ही हफ्तों में बाजार के लिए तैयार हो जाता है. इसका मतलब है कि चिकन की आपूर्ति मांग के हिसाब से अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ाई या घटाई जा सकती है. यही वजह है कि जब बीफ महंगा होता है तो कई बाजारों में लोग सस्ते प्रोटीन के तौर पर चिकन की तरफ जाते हैं.

यूरोप में बदल रही मांस की थाली

यूरोप में इस बदलाव का एक अलग रूप दिखाई दे रहा है. वहां बीफ और पोर्क की खपत घटी है, जबकि पोल्ट्री की मांग बढ़ रही है. यूरोपीय संघ में 2025 से 2035 के बीच बीफ उत्पादन में करीब 10 फीसदी और पोर्क उत्पादन में करीब 7 फीसदी गिरावट का अनुमान है. इसके उलट पोल्ट्री उत्पादन करीब 5 फीसदी बढ़ सकता है. इसकी वजह सिर्फ कीमत नहीं है. बीफ और दूसरे लाल मांस के उत्पादन में ज्यादा समय, जमीन और संसाधन लगते हैं. पोल्ट्री को अपेक्षाकृत कम समय में बाजार तक पहुंचाया जा सकता है.



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