कूटनीति भी बड़ी गजब की चीज है! यहां कोई हमेशा के लिए अड़ियल नहीं रहता और अहंकार की मियाद तो बहुत ही छोटी होती है. नेपाल के पीएम बालेन्द्र शाह को ही देख लीजिए. मई में उनका ‘प्रोटोकॉल वाला ईगो’ सातवें आसमान पर था और उन्होंने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मिलने से साफ मना कर दिया था. लेकिन नवंबर आते-आते पासा ऐसा पलटा कि वही बालेन शाह सिंह दरबार में लाल कालीन बिछाकर मिस्री का इंतजार करते नजर आए. दोनों के बीच हुई इस बैठक में कई बड़े मुद्दों पर बात हुई, जहां खेल और रेलवे नेटवर्क जैसी दो बड़ी डील्स गेम-चेंजर साबित होने वाली हैं.
मई से नवंबर तक कितने बदले नेपाल-भारत के रिश्ते?
मई 2026 में जब विक्रम मिसरी साहब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का न्योता लेकर काठमांडू जाने की तैयारी में थे, तब बालेन शाह को अपनी कूटनीतिक ‘ऊंचाई’ अचानक बहुत ज्यादा लगने लगी थी. लिपुलेख और कालापानी वाले सीमा विवाद पर इंटर्नल पॉलिटिक्स जीतनी थी तो एंटी इंडिया बातें सबसे आसान नुस्खा लग रहा था. बालेन सरकार ने विदेश सचिव से मिलने से साफ इनकार कर दिया था.
लेकिन कूटनीति में जब जमीनी हकीकत का झटका लगता है, तो बड़े-बड़े प्रोटोकॉल पानी मांगने लगते हैं. 5 नवंबर 2026 को विक्रम मिस्री जब दो दिवसीय दौरे पर काठमांडू पहुंचे, तो मई में इनकार करने वाले बालेन शाह ने न सिर्फ उनसे मुलाकात की, बल्कि ऐसी आत्मीयता दिखाई कि देखने वाले भी हैरान रह गए.
‘थैंक यू इंडिया!’ भारत की दरियादिली ने तोड़ दी सारी अकड़
राजनीति में भाषण देना और बयानबाजी करना बहुत आसान होता है, लेकिन जब रसुवा-भोटे कोशी नदी में भयानक बाढ़ आती है और तबाही मचती है, तब ‘फेसबुकिया राष्ट्रवाद’ से लोगों के घर नहीं बसते. बाढ़ के उस भयानक संकट में जब नेपाल पूरी तरह घिर गया था, तो सबसे पहले मदद का हाथ किसने बढ़ाया?
वही भारत, जिसके अफसर से मिलने में बालेन को मई में ‘प्रोटोकॉल’ आड़े आ रहा था. भारत की तरफ से धड़ाधड़ राहत सामग्री पहुंची, रेस्क्यू टीमें उतरीं और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन करके बालेन शाह को हरसंभव मदद का भरोसा दिया. जब मुसीबत के वक्त भारत ने बिना किसी शर्त के अपना बड़ा दिल दिखाया, तो काठमांडू के हुक्मरानों को समझ आ गया कि पड़ोस में जब आफत आती है, तो दूर बैठा कोई तीसरा देश मदद करने नहीं आता, बल्कि बगल वाला भारत ही काम आता है. मीटिंग की शुरुआत में बालेन शाह ने भारत सरकार और पीएम मोदी की इस दरियादिली के लिए खुलकर शुक्रिया अदा किया.
सिंह दरबार में हुई आमने-सामने की बातचीत: क्या-क्या तय हुआ?
5 नवंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय और मंत्रिपरिषद के कार्यालय यानी सिंह दरबार में हुई इस औपचारिक बैठक में दोनों देशों के बीच भविष्य के रिश्तों को लेकर कई ठोस चर्चाएं हुईं.
- आपदा राहत पर आभार: जैसा कि तय था, बालेन शाह ने बाढ़ के दौरान भारत के ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ वाले रोल की तारीफ की और पीएम मोदी का आभार जताया.
- खेलकूद में साझेदारी: नेपाल के युवाओं और स्पोर्ट्स इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए बालेन शाह ने खासी दिलचस्पी दिखाई. उन्होंने चर्चा की कि भारत कैसे नेपाल के खेल सेक्टर को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है.
- बालेन शाह का भारत दौरा: विक्रम मिस्री ने पीएम मोदी का संदेश देते हुए बताया कि बालेन शाह की आगामी भारत यात्रा की तैयारियां बहुत जोरों पर हैं और इस दौरे को ऐतिहासिक बनाने के पूरे इंतजाम किए जा रहे हैं.
- द्विपक्षीय तंत्र की बैठकें: ऊर्जा, जल संसाधन, व्यापार, ट्रांजिट और नागरिक उड्डयन जैसे अहम मुद्दों पर भारत-नेपाल के बीच नियमित द्विपक्षीय तंत्र की बैठकें सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी हैं.
दो बड़ी डील: खेल का मैदान और रेलवे नेटवर्क का कमाल!
इस पूरी यात्रा के दौरान जिन दो सबसे बड़ी बातों ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं, वो थीं, खेल के क्षेत्र में सहयोग और रेलवे कनेक्टिविटी.
विक्रम मिस्री ने बालेन शाह को आधिकारिक तौर पर जानकारी दी कि भारत के अयोध्या से नेपाल के जनकपुर के बीच सीधी ट्रेन सेवा शुरू करने की सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. इतना ही नहीं, गुरुवार को ही इस रूट पर रेलवे सर्विस का सफल ट्रायल रन भी पूरा कर लिया गया!
भगवान राम की नगरी अयोध्या को माता सीता के मायके जनकपुर से जोड़ने वाली ये ट्रेन सिर्फ पटरियों पर नहीं दौड़ेगी, बल्कि ये दोनों देशों के धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों को एक बिल्कुल नए स्तर पर ले जाएगी. इसे इस मीटिंग की सबसे बड़ी ‘रेलवे डील’ माना जा रहा है.
इसके साथ ही, युवाओं को जोड़ने के लिए ‘स्पोर्ट्स कोऑपरेशन’ यानी खेल के मैदान में आपसी साझेदारी की जो दूसरी बड़ी डील पर बात हुई है, वो दोनों देशों के जन-मानसिकता को और करीब लाने का काम करेगी.
प्रोटोकॉल का भूत भागा, कूटनीति की गाड़ी पटरी पर आई
मई 2026 का वो इनकार और नवंबर 2026 का ये गर्मजोशी से भरा इस्तकबाल, यही असल में नेपाल-भारत संबंधों की असली और कच्ची सच्चाई है. थोड़ी बहुत खींचतान, थोड़ा ड्रामा और थोड़ा सियासी दिखावा अपनी जगह है, लेकिन आखिरकार साथ मिलकर चलने की मजबूरी और जरूरत ही सबसे ऊपर होती है.
अयोध्या से जनकपुर तक जब ट्रेन की सीटी बजेगी और बालेन शाह अपनी भारत यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचेंगे, तब शायद मई के उस ‘प्रोटोकॉल विवाद’ को कूटनीति के पन्नों में सिर्फ एक छोटी सी खट्टी-मीठी याद मानकर भुला दिया जाएगा. साफ है कि तेवर चाहे जितने भी कड़क हों, आखिरकार पड़ोसी से रिश्ते टेबल पर बैठकर ही सुधरते हैं!