Donald Trump Iran Nuclear Attack : मिडटर्म हार की बौखलाहट में ईरान पर न्यूक्लियर अटैक करेंगे ट्रंप? इस पहाड़ पर लॉक हो गया टारगेट

Donald Trump Iran Nuclear Attack : मिडटर्म हार की बौखलाहट में ईरान पर न्यूक्लियर अटैक करेंगे ट्रंप? इस पहाड़ पर लॉक हो गया टारगेट


इस वक्त अमेरिका की राजनीति में भूचाल आया हुआ है. मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को इतना बड़ा झटका लगा है कि उन्होंने पहली बार अपनी गलती मान ली है. ट्रंप ने खुलकर माना है कि ईरान जंग की वजह से उन्हें मिडटर्म में हार मिली लेकिन इसके बावजूद उन्होंने जंग से पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया है. अब हार का सारा गुस्सा वो ईरान पर एक साथ उड़ेलने वाले हैं. बार-बार ऐसी खबरें उड़ रही हैं कि अमेरिका, ईरान पर न्यूक्लियर हमले की तैयारी कर रहा है.

ईरान पर न्यूक्लियर अटैक करेंगे ट्रंप?

अब सबसे बड़ा और खौफनाक सवाल गूंज रहा है कि क्या अपनी इस राजनीतिक बौखलाहट और मिडटर्म की हार का बदला लेने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर परमाणु हमले का बटन दबा सकते हैं? अमेरिकी संविधान के तहत कमांडर-इन-चीफ होने के नाते ट्रंप के पास असीमित और निरंकुश शक्तियां हैं. उन्हें इसके लिए न तो संसद की मंजूरी की जरूरत है और ना ही किसी कैबिनेट की सहमति की. वो जब चाहें, जहां चाहें, परमाणु प्रलय का आदेश दे सकते हैं.

अमेरिका ने लॉक किया ईरान पर न्यूक्लियर अटैक का टारगेट?

ईरान पर परमाणु हमले की ये चर्चा कोई हवा-हवाई या कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि इसके पीछे पेंटागन की एक बहुत बड़ी सैन्य लाचारी छिपी है. ईरान ने अपने सबसे सेंसेटिव और खुफिया यूरेनियम इनरिचमेंट प्लांट्स को जमीन के सामान्य तलों पर नहीं, बल्कि सैकड़ों फीट नीचे ठोस ग्रेनाइट चट्टानों के सीने में दफना रखा है.

उदाहरण के लिए, इसफाहान के पास मौजूद ‘पिकैक्स माउंटेन’ के भीतर बना अंडरग्राउंड परमाणु परिसर. ये कोई साधारण सुरंग नहीं है, बल्कि एक ऐसा फौलादी किला है जिसे कुदरत के सबसे मजबूत पहाड़ों और कंक्रीट की परतों से बुलेट-प्रूफ सुरक्षा दी गई है.

सैन्य एक्सपर्ट्स का माथा इस बात पर ठनका हुआ है कि अमेरिका के तरकश में जितने भी सबसे भारी पारंपरिक ‘बंकर-बस्टर’ बम मौजूद हैं, वो भी इस फौलादी पहाड़ को चीरकर अंदर बैठे ईरान के सेंट्रीफ्यूज को मटियामेत करने में नाकाफी साबित हो सकते हैं.

जब पारंपरिक हथियारों से काम नहीं बनता, तब पेंटागन के कुछ अति-उत्साही और आक्रामक डिफेंस एक्सपर्ट्स ये तर्क देना शुरू कर देते हैं कि इस गहराई में छिपे दुश्मन को नेस्तनाबूद करने का इकलौता और आखिरी हथियार कम क्षमता वाला सामरिक परमाणु हथियार ही है. यानी, जमीन के अंदर घुसकर फटने वाला न्यूक्लियर बम!

परमाणु हमले के घातक नतीजे: 80 साल पुराना नियम टूटेगा, तबाह होगी दुनिया

अगर अमेरिका अपनी सनक में आकर इस परमाणु विकल्प को चुनता है, तो ये इंसानी इतिहास की सबसे बड़ी भूल साबित होगी. ये कदम द्वितीय विश्व युद्ध यानी 1945 के बाद से पिछले आठ दशकों से चले आ रहे उस वैश्विक नियम को एक झटके में चकनाचूर कर देगा, जिसके तहत किसी भी देश ने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल न करने की कसम खा रखी थी.

  1. परमाणु अप्रसार संधियों का जनाजा: जैसे ही अमेरिका इस वर्जित दायरे को तोड़ेगा, दुनिया भर की परमाणु अप्रसार संधियां कागज़ का टुकड़ा बनकर रह जाएंगी. इसके बाद दुनिया के हर छोटे-बड़े देश को ये मैसेज मिल जाएगा कि अपनी सुरक्षा के लिए न्यूक्लियर बम होना ही एकमात्र गारंटी है, जिससे हथियारों की एक ऐसी अंधी दौड़ शुरू होगी जो मानवता को लील जाएगी.
  2. रूस और चीन का आक्रामक पलटवार: अमेरिका द्वारा न्यूक्लियर वोपन के इस्तेमाल के बाद रूस और चीन जैसे देश हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठेंगे. वो तुरंत अपनी रणनीतिक और परमाणु नीतियों को सुपर-अग्रेसिव मोड में ले आएंगे, जिससे कोल्ड वॉर का दौर सीधे ग्लोबल हॉट वॉर में बदल जाएगा.
  3. पश्चिम एशिया राख करने की कोशिश : मिडिल ईस्ट में फैले तमाम गैर-राज्य सैन्य संगठन और मिलिशिया ग्रुप्स बिना किसी कायदे-कानून के बेकाबू होकर ऐसा चौतरफा गुरिल्ला युद्ध छेड़ देंगे कि पूरा खाड़ी क्षेत्र हमेशा के लिए राख के ढेर में बदल जाएगा.

पश्चिम एशिया में अमेरिका की नई सैन्य घेराबंदी

इन तमाम खौफनाक अटकलों के बीच, अमेरिकी न्यूज वोबसाइट एक्सियोस की एक रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में खलबली मचा दी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना चुपचाप मिडिल ईस्ट में अतिरिक्त युद्धपोत, एयरक्राफ्ट कैरियर, अत्याधुनिक फाइटर जेट्स और भारी सैन्य साजो-सामान का अंबार लगा रही है. वाशिंगटन एक बार फिर ईरान के खिलाफ किसी बहुत बड़े और निर्णायक सैन्य ऑपरेशन को अंजाम देने की पूरी तैयारी में जुटा है.

हालांकि, व्हाइट हाउस के दफ्तर से अभी तक सीधे तौर पर किसी अंतिम हमले के आदेश पर मुहर नहीं लगी है, लेकिन जानकारों के सामने इस समय दो सबसे बड़े और सुलगते सवाल खड़े हैं.

क्या ये महज ‘साइकोलॉजिकल प्रेशर टैक्टिक्स’ है? यानी अमेरिका अपनी नौसैनिक ताकत और विमान वाहक पोतों को ईरान की समुद्री सीमा के मुहाने पर खड़ा करके सिर्फ इतना दिखाना चाहता है कि देखो, हम कितने ताकतवर हैं, ताकि ईरान डर के मारे घुटने टेक दे और अपनी शर्तों पर बातचीत की टेबल पर आ जाए.

या फिर ये किसी खूनी हमले की फुल-फ्लेग तैयारी है? मिडटर्म चुनावों की करारी हार से बुरी तरह बौखलाया अमेरिकी प्रशासन जनता का ध्यान भटकाने और अपनी ‘मजबूती’ साबित करने के लिए सचमुच किसी पागलपन भरे सैन्य अभियान को हरी झंडी दिखाने की फिराक में है.

तेल के कुएं जलेंगे, दुनिया रोएगी

यदि अमेरिका और ईरान के बीच ये सैन्य तनाव जरा भी आगे बढ़ा या खाड़ी क्षेत्र में किसी भी तरह का परमाणु या बड़ा पारंपरिक हमला हुआ, तो इसका सबसे पहला, सबसे भयानक और सीधा असर आम इंसान की जेब और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

  • स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का पूरी तरह ठप होना: दुनिया के कुल कच्चे तेल का एक चौथाई हिस्सा इसी बेहद संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है. युद्ध छिड़ते ही ये रास्ता बंद हो जाएगा और दुनिया का तेल का नल बंद हो जाएगा.
  • क्रूड ऑयल के दामों में बेकाबू बवंडर: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रॉकेट की रफ्तार से आसमान छूने लगेंगी. अमेरिका से लेकर यूरोप, भारत और एशिया के तमाम देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम इतने बढ़ जाएंगे कि ग्लोबल इकोनॉमी में भीषण मंदी और महंगाई का सुनामी आ जाएगा.
  • पीने के पानी का संकट (डिसिलीनेंशन प्लांट्स का विनाश): फारस की खाड़ी के आसपास के देशों में पीने का पानी समुद्री पानी को साफ करके बनाया जाता है. युद्ध या परमाणु विकिरण के फैलने से ये सारे प्लांट जहरीले हो जाएंगे, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में सदियों का जल संकट खड़ा हो जाएगा.

कूटनीति का दिवालियापन या महाविनाश की इबारत?

कुल मिलाकर कहें तो, अमेरिकी राजनीति में मिडटर्म चुनावों के चुनावी झटके और व्हाइट हाउस की बौखलाई हुई रणनीतियों ने पूरी दुनिया को एक बेहद खतरनाक और विस्फोटक चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है. भले ही कागजों पर परमाणु हथियार का विकल्प चुनना पूरी तरह पागलपन और रणनीतिक खुदकुशी जैसा लगे, लेकिन पेंटागन द्वारा मिडिल ईस्ट में जिस तेजी से सेना और हथियारों का जमावड़ा लगाया जा रहा है, वो किसी बड़े तूफान का साफ संकेत है.

अब आने वाले दिन ये तय करेंगे कि वाशिंगटन अपनी राजनीतिक हताशा में होश खोकर दुनिया को एक और महायुद्ध की आग में झोंकता है या फिर ऐन वक्त पर इस खतरनाक खेल से पीछे हटता है. तब तक, दुनिया भर की निगाहें अमेरिका और ईरान के बीच सुलग रही इस चिंगारी पर टिकी हुई हैं!



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