‘शुक्र है आपका माइक नहीं छीना गया’, सुप्रीम कोर्ट में SG तुषार मेहता का तंज, फिर खूब हुई बहस


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‘शुक्र है आपका माइक नहीं छीना गया’, SG मेहता के तंज पर कोर्ट में छिड़ी बहस

Agency:एजेंसियां

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के एक तंज ने भारी बवाल खड़ा कर दिया. उन्होंने वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी से कहा कि शुक्र है आपका माइक नहीं छीना गया. यह टिप्पणी सुनते ही मेनका गुरुस्वामी ने उन्हें संवैधानिक पद की गरिमा याद दिला दी. दरअसल मेहता का इशारा इसी मामले में पहले हुई उस घटना की तरफ था जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन का माइक छीने जाने का विवाद सामने आया था. इस खबर में जानिए अदालत में क्या हुआ और दिल्ली के प्रदर्शन से जुड़ी सुनवाई में किन मुद्दों पर बहस हुई.

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'शुक्र है आपका माइक नहीं छीना गया', SG मेहता के तंज पर कोर्ट में छिड़ी बहसZoom

सुप्रीम कोर्ट में तुषार मेहता ने माइक छीनने की घटना पर तंज कसा. (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को दिल्ली में हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी. मामला प्रदर्शन की जगह और उससे आम लोगों को होने वाली परेशानी का था. वकील अपनी-अपनी दलीलें रख रहे थे. इसी बीच सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कुछ ऐसा कह दिया कि अदालत का माहौल अचानक गर्म हो गया. कारोबारियों की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी अपनी बात रख रहे थे. इसी दौरान दूसरे पक्ष के कुछ वकीलों ने उनकी दलीलों का जवाब देने की कोशिश की. इस पर तुषार मेहता ने रोहतगी से कहा कि शुक्र है आपका माइक नहीं छीना गया. पहली नजर में यह एक सामान्य टिप्पणी लग सकती थी लेकिन इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट में हुई एक पुरानी घटना का संदर्भ छिपा था. मेहता का यह तंज सुनते ही अदालत में मौजूद दूसरे वरिष्ठ वकीलों ने आपत्ति जताई. बात इतनी बढ़ी कि वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी को सॉलिसिटर जनरल को उनके संवैधानिक पद की मर्यादा तक याद दिलानी पड़ी.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार दरअसल यह पूरा विवाद उस कथित माइक छीनने की घटना से जुड़ा है जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन को पहले इस मामले की सुनवाई के दौरान परेशानी का सामना करना पड़ा था. वह याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हो रहे थे. इस घटना के बाद उन्होंने खुद को मामले से अलग कर लिया था. मंगलवार को तुषार मेहता ने उसी प्रसंग को अपने अंदाज में उठाया. उन्होंने एक बार नहीं बल्कि दो बार माइक छीनने का जिक्र किया. दूसरी बार उन्होंने कहा कि उनका माइक सुरक्षित दूरी पर है और कोई उसे छीन नहीं सकता. इस टिप्पणी पर मेनका गुरुस्वामी के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता अरुंधति काटजू ने भी प्रतिक्रिया दी. अदालत में हुई इस नोकझोंक ने प्रदर्शन के अधिकार और कारोबार के नुकसान से शुरू हुई सुनवाई को एक अलग ही चर्चा में ला दिया.

मेनका गुरुस्वामी ने तुषार मेहता को क्या सुना दिया?

  • मुकुल रोहतगी की दलीलों के दौरान जब दूसरे पक्ष के वकीलों ने बीच में अपनी बात रखनी चाही तो तुषार मेहता ने कहा कि रोहतगी भाग्यशाली हैं कि उनका माइक नहीं छीना गया. इसके कुछ देर बाद जब फिर से दूसरी तरफ से बोलने की कोशिश हुई तो मेहता ने नाराजगी जताई.
  • उन्होंने कहा कि क्या अब वह बिना दूसरी तरफ से चिल्लाए अपनी बात रख सकते हैं. इसके बाद उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वह सुरक्षित हैं क्योंकि उनका माइक दूर रखा गया है और कोई उसे छीन नहीं सकता.
  • इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने तुषार मेहता से कहा, ‘श्रीमान मेहता! आप एक संवैधानिक पद पर बैठे हैं. कृपया उसी पद की गरिमा के अनुरूप व्यवहार कीजिए.’ इस टिप्पणी के बाद अदालत में मौजूद वकीलों के बीच बहस और तीखी हो गई.

आखिर किस माइक छीनने की घटना का था जिक्र?

तुषार मेहता की टिप्पणी का संबंध इसी मामले की पिछली सुनवाई से था. उस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन याचिकाकर्ताओं की तरफ से पैरवी कर रहे थे. सुनवाई के दौरान माइक छीने जाने की घटना सामने आई थी. इसके बाद शंकरनारायणन ने मामले से खुद को अलग कर लिया था. मंगलवार को मेहता ने इसी घटना का हवाला देकर विपक्षी पक्ष के वकीलों पर तंज कसा. खास बात यह रही कि उन्होंने अदालत में अपने माइक को लेकर भी टिप्पणी की. इससे पुराना विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया.

प्रदर्शन की जगह पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ कर रही थी. इसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे. अदालत दिल्ली में अक्टूबर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. पीठ ने साफ कहा कि कोई भी समूह किसी प्रदर्शन स्थल पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकता. दूसरे लोगों और संगठनों को भी अपनी बात रखने का अधिकार है. चीफ जस्टिस ने सवाल उठाया कि अगर एक समूह लगातार किसी जगह पर बैठा रहेगा तो किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन और बेघर लोग प्रदर्शन कहां करेंगे? उन्होंने कहा कि हर किसी को विरोध दर्ज कराने का संवैधानिक अधिकार है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई एक समूह पूरी जगह पर अपना स्थायी अधिकार जमा ले.

कारोबारियों ने बताया 2000 करोड़ रुपए का नुकसान

सुनवाई के दौरान कारोबारियों की तरफ से पेश मुकुल रोहतगी ने दावा किया कि प्रदर्शनों के कारण करीब 2000 करोड़ रुपए का राजस्व नुकसान हुआ है. उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान के आसपास कई बड़े बाजार हैं. यहां लाखों लोग रहते हैं और बड़ी संख्या में कारोबारी व मजदूर अपनी रोजी-रोटी के लिए इन बाजारों पर निर्भर हैं. रोहतगी ने त्योहारों के दौरान हुए नुकसान का भी जिक्र किया. उनका कहना था कि इस समय बिक्री प्रभावित होने से व्यापारियों के साथ टेंपो चालकों और मजदूरों तक को नुकसान उठाना पड़ता है. हालांकि जस्टिस बागची ने सवाल किया कि क्या कारोबार में गिरावट के लिए सिर्फ प्रदर्शनकारियों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? उन्होंने कहा कि सड़कों पर बैरिकेडिंग और प्रशासन की पाबंदियां भी व्यापार को प्रभावित कर सकती हैं.

बिना अनुमति संसद तक मार्च पर भी उठे सवाल

  • सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शन के नाम पर बिना अनुमति भीड़ को संसद की ओर मार्च करने के लिए नहीं कहा जा सकता. उन्होंने जुलाई में कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए दावा किया कि एक दिन की अनुमति मिलने के बावजूद प्रदर्शनकारी 17 दिनों तक वहां बैठे रहे.
  • मेहता ने कहा कि संसद देश की संप्रभुता का प्रतीक है. वहां या सुप्रीम कोर्ट के बाहर बिना अनुमति प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती.
  • वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने सवाल उठाया कि अगर रामलीला मैदान और जंतर-मंतर जैसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों पर भी आपत्ति होने लगेगी तो लोग अपनी आवाज कहां उठाएंगे?

प्रदर्शन के दौरान निगरानी और निजता पर भी बहस

सुनवाई में वकील प्रशांत भूषण ने प्रदर्शनकारियों की निगरानी का मुद्दा उठाया. उन्होंने पूछा कि प्रदर्शन के दौरान किस तरह की निगरानी की जा रही है और इसके लिए कौन सा कानूनी प्रावधान मौजूद है. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति को भी निजता का अधिकार है.

इस पर तुषार मेहता ने जवाब दिया कि वहां सिर्फ सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जा रही थी. उन्होंने कहा कि सैकड़ों सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर खुद प्रदर्शन की लाइव रिकॉर्डिंग कर रहे हैं लेकिन सरकारी कैमरों पर सवाल उठा रहे हैं.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर निजता की उम्मीद की भी एक सीमा होती है. जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर मौजूद है तो उसकी निजता की उचित अपेक्षा कितनी हो सकती है. अदालत में इस मुद्दे पर भी विस्तार से दलीलें रखी गईं.



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