गोवर्धन पूजा में गाय के गोबर से क्यों बनाई जाती है पर्वत की आकृति?

गोवर्धन पूजा में गाय के गोबर से क्यों बनाई जाती है पर्वत की आकृति?


Govardhan Puja Story: गोवर्धन पूजा हर साल दिवाली के अगले दिन करी जाती है. इस खास परंपरा में घर के आंगन में गाय के गोबर से पर्वत की आकृति बनाई जाती है. गोबर से बनी पर्वत की इस आकृति को फूल, पत्तियों और पूजा साम्रगी से सजाने के बाद भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है. इस खास परंपरा में पर्वत की आकृति गोबर से ही क्यों बनाई जाती है?

इससे जुड़ी भगवान कृष्ण की एक पौराणिक कथा प्रचलित है इसके अलावा गाय, प्रकृति और खेती से जुड़ी कई परंपराएं हैं इस बारें में अधिक जानकारी दे रहे हैं पंडित संतोष शुक्ला.

भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से जुड़ी है यह परंपरा

धार्मिक मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में वृंदावन के लोग बारिश के देवता इंद्र की पूजा करते थे. भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि उनके जीवन में गोवर्धन पर्वत, जंगल, पेड़-पौधों और गायों का बहुत महत्व है. ये सभी उनके जीवन और आजीविका का आधार हैं. इसलिए इनका सम्मान और पूजा करनी चाहिए.

यह बात इंद्र को पसंद नहीं आई और उन्होंने गुस्से में वृंदावन में तेज बारिश शुरू कर दी. लगातार बारिश से गांव के लोगों और उनके पशुओं पर संकट आ गया. तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया. इसके नीचे सभी गांव वालों और गायों को आश्रय मिला. मान्यता है कि सात दिनों तक भगवान ने पर्वत को उठाए रखा और सभी की रक्षा की.

इसी घटना की याद में गोवर्धन पूजा की जाती है. गोबर से पर्वत की आकृति बनाना उसी गोवर्धन पर्वत का प्रतीक माना जाता है. उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग भी अपनी सांस्कृतिक जानकारी में इस परंपरा को श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से जोड़ता है.

गोबर से ही क्यों बनाई जाती है गोवर्धन पर्वत की आकृति?

इसके पीछे धार्मिक मान्यता के साथ ग्रामीण जीवन से जुड़ी वजह भी है. भारतीय परंपरा में गाय को पूजनीय माना गया है. पुराने समय में गांवों की जिंदगी काफी हद तक गाय और दूसरे पशुओं पर निर्भर थी. गाय से दूध मिलता था और गोबर का इस्तेमाल खेती, ईंधन और घर के आंगन की साफ-सफाई जैसे कामों में किया जाता था.

धार्मिक परंपराओं में गाय के गोबर को पवित्र माना जाता रहा है. इसी वजह से कई पूजा-पाठ और त्योहारों में इसका इस्तेमाल होता है. गोवर्धन पूजा में गोबर से पहाड़ बनाना गाय के प्रति सम्मान और प्रकृति के साथ इंसान के रिश्ते को दिखाता है. इस आकृति के जरिए लोग भगवान श्रीकृष्ण की लीला को अपने घर के आंगन में प्रतीकात्मक रूप से दोहराते हैं.

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गोवर्धन पर्वत के साथ गाय और बछड़ों की भी बनती हैं आकृतियां

कई जगहों पर गोवर्धन पूजा के दिन सिर्फ पहाड़ ही नहीं बनाया जाता, बल्कि गोबर से गाय, बछड़े और दूसरी छोटी आकृतियां भी बनाई जाती हैं. कुछ परिवार पर्वत के आसपास पेड़-पौधों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी चीजों के प्रतीक भी बनाते हैं.

इसके बाद आकृति को फूलों, पत्तियों, रोली और अक्षत से सजाया जाता है. दीपक जलाकर भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है. कई जगह गोवर्धन की परिक्रमा करने की भी परंपरा है. हालांकि, पूजा का तरीका अलग-अलग राज्यों और परिवारों में थोड़ा बदल सकता है.

गोवर्धन पूजा हमें क्या संदेश देती है?

गोवर्धन पूजा सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं है. यह त्योहार इंसान को प्रकृति, पशुओं और खेती के महत्व की याद भी दिलाता है. गोवर्धन लीला के जरिए यह संदेश मिलता है कि पहाड़, जंगल, पानी और पशुधन हमारे जीवन का अहम हिस्सा हैं.

गोबर से पर्वत बनाने की परंपरा भी इसी सोच को आगे बढ़ाती है. यह गाय के प्रति सम्मान और प्रकृति से जुड़े रहने की सीख देती है. इसलिए गोवर्धन पूजा में बनाई जाने वाली यह छोटी-सी आकृति अपने भीतर एक बड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को समेटे हुए है.



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