Pakistan-Aghanistan Diplomacy Fail: अफगानिस्तान में तालिबान पाकिस्तान में TTP का कहर अपनी ही रणनीति में कैसे फंस गया पाकिस्तान?

Pakistan-Aghanistan Diplomacy Fail: अफगानिस्तान में तालिबान पाकिस्तान में TTP का कहर अपनी ही रणनीति में कैसे फंस गया पाकिस्तान?


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Pakistan Diplomacy Fail Over Taliban: भारत और पाकिस्तान जब अलग हुए तो पाकिस्तान के बाद न तो संसाधनों की कमी थी और न ही जमीन की. हालांकि इस देश ने अपने संसाधनों का इस्तेमाल पॉजिटिव तरीके से करने के बजाय दूसरे को गिराने में किया. भारत के अंदर आतंकवाद का जहर घोलने के चक्कर में उसने खुद को ही इस दलदल में धंसा लिया. अब, जब खुद उसकी नीति उस पर ही बैकफायर कर रही है तो वो दुनियाभर में रोना रो रहा है.

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तालिबान को लेकर क्यों फेल हुई पाकिस्तान की पॉलिसी?

कहते हैं जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय… वही हाल पड़ोसी देश पाकिस्तान का है. वो दशकों तक अपनी पश्चिमी सीमा यानी अफगानिस्तान के साथ लगते इलाके में ऐसे आतंकी और कट्टरपंथी नेटवर्क को बढ़ावा दिया, जिन्हें भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ रणनीतिक फायदे के तौर पर देखा जाता था लेकिन अब वही नेटवर्क पाकिस्तान के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौती बन गया है. जिस आग को पाकिस्तान ने अपनी रणनीतिक जरूरतों के लिए हवा दी थी, आज उसी की लपटें उसके अपने इलाकों तक पहुंच रही हैं.

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो की जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक में की गई टिप्पणियों ने दक्षिण एशिया की इस बदलती रणनीतिक स्थिति को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. रुबियो ने माना कि पाकिस्तान को अफगानिस्तान की जमीन से होने वाले सीमा पार हमलों को लेकर गंभीर सुरक्षा चिंताएं हैं. हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार पर अमेरिका का प्रभाव बेहद सीमित है यानी वॉशिंगटन पाकिस्तान की शिकायतें सुन तो रहा है, लेकिन तालिबान पर दबाव बनाने की उसकी क्षमता बहुत कम है.

पाकिस्तान की सैन्य रणनीति में लंबे समय से ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ यानी रणनीतिक गहराई की अवधारणा अहम रही है. इसका मतलब था कि अफगानिस्तान में ऐसा राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव बनाए रखा जाए, जिससे भारत के साथ किसी संभावित संघर्ष की स्थिति में पाकिस्तान को पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा का अतिरिक्त भरोसा मिल सके. इस सोच के तहत पाकिस्तान पर अफगानिस्तान में अपने अनुकूल ताकतों और कट्टरपंथी संगठनों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं. पाकिस्तान की सैन्य और खुफिया व्यवस्था पर भी अफगानिस्तान में अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिशों को लेकर सवाल उठते रहे हैं. समय के साथ हालात बदल गए. अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि काबुल में उसकी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता मिलेगी लेकिन हुआ इसका उल्टा- दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और आतंकवाद को लेकर तनाव बढ़ता गया.

पाकिस्तान की मौजूदा परेशानी का सबसे बड़ा कारण तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) है. यह एक अलग संगठन है, जिसे पाकिस्तानी तालिबान भी कहा जाता है. इसका उद्देश्य पाकिस्तान में अपनी कट्टरपंथी विचारधारा के मुताबिक शासन व्यवस्था स्थापित करना है. TTP और अफगान तालिबान के बीच वैचारिक और ऐतिहासिक संबंध रहे हैं. पाकिस्तान का आरोप है कि TTP के लड़ाके अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करके पाकिस्तान में हमले करते हैं और हमलों के बाद वहां शरण लेते हैं. इस संगठन ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और दूसरे सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बलों, पुलिस और सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया है. लगातार हो रहे इन हमलों ने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. इस तरह पाकिस्तान जिस क्षेत्र में कभी अपने रणनीतिक प्रभाव को मजबूत करना चाहता था, वही इलाका अब उसके लिए असुरक्षा का कारण बन रहा है.

इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. मार्को रुबियो के बयान से संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन पाकिस्तान की सुरक्षा चिंताओं से परिचित है, लेकिन तालिबान सरकार पर उसका प्रभाव सीमित है. अगस्त 2021 में अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से वापसी के बाद वहां उसका प्रत्यक्ष सैन्य और राजनीतिक प्रभाव काफी कम हो गया. तालिबान ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई है और अमेरिका के दबाव के बावजूद अपने फैसलों पर कायम रहने की कोशिश की है. ऐसे में अमेरिका की सहानुभूति पाकिस्तान के लिए तत्काल सुरक्षा समाधान नहीं बन सकती. इस्लामाबाद को अपनी पश्चिमी सीमा पर बढ़ते खतरे से निपटने के लिए खुद ही रणनीति तैयार करनी होगी.

भारत इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ता तनाव दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है. भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगाता रहा है. ऐसे में पाकिस्तान के भीतर सक्रिय आतंकी संगठनों और उसकी पश्चिमी सीमा पर बढ़ती अस्थिरता को क्षेत्रीय सुरक्षा के नजरिये से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपनी सीमाओं की सुरक्षा मजबूत रखना और आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख बनाए रखना है. पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति यह भी दिखाती है कि किसी दूसरे देश में कट्टरपंथी संगठनों को रणनीतिक फायदे के लिए बढ़ावा देने की नीति लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रखी जा सकती. ऐसे संगठन समय के साथ अपने समर्थकों और संरक्षकों के लिए भी खतरा बन सकते हैं.

अगर इस पूरे सीन को देखा जाए, तो पाकिस्तान आज अपनी पश्चिमी सीमा पर उसी कट्टरपंथी नेटवर्क की चुनौती से जूझ रहा है, जिसे कभी उसने अपने रणनीतिक हितों के लिए उपयोगी माना था. अमेरिका की सीमित भूमिका, तालिबान का स्वतंत्र रुख और TTP के बढ़ते हमले इस संकट को और जटिल बना रहे हैं. दक्षिण एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच यह पाकिस्तान की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए एक बड़ी परीक्षा है.

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