पटना: बिहार की राजनीति के ‘चाणक्य’ का सियासी दौर अब ढलान पर है? पिछले 20-25 सालों से बिहार की राजनीति में जिस पार्टी का दबदबा रहा है, अब उसी पार्टी के भीतर वर्चस्व की जंग शुरू होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं. जेडीयू में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से पीछे हटने के बाद से ही पार्टी में नई पीढ़ी और नए नेतृत्व की भूमिका तेजी से बढ़ रही है. नीतीश कुमार के बेटे निशांत पहले राजनीति से दूर रहना चाहते थे, लेकिन जब से उन्होंने राजनीति में कदम रखा है, हर तरफ छाए हुए हैं. निशांत पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शन में लगातार बड़े फैसले ले रहे हैं. चाहे बिहार एमएलसी चुनाव में पटना स्नातक सीट से जेडीयू उम्मीदवार नीरज कुमार के साथ मजबूती से खड़े होना हो या फिर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की बात, हर कदम पर उन्हें जेडीयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा का पूरा समर्थन मिल रहा है. हालांकि, पटना स्नातक सीट के चुनाव नतीजे आने के बाद नीरज कुमार ने केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को लेकर जिस अंदाज में बयान दिया है, उसके सियासी गलियारों में अब कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं.
ऐसे में सवाल यह है कि क्या कभी नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद और प्रभावशाली सहयोगियों में गिने जाने वाले राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह का पार्टी में प्रभाव घट रहा है? या फिर यह केवल कुछ नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद हैं, जिन्हें ‘ललन युग’ के अंत के तौर पर देखा जा रहा है. इस बदलाव की शुरुआत नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने और राज्यसभा जाने के फैसले से हुई. 14 अप्रैल 2026 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और कहा कि वह बिहार में नई सरकार को अपना सहयोग और मार्गदर्शन देते रहेंगे. इसके बाद बीजेपी के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने.
क्या निशांत कुमार के भरोसेमंद बन गए संजय झा?
इसके बाद जेडीयू में निशांत कुमार की भूमिका बढ़ने लगी. पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में निशांत को भविष्य का नेता बताते हुए संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देने की बात कही गई. संजय झा ने भी कहा था कि निशांत आने वाले दिनों में पार्टी के कामकाज में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. बाद में निशांत बिहार सरकार में मंत्री बने. इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर नेतृत्व की अगली पीढ़ी को लेकर चर्चा तेज कर दी.
क्या केंद्र में ललन सिंह की कुर्सी पर भी खतरा?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ललन सिंह की पार्टी के भीतर घटती बताई जा रही पकड़ का असर केंद्र में उनके मंत्री पद पर भी पड़ेगा? फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत सामने नहीं आया है कि उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाया जा रहा है या उनका मंत्रालय बदला जा रहा है. ललन सिंह केंद्र में मंत्री हैं और उनकी भूमिका केवल बिहार जेडीयू की अंदरूनी राजनीति तक सीमित नहीं है. केंद्र में उनका पद एनडीए के राजनीतिक समीकरणों और जेडीयू की संसदीय ताकत से भी जुड़ा है. इसलिए पार्टी के किसी एक नेता से मतभेद या राज्य स्तर पर उभरी नाराजगी को सीधे उनके मंत्रिपद पर संकट मान लेना अभी सही नहीं होगा.
अनंत-नीरज विवाद में ललन की मध्यस्थता, लेकिन नतीजा उलटा पड़ा?
पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का एमएलसी चुनाव जेडीयू के अंदरूनी मतभेदों को सार्वजनिक मंच पर ले आया. पार्टी ने नीरज कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया था, लेकिन मोकामा के जेडीयू विधायक अनंत सिंह ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया. अनंत सिंह ने जनसुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन किया. पार्टी ने इस विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी ललन सिंह को दी थी. संजय झा ने भी कहा था कि ललन सिंह को दोनों नेताओं के बीच बातचीत कर मामला सुलझाने के लिए अधिकृत किया गया है. लेकिन ललन सिंह ने अनंत सिंह से बातचीत की और उनकी नाराजगी को सामने रखा. बाद में ललन सिंह ने कहा कि अनंत की कुछ शिकायतें हैं और ताली एक हाथ से नहीं बजती. चुनाव के दौरान अनंत सिंह ने नीरज कुमार के खिलाफ प्रचार किया. नतीजे में नीरज कुमार जीत गए और अनुज सिंह को हार का सामना करना पड़ा. इस पूरे प्रकरण ने पार्टी के भीतर यह सवाल खड़ा किया कि क्या ललन सिंह की मध्यस्थता प्रभावी रही या विवाद सुलझाने की कोशिश में उनका रुख ही सवालों के घेरे में आ गया?
जीत के बाद नीरज का इनकार, ललन से बढ़ी तल्खी
चुनाव जीतने के बाद नीरज कुमार का रुख इस विवाद को और चर्चा में ले आया. 29 अक्टूबर को उन्होंने ललन सिंह से मिलने और उनसे आशीर्वाद लेने से इनकार कर दिया. पत्रकारों के सवाल पर उनका जवाब था, ‘कोई सवाल ही नहीं उठता है.’ उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने चुनाव के दौरान जिन मुश्किलों का सामना किया, उन्हें याद रखा जाएगा और सूद सहित नीरज कुमार कर्ज उतार देगा. 31 अक्टूबर को भी नीरज कुमार ने ललन सिंह पर तंज कसते हुए कहा कि अगर उन्होंने बधाई ही नहीं दी तो वह बधाई स्वीकार कैसे करेंगे. दूसरी तरफ, उन्होंने संजय झा की तारीफ की और निशांत कुमार की राजनीतिक सक्रियता को लेकर सकारात्मक बयान दिए. इस घटनाक्रम ने ललन और नीरज के बीच व्यक्तिगत नाराजगी को जेडीयू के भीतर नेतृत्व और प्रभाव की बहस से जोड़ दिया है.
ललन वरिष्ठतम नेता, छोटी बातें होती रहती हैं- संजय
नीरज कुमार के बयान के बाद संजय झा ने सार्वजनिक रूप से ललन सिंह का बचाव किया. 30 अक्टूबर को उन्होंने कहा कि ललन सिंह जेडीयू के वरिष्ठतम नेताओं में हैं और उन्होंने पार्टी को मजबूत करने तथा उसका विस्तार करने में योगदान दिया है. संजय झा का यह बयान महज एक औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं माना जा रहा. एक तरफ नीरज कुमार खुलकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं, दूसरी तरफ पार्टी का कार्यकारी नेतृत्व ललन सिंह की वरिष्ठता और योगदान को सामने रख रहा है. इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर इस विवाद को बड़ा रूप नहीं देना चाहता.
क्या संजय झा और निशांत की जोड़ी बन रही है नई धुरी?
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद जेडीयू के सामने सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व की निरंतरता का है. नीतीश पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं, लेकिन अब वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं हैं. ऐसे में संगठन के रोजमर्रा के कामकाज में संजय झा की भूमिका अहम हो गई है. दूसरी ओर निशांत कुमार को पार्टी के भविष्य के चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई देती है. जून 2026 में जेडूयी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद संजय झा ने साफ कहा था कि निशांत आने वाले दिनों में संगठन में बड़ी भूमिका निभाएंगे. पार्टी की बैठकों में भी उनके लिए अधिक जिम्मेदारी की मांग उठी थी. निशांत की राजनीतिक सक्रियता और मंत्री के तौर पर उनकी मौजूदगी ने उन्हें पार्टी के नए समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है.
इस स्थिति में ललन सिंह की भूमिका को समझना जरूरी है. वह केवल एक वरिष्ठ नेता नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में संगठन, संसदीय रणनीति और गठबंधन के समीकरणों को समझने वाले अनुभवी चेहरों में रहे हैं. लेकिन अब पार्टी के भीतर जिम्मेदारियों का नया बंटवारा हो रहा है. संजय झा संगठनात्मक नेतृत्व संभाल रहे हैं, निशांत को भविष्य की भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है.