MLC चुनाव में JDU की हार से NDA में रार! क्या बिहार में फिर दोहराई जा रही 2020 की कहानी?

MLC चुनाव में JDU की हार से NDA में रार! क्या बिहार में फिर दोहराई जा रही 2020 की कहानी?


पटना. बिहार की राजनीति में इन दिनों एमएलसी (MLC) चुनाव के नतीजों के बाद एक बार फिर NDA के अंदर आपसी तालमेल और सहयोगी दलों की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं. विधान परिषद की तीन सीटों पर जनता दल यूनाइटेड (JDU) के उम्मीदवारों की हार ने पार्टी के भीतर नाराजगी को हवा दी है. इस नाराजगी की वजह सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि हार के बाद पैदा हुए राजनीतिक हालात भी हैं. खासकर उन दो निर्दलीय उम्मीदवारों का BJP के करीब आना, जिन्होंने JDU प्रत्याशियों को हराया है, गठबंधन की राजनीति में नई बहस का कारण बन गया है.

सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में JDU उम्मीदवारों को हराने वाले राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी ने चुनाव परिणाम आने के बाद BJP के साथ नजदीकी बढ़ाई. दोनों ने 31 अक्टूबर को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और BJP के वरिष्ठ नेताओं के साथ मुलाकात की और BJP विधायक दल की बैठक में भी हिस्सा लिया. शुरुआती तौर पर उनके BJP में शामिल होने की खबर सामने आई, लेकिन बाद में दोनों ने स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी की औपचारिक सदस्यता नहीं ली है, बल्कि NDA सरकार को समर्थन दिया है. BJP प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी यही बात कही. इसके बावजूद इस पूरे घटनाक्रम ने JDU की नाराजगी और विपक्ष के हमले को नया आधार दे दिया है.

क्यों उठ रहे हैं ये सवाल?

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि MLC चुनाव में JDU को हार क्यों मिली, बल्कि यह भी है कि गठबंधन के भीतर चुनावी सहयोग की शर्तें क्या हैं? क्या NDA के सभी घटक दल एक-दूसरे के उम्मीदवारों के लिए समान रूप से काम कर रहे हैं? क्या चुनाव के दौरान बनी रणनीति जमीन पर लागू हुई? और क्या चुनाव जीतने के बाद BJP का निर्दलीय MLC को अपने पाले में लाना JDU के राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है? इन सवालों के बीच 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव की यादें भी ताजा हो रही हैं.

तीन सीटों पर हार, JDU के भीतर क्यों उठ रहे सवाल?

बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए हुए चुनाव में BJP और JDU के बीच 4-4 सीटों का बंटवारा हुआ था. नतीजों में JDU को अपने हिस्से की चार सीटों में से सिर्फ एक पर जीत मिली, जबकि तीन सीटों पर उसके उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा. इनमें सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक सीट के नतीजे खास तौर पर चर्चा में हैं, क्योंकि यहां JDU उम्मीदवारों को निर्दलीय प्रत्याशियों ने शिकस्त दी.

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय उम्मीदवार राहुल राज ने JDU के आनंद पुष्कर को 1,815 मतों से हराया. वहीं तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय बंशीधर ब्रजवासी ने JDU के अभिषेक झा को 9,147 मतों के बड़े अंतर से पराजित किया. ब्रजवासी ने लगातार दूसरी बार इस सीट पर जीत दर्ज की. इन दोनों नतीजों ने JDU के सामने संगठन और चुनावी प्रबंधन से जुड़े सवाल खड़े किए हैं.

JDU के नेताओं की नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि NDA के भीतर उम्मीदवारों के पक्ष में जिस तरह के समन्वय और सहयोग की अपेक्षा की गई थी, वह जमीन पर दिखाई नहीं दिया. JDU नेताओं का आरोप है कि गठबंधन की बैठकों में बनी रणनीति के मुताबिक BJP के सांसदों, विधायकों और स्थानीय नेताओं को भी प्रचार में सक्रिय भूमिका निभानी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

JDU उम्मीदवार आनंद पुष्कर ने सार्वजनिक तौर पर कुछ BJP नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए. उन्होंने गठबंधन धर्म और चुनाव के दौरान किए गए वादों का मुद्दा उठाया. पुष्कर ने आरोप लगाया कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें भरोसा दिया गया था कि मौजूदा MLC को चुनाव नहीं लड़ने के लिए मनाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब NDA की बैठक में साझा प्रचार और मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति बनी थी, तो उसका पालन क्यों नहीं किया गया.

JDU को हराने वाले निर्दलीय BJP के करीब कैसे पहुंचे?

इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी का BJP के साथ जुड़ाव है. दोनों ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और NDA के आधिकारिक उम्मीदवारों को हराया. चुनाव से पहले राहुल राज BJP से जुड़े रहे थे. सारण शिक्षक सीट JDU के खाते में जाने के बाद उन्हें NDA का टिकट नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. पार्टी के फैसले के खिलाफ चुनाव लड़ने पर BJP ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित भी किया था.

दूसरी तरफ, बंशीधर ब्रजवासी तिरहुत स्नातक सीट से पहले भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज कर चुके थे. इस बार भी उन्होंने JDU के अभिषेक झा को हराकर अपनी सीट बरकरार रखी. दोनों नेताओं की जीत के बाद BJP नेताओं के साथ उनकी मुलाकात और पार्टी के कार्यक्रमों में मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चा तेज कर दी.

31 अक्टूबर को दोनों नेता BJP के कार्यक्रम में पहुंचे. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में उनका स्वागत किया गया. इसके बाद दोनों के BJP में शामिल होने की खबरें सामने आईं. लेकिन 1 नवंबर को दोनों ने औपचारिक सदस्यता लेने की बात से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने केवल BJP और NDA सरकार को समर्थन दिया है.

2020 चुनाव से क्यों हो रही तुलना?

NDA के भीतर मौजूदा नाराजगी की तुलना 2020 के विधानसभा चुनाव से भी की जा रही है. उस समय LJP ने NDA से अलग होकर चुनाव लड़ा था, लेकिन चिराग पासवान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन जताते हुए नीतीश कुमार और JDU के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे. BJP के कई बागी नेता भी LJP के टिकट पर चुनाव मैदान में थे. JDU नेताओं ने तब आरोप लगाया था कि LJP और BJP के बागी उम्मीदवारों की वजह से पार्टी को नुकसान हुआ. चुनाव परिणाम में BJP को 74 और JDU को 43 सीटें मिली थीं. इसके बाद NDA में शक्ति संतुलन को लेकर भी चर्चा तेज हुई थी.

हालांकि, उस समय LJP NDA से अलग होकर चुनाव लड़ रही थी, जबकि इस बार BJP और JDU दोनों गठबंधन सरकार में सहयोगी हैं. इसलिए दोनों घटनाक्रम पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं, लेकिन चुनावी तालमेल और आपसी भरोसे का सवाल दोनों जगह दिखाई देता है.

BJP और JDU के सामने क्या चुनौती?

विधान परिषद में दो निर्दलीय सदस्यों का समर्थन BJP के लिए संख्यात्मक रूप से फायदेमंद हो सकता है. वहीं JDU के सामने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने की चुनौती है. विपक्ष भी इस मुद्दे पर BJP को घेर रहा है और निर्दलीय MLC के राजनीतिक रुख पर सवाल उठा रहा है. अब निगाहें दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व पर हैं. क्या JDU इस मुद्दे को गठबंधन के भीतर उठाएगी? क्या BJP नेतृत्व नाराजगी दूर करने की पहल करेगा? या फिर यह विवाद केवल चुनाव बाद की बयानबाजी तक सीमित रहेगा?



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