MBBS Abroad Rules: भारत में मेडिकल की पढ़ाई के लिए सरकारी और अच्छे निजी मेडिकल कॉलेजों में सीट पाना आसान नहीं है. यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में भारतीय छात्र MBBS करने के लिए विदेश का रुख करते हैं. जॉर्जिया, रूस, कजाकिस्तान और दूसरे देशों में मेडिकल की पढ़ाई करने का सपना देखने वाले छात्रों के लिए वहां के कॉलेजों की फीस, एडमिशन प्रक्रिया और पढ़ाई की अवधि के साथ एक और बात बेहद जरूरी है. वह यह है कि विदेश से MBBS की डिग्री लेने के बाद क्या वे भारत में डॉक्टर बनने की प्रक्रिया पूरी कर पाएंगे? इस सवाल पर नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के अलग-अलग जवाबों ने छात्रों की चिंता बढ़ा दी है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक मामला खासतौर पर जॉर्जिया से छह साल का MBBS कोर्स करने वाले भारतीय छात्रों से जुड़ा है. दो अलग-अलग अभ्यर्थियों ने NMC से पूछा था कि क्या जॉर्जिया से छह साल का MBBS कोर्स पूरा करने के बाद वे भारत में फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) देने के पात्र होंगे? इस सवाल पर आयोग की ओर से दो अलग-अलग तारीखों पर दिए गए जवाबों ने स्टूडेंटस को कंफयूजन में डाल दिया. इसी का फायदा उठाकर कुछ एजुकेशन कंसल्टेंट छात्रों को कथित तौर पर ऐसी जानकारी दे रहे हैं जिससे भविष्य में उनकी मेडिकल करियर की राह मुश्किल हो सकती है. कानूनी विशेषज्ञों ने इस पूरे मामले पर चिंता जताते हुए NMC और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से स्थिति साफ करने की मांग की है. उनका कहना है कि विदेश में MBBS में दाखिला लेने से पहले छात्रों को यह पता होना चाहिए कि वहां की डिग्री भारत में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए निर्धारित शर्तें पूरी करती है या नहीं.
जॉर्जिया से MBBS करने वाले छात्रों ने NMC से पूछे ये सवाल
पूरा विवाद तब सामने आया जब मेडिकल की पढ़ाई के इच्छुक दो अभ्यर्थियों ने जन शिकायत पोर्टल के जरिए NMC से एक ही तरह का सवाल पूछा. दोनों जानना चाहते थे कि अगर वे जॉर्जिया से छह साल का MBBS कोर्स पूरा करते हैं तो क्या उन्हें भारत में FMGE परीक्षा देने की अनुमति मिलेगी? इस परीक्षा को पास करने के बाद ही विदेश से मेडिकल की डिग्री लेकर आने वाले भारतीय छात्रों के लिए भारत में डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस करने का रास्ता खुलता है. पहले अभ्यर्थी को 24 सितंबर को NMC की ओर से जवाब दिया गया.
इसमें आयोग ने नेशनल मेडिकल कमीशन (Foreign Medical Graduate Licentiate) Regulations, 2021 का हवाला देते हुए कहा कि किसी विदेशी मेडिकल डिग्री को भारत में FMGE देने के योग्य तभी माना जा सकता है जब संबंधित देश में MBBS कोर्स पूरा करने के बाद उम्मीदवार को स्वतंत्र रूप से मेडिकल प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिलता हो यानी केवल जॉर्जिया से छह साल का मेडिकल कोर्स पूरा कर लेना ही पर्याप्त नहीं है. वहां की व्यवस्था में छात्र को स्वतंत्र रूप से डॉक्टर के तौर पर काम करने की अनुमति भी मिलनी चाहिए. इसी शर्त को लेकर जॉर्जिया में पढ़ाई करने की योजना बना रहे भारतीय छात्रों के सामने सवाल खड़ा हो गया है.
13 अक्टूबर के दूसरे जवाब ने बढ़ाया कन्फ्यूजन
इस मामले में परेशानी तब और बढ़ गई जब दूसरे अभ्यर्थी ने इसी तरह का सवाल पूछा. NMC ने 13 अक्टूबर को दिए गए जवाब में कहा कि स्वतंत्र लाइसेंसिंग व्यवस्था से जुड़े प्रावधानों की जांच सक्षम प्राधिकारी और एक विशेषज्ञ समिति कर रही है. यही वह जवाब था जिसे लेकर अब विवाद बढ़ गया है. पहले जवाब में आयोग ने स्वतंत्र लाइसेंस को जरूरी शर्त बताया था जबकि दूसरे जवाब में कहा गया कि इस व्यवस्था से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा की जा रही है. इसके बाद उम्मीदवारों ने तीसरी बार जन शिकायत पोर्टल पर सवाल उठाया. उन्होंने पूछा कि आखिर 24 सितंबर और 13 अक्टूबर को दिए गए दोनों जवाबों में से किसे सही माना जाए? हालांकि, इस बार भी NMC ने कोई नया और स्पष्ट स्पष्टीकरण देने के बजाय 2021 के विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट लाइसेंसिंग नियमों का ही हवाला दिया.
फायदा उठा रहे एजुकेशन कंसल्टेंट?
इस पूरे मामले में कानूनी विशेषज्ञों ने एजुकेशन कंसल्टेंट की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दिल्ली हाईकोर्ट में मेडिकल मामलों से जुड़े वकील सचिन जैन के हवाले से कहा गया है कि कुछ एजुकेशन कंसल्टेंट विदेशी मेडिकल यूनिवर्सिटी से मोटा कमीशन लेकर भारतीय छात्रों को विदेश में MBBS के लिए दाखिला दिला रहे हैं. उनका कहना है कि ऐसे कंसल्टेंट NMC के 13 अक्टूबर वाले जवाब का हवाला देकर छात्रों को यह भरोसा दिला रहे हैं कि स्वतंत्र लाइसेंस की शर्त को हटाया जा सकता है या किसी दूसरे तरीके से पूरा किया जा सकता है. छात्रों से यह भी कहा जा रहा है कि आगे चलकर नियमों में बदलाव हो सकता है और उन्हें भारत में FMGE देने तथा डॉक्टर के रूप में काम करने में कोई परेशानी नहीं होगी.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सचिन जैन ने कहा है कि इस तरह के दावे हजारों छात्रों के करियर को खतरे में डाल सकते हैं. उनका कहना है कि NMC अपने स्तर पर कानून को खत्म या बदल नहीं सकता. वह सरकार को कानून में संशोधन करने की सिफारिश कर सकता है.ऐसे में किसी कंसल्टेंट का यह कहना कि भविष्य में स्वतंत्र लाइसेंस की शर्त अपने आप हट जाएगी. छात्रों के लिए जोखिम भरा हो सकता है. जब तक नियमों में आधिकारिक बदलाव नहीं होता, तब तक छात्रों को मौजूदा प्रावधानों को ही ध्यान में रखकर फैसला करना चाहिए.
जॉर्जिया के मेडिकल एजुकेशन रेगुलेटर की FAQ से भी बढ़ा विवाद
इस मामले में सिर्फ NMC के जवाब ही सवालों के घेरे में नहीं हैं. जॉर्जिया के नेशनल सेंटर फॉर एजुकेशनल क्वालिटी एन्हांसमेंट (NCEQE) की वेबसाइट पर मौजूद FAQ ने भी स्थिति को और उलझा दिया है. NCEQE का दावा है कि जॉर्जिया विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट के लिए NMC की ओर से निर्धारित सभी शर्तें पूरी करता है. पहली नजर में यह दावा भारतीय छात्रों के लिए राहत देने वाला लग सकता है लेकिन इसी FAQ में जॉर्जिया के मेडिकल प्रैक्टिस कानून का हवाला देते हुए एक दूसरी व्यवस्था का भी जिक्र किया गया है. इसके मुताबिक जॉर्जिया में मेडिकल डॉक्टर (MD) प्रोग्राम पूरा करने वाले ग्रेजुएट को उनकी नागरिकता की परवाह किए बिना जूनियर डॉक्टर के रूप में नौकरी करने का अधिकार मिलता है.
इसके लिए उन्हें अतिरिक्त परीक्षा देने की जरूरत नहीं होती हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण शर्त भी है. जूनियर डॉक्टर के रूप में काम करने वाला व्यक्ति अपने काम को स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकता. उसे ऐसे व्यक्ति के निर्देशन और जिम्मेदारी के तहत डॉक्टर के काम करने होते हैं, जिसे स्वतंत्र रूप से मेडिकल प्रैक्टिस करने की अनुमति प्राप्त है. यही बात भारतीय छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि NMC के नियमों में विदेश से MBBS करने वाले उम्मीदवार के लिए उस देश में स्वतंत्र रूप से मेडिकल प्रैक्टिस करने का लाइसेंस होना जरूरी बताया गया है. जबकि जॉर्जिया के FAQ में जूनियर डॉक्टर के रूप में काम करने की अनुमति और स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करने की अनुमति के बीच अंतर दिखाई देता है.
जूनियर डॉक्टर की नौकरी और स्वतंत्र मेडिकल प्रैक्टिस में क्या है अंतर?
इस विवाद को समझने के लिए छात्रों को दोनों व्यवस्थाओं के बीच का अंतर जानना जरूरी है. जूनियर डॉक्टर के तौर पर काम करने का मतलब है कि मेडिकल ग्रेजुएट किसी अनुभवी और अधिकृत डॉक्टर की निगरानी में मरीजों की देखभाल और अन्य चिकित्सकीय काम कर सकता है. ऐसे डॉक्टर को स्वतंत्र रूप से मेडिकल प्रैक्टिस करने की अनुमति नहीं होती.
इसके उलट स्वतंत्र मेडिकल लाइसेंस का मतलब है कि संबंधित व्यक्ति को देश के नियमों के तहत अपने स्तर पर डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस करने का अधिकार प्राप्त है.NMC के 2021 के नियमों में स्वतंत्र लाइसेंस की शर्त होने के कारण यह अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है. अगर किसी देश में मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिर्फ जूनियर डॉक्टर के रूप में काम करने की अनुमति मिलती है और स्वतंत्र प्रैक्टिस का अधिकार नहीं मिलता, तो विदेशी मेडिकल डिग्री की भारत में FMGE पात्रता को लेकर सवाल उठ सकते हैं.
MBBS में एडमिशन लेने से पहले छात्र किन बातों का रखें ध्यान?
इस पूरे विवाद से विदेश में MBBS करने की योजना बना रहे छात्रों के लिए एक बड़ी सीख सामने आती है. किसी देश या मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने से पहले केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि वहां छह साल का MBBS कोर्स उपलब्ध है या नहीं. यह जानना भी जरूरी है कि कोर्स पूरा करने के बाद उस देश में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए किस तरह का लाइसेंस दिया जाता है.छात्रों को एडमिशन से पहले संबंधित देश के मेडिकल कानून, लाइसेंसिंग प्रक्रिया और स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करने की पात्रता की जानकारी लेनी चाहिए. एजुकेशन कंसल्टेंट या विदेशी यूनिवर्सिटी के किसी प्रतिनिधि की मौखिक गारंटी पर ही लाखों रुपये खर्च करने का फैसला नहीं करना चाहिए. उनसे नियमों और पात्रता से जुड़ी आधिकारिक जानकारी लिखित रूप में मांगनी चाहिए. खासतौर पर यह समझना जरूरी है कि किसी देश में जूनियर डॉक्टर के रूप में नौकरी करने की अनुमति मिलना और स्वतंत्र रूप से डॉक्टर की प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिलना एक ही बात नहीं है. इसी तरह किसी विदेशी नियामक का यह दावा कि उसका देश NMC की शर्तें पूरी करता है, अपने आप में भारत में FMGE पात्रता की अंतिम पुष्टि नहीं माना जाना चाहिए.