साउथ कोर‍िया का चीन को एक्‍सपोर्ट अचानक 132% बढ़ा, आख‍िर बेचा क्‍या, भारत क्यों रह गया पीछे?

साउथ कोर‍िया का चीन को एक्‍सपोर्ट अचानक 132% बढ़ा, आख‍िर बेचा क्‍या, भारत क्यों रह गया पीछे?


चीन दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है. वहां इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और तकनीक से जुड़े सामान की भारी ड‍िमांड है. भारत के पास ये सबकुछ है. भारत वहां मार्केट बनाना चाहता है, लेकिन चीन की चालबाजी आड़े आ रही. वहीं साउथ कोर‍िया की चांदी हो रही है. भारत प‍िछले साल जहां स‍िर्फ 19.47 अरब डॉलर का माल चीन को एक्‍सपोर्ट कर पाया, वहीं साउथ कोर‍िया ने अकेले अक्टूबर 2026 में चीन को 26.98 अरब डॉलर का सामान बेच दिया. यानी साउथ कोरिया ने एक महीने में चीन को भारत के पूरे साल के एक्‍सपोर्ट से भी ज्यादा सामान भेज दिया. यह बढ़ोत्‍तरी 133.6% ज्‍यादा है. इसकी सबसे बड़ी वजह सेमीकंडक्टर और AI से जुड़ी चिप की मांग रही.

साउथ कोरिया के एक्‍सपोर्ट में यह उछाल ऐसे समय आया है, जब दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश कर रही हैं. डेटा सेंटर, AI सर्वर और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के लिए बड़ी संख्या में सेमीकंडक्टर और मेमोरी चिप की जरूरत पड़ रही है. साउथ कोरिया की कंपनियां इसी मांग का फायदा उठा रही हैं. अक्टूबर में चीन को साउथ कोरिया का निर्यात सालाना आधार पर 133.6% बढ़कर 26.98 अरब डॉलर पहुंच गया. यह लगातार पांचवां महीना रहा, जब साउथ कोरिया ने चीन को 20 अरब डॉलर से ज्यादा का सामान निर्यात किया.

साउथ कोरिया ने चिप के दम पर चीन में बनाई पकड़

साउथ कोरिया के चीन को निर्यात में सबसे बड़ा योगदान सेमीकंडक्टर का रहा. अक्टूबर के शुरुआती 25 दिनों में ही चीन को सेमीकंडक्टर का निर्यात 331% बढ़कर 14.8 अरब डॉलर पहुंच गया. इसके अलावा वायरलेस कम्युनिकेशन उपकरणों की सप्लाई ने भी निर्यात को सहारा दिया. साउथ कोरिया का कुल निर्यात अक्टूबर में 93.7% बढ़कर 115.3 अरब डॉलर हो गया. इसमें अकेले सेमीकंडक्टर का हिस्सा 56.4 अरब डॉलर रहा, जो कुल निर्यात का लगभग आधा है.

यह सिर्फ चीन में साउथ कोरिया की बिक्री बढ़ने की कहानी नहीं है. इसके पीछे दोनों देशों के उद्योगों के बीच बना सप्लाई चेन का मजबूत रिश्ता भी है. साउथ कोरिया मेमोरी चिप बनाने में मजबूत है, जबकि चीन के पास इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, तैयार उत्पाद बनाने और बड़े घरेलू बाजार की ताकत है. यानी एक देश चिप और जरूरी तकनीकी पुर्जे उपलब्ध कराता है, तो दूसरा उनका इस्तेमाल करके इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद और दूसरे उपकरण तैयार करता है. चीनी विश्लेषक वांग पेंग के मुताबिक, दोनों देशों के उद्योग एक-दूसरे की सप्लाई चेन से गहराई से जुड़े हुए हैं.

भारत-चीन कारोबार में बढ़ोतरी, लेकिन घाटा भी बड़ा

भारत और चीन के बीच कारोबार भी लगातार बढ़ रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार का संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है. वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 151.10 अरब डॉलर रहा. भारत ने चीन को 19.47 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि चीन से 131.63 अरब डॉलर का सामान आयात किया. पिछले वित्त वर्ष में भारत का चीन को निर्यात 14.25 अरब डॉलर और आयात 113.46 अरब डॉलर था. यानी एक साल में निर्यात 36.62% बढ़ा, लेकिन आयात भी 16.03% बढ़ गया.

भारत चीन से मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल उपकरण, कंप्यूटर, रसायन और प्लास्टिक से जुड़ा सामान खरीदता है. वित्त वर्ष 2025-26 में अकेले इलेक्ट्रॉनिक सामान का आयात 49.21 अरब डॉलर रहा. इसके मुकाबले भारत चीन को इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, पेट्रोलियम उत्पाद, लौह अयस्क, समुद्री उत्पाद और रसायन निर्यात करता है. भारत का निर्यात बढ़ने के बावजूद चीन के साथ व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो एक साल पहले 99.21 अरब डॉलर था. दूसरे शब्दों में, भारत चीन को जितने मूल्य का सामान बेचता है, उससे करीब 6.8 गुना ज्यादा सामान उससे खरीदता है.

क्या चीन भारतीय कंपनियों को पर्याप्त मौका नहीं दे रहा?

भारत के लिए चुनौती सिर्फ चीन से ज्यादा सामान खरीदने की नहीं, बल्कि अपने उत्पादों को वहां ज्यादा जगह दिलाने की भी है. भारत के वाणिज्य मंत्रालय से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, चीन भारत के लिए बड़ा आयात स्रोत है, लेकिन निर्यात के मामले में उसकी हिस्सेदारी सीमित है. बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने भी व्यापार संबंधों पर अपनी जानकारी में बाजार तक पहुंच से जुड़ी समस्याओं का जिक्र किया है. यानी भारतीय कंपनियों के सामने चीन के बाजार में कारोबार बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है.



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