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Bihar Independent MLC Controversy: बिहार विधान परिषद चुनाव परिणाम आने के बाद से ही प्रदेश की राजनीति गरमा गई है. शनिवार (31 अक्टूबर) को दो निर्दलीय एमएलसी बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज भाजपा कार्यालय पहुंचने और भाजपा ज्वाइन करने की खबर ने बवाल खड़ा कर दिया है. एक ओर फोटो में दोनों के हाथ में भाजपा की सदस्यता पर्ची दिखी, तो दूसरी तरफ रविवार को प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने कहा कि उन्होंने सिर्फ समर्थन दिया है, सदस्यता नहीं ली. अब सवाल दल-बदल कानून पर आ टिका है और विपक्षी पार्टियां कानूनी कार्रवाई के लिए कमर कसती नजर आ रहीं हैं. पूरी खबर विस्तार से आगे पढ़िए.
राहुल राज-बंशीधर ब्रजवासी की सदस्यता पर संकट?
पटना. बिहार में विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद नया सियासी विवाद खड़ा हो गया है. तिरहुत स्नातक सीट से बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक सीट से राहुल राज के भाजपा में शामिल होने की घोषणा के बाद विपक्ष ने दल-बदल कानून का मुद्दा उठाया है. आरजेडी और जन सुराज ने दोनों की सदस्यता रद्द करने की मांग की है. हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद दोनों नेताओं ने कहा कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता नहीं ली, बल्कि पार्टी को समर्थन दिया है.
बता दें कि बीते 23 अक्टूबर को बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर चुनाव हुए थे. इसके बाद बाद 27 अक्टूबर को परिणाम आने के बाद के बाद 31 अक्टूबर को राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला. तिरहुत स्नातक सीट से लगातार दूसरी बार जीतने वाले बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक सीट से निर्वाचित राहुल राज ने पटना स्थित भाजपा कार्यालय में पार्टी में शामिल होने की घोषणा की. दोनों नेताओं की भाजपा कार्यालय में पार्टी की सदस्यता पर्ची के साथ तस्वीरें भी सामने आईं. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और अन्य नेताओं की मौजूदगी में दोनों भाजपा विधानमंडल दल की बैठक में भी पहुंचे.
दल-बदल कानून के तहत सदस्यता रद्द करने की मांग
इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद आरजेडी और जन सुराज ने भाजपा पर जनादेश के अपमान का आरोप लगाया. विपक्ष का कहना है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून का उल्लंघन है. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने दोनों विधान पार्षदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की. वहीं, आरजेडी ने विधान परिषद के सभापति के समक्ष मामला उठाने की बात कही है. जन सुराज ने भी इस फैसले को सभापति, चुनाव आयोग और न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा की है.
विवाद बढ़ा तो भाजपा और दोनों नेताओं ने बदला रुख
विवाद बढ़ने के बाद 1 नवंबर को दोनों नेताओं ने कहा कि उन्होंने भाजपा की औपचारिक सदस्यता नहीं ली है, बल्कि पार्टी को अपना समर्थन दिया है. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी यही बात कही. भाजपा का कहना है कि दोनों निर्दलीय विधान पार्षद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार के नेतृत्व में विश्वास जताते हुए पार्टी का समर्थन कर रहे हैं.
कौन हैं दोनों निर्दलीय MLC
बता दें कि बंशीधर ब्रजवासी तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार दूसरी बार जीते हैं. वह इस सीट पर मजबूत पकड़ रखते हैं. वहीं राहुल राज सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीते हैं. वह भाजपा के बागी माने जाते हैं. एनडीए में यह सीट जेडीयू के खाते में गई थी, इसलिए उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत प्राप्त की. दोनों की जीत के बाद से ही कयास थे कि वह एनडीए के साथ जाएंगे और हुआ भी ठीक ऐसा ही ही. दोनों भाजपा कार्यालय पहुंचे और पार्टी की सदस्यता का पट्टा भी पहन लिया. लेकिन अब कह रहे हैं कि शिक्षकों के हित में केवल वर्तमान सरकार का समर्थन कर रहे हैं.
क्या कहता है संविधान का दसवीं अनुसूची वाला कानून?
संविधान की 10वीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून साफ कहता है कि कोई निर्दलीय सदस्य अगर चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसकी सदस्यता खत्म हो सकती है. संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के अनुसार, निर्दलीय निर्वाचित सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है. स्पष्ट है कि निर्दलीय को निर्दलीय ही रहना होता है. वह किसी दल को बाहर से समर्थन दे सकता है, पर पार्टी की सदस्यता नहीं ले सकता. विपक्ष इसी नियम का हवाला दे रहा है. राजद का कहना है कि अगर उन्होंने सदस्यता ली है तो सभापति को उनकी सदस्यता रद्द करनी चाहिए. हालांकि, दोनों नेताओं का कहना है कि उन्होंने पार्टी की सदस्यता नहीं ली है.अब विवाद का मुख्य सवाल यही है कि भाजपा की सदस्यता लेने की घोषणा और सदस्यता पर्चियों के बावजूद क्या इसे औपचारिक दल-बदल माना जाएगा. इस पर अंतिम फैसला विधान परिषद के सभापति को करना होगा.
अब आगे राजनीति किस ओर बढ़ेगी?
बहरहाल, बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा के लिए यह तकनीकी पेंच है. अगर समर्थन की बात है तो दल-बदल कानून नहीं लगेगा, वहीं अगर सदस्यता ली है तो सदस्यता पर खतरा है. इसलिए अब भाजपा इसे समर्थन बता रही है, जबकि विपक्ष इसे ज्वाइनिंग बता रहा है. मामला विधान परिषद सभापति से लेकर चुनाव आयोग और कोर्ट तक जा सकता है. फिलहाल दोनों एमएलसी के कदम से एनडीए को परिषद में संख्याबल का फायदा मिलेगा, पर कानूनी लड़ाई भी लंबी खिंच सकती है.