न बोलते हैं, न सुनते हैं, फिर भी इशारों से परोस रहे स्वाद, रायपुर के नुक्कड़ कैफे की अनोखी पहल

न बोलते हैं, न सुनते हैं, फिर भी इशारों से परोस रहे स्वाद, रायपुर के नुक्कड़ कैफे की अनोखी पहल


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Raipur Nukkad Cafe: रायपुर के ‘नुक्कड़ कैफे’ में मूक-बधिर कर्मचारी इशारों से ग्राहकों के ऑर्डर लेते हैं और खाना परोसते हैं. यहां किन्नर समाज और मानसिक रूप से दिव्यांग लोगों को भी रोजगार देकर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है. साल 2013 में समता कॉलोनी से शुरू हुआ नुक्कड़ कैफे अब रायपुर से भिलाई और जगदलपुर तक पहुंच चुका है.

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राहुल दुबे(रायपुर),

Raipur Nukkad Cafe: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक ऐसा कैफे है, जहां कर्मचारी बोल और सुन नहीं सकते, लेकिन इशारों से ग्राहकों के ऑर्डर लेते हैं और उन्हें खाना परोसते हैं. शहर का ‘नुक्कड़ कैफे’ अपने अनोखे अंदाज के साथ सामाजिक पहल के लिए भी पहचान बना रहा है. यहां मूक-बधिर, किन्नर समाज और मानसिक रूप से दिव्यांग लोगों को रोजगार देकर आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है.

2013 में समता कॉलोनी से हुई शुरुआत
नुक्कड़ कैफे की शुरुआत साल 2013 में रायपुर की समता कॉलोनी से हुई थी. इसके संस्थापक प्रियंक पटेल का उद्देश्य सिर्फ चाय और नाश्ता बेचना नहीं, बल्कि समाज के ऐसे लोगों को रोजगार और सम्मान देना था, जिन्हें नौकरी पाने में अक्सर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. धीरे-धीरे यह छोटी-सी पहल आगे बढ़ी और आज कई लोगों की आजीविका का साधन बन चुकी है.

इशारों से होता है ग्राहकों से संवाद
कैफे की सबसे बड़ी खासियत यहां काम करने वाले कर्मचारियों का तरीका है. मूक-बधिर कर्मचारी सांकेतिक भाषा से ग्राहकों की बात समझते हैं और उनके ऑर्डर लेते हैं. ग्राहक भी इशारों के जरिए अपनी पसंद बता सकते हैं या पर्ची पर लिखकर ऑर्डर दे सकते हैं. इस व्यवस्था से ग्राहकों को एक अलग अनुभव मिलता है और कर्मचारियों को अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिलता है.

रायपुर से भिलाई और जगदलपुर तक पहुंचा कैफे
नुक्कड़ कैफे से पिछले 10 से 12 वर्षों से जुड़े दीपक कुमार जंघेला बताते हैं कि अब इसके 4 से 5 आउटलेट्स संचालित हो रहे हैं. रायपुर की समता कॉलोनी, न्यू राजेंद्र नगर और वीआईपी रोड के अलावा कैफे का विस्तार भिलाई और जगदलपुर तक हो चुका है.

जगदलपुर में भी खास पहल
कैफे का जगदलपुर स्थित ‘पंडुम’ आउटलेट भी अपनी सामाजिक पहल के लिए खास है. यहां पिछले एक साल से आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों और नक्सलवाद से प्रभावित लोगों को रोजगार देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.

नुक्कड़ कैफे साबित करता है कि सही अवसर और सम्मान मिलने पर हर व्यक्ति अपनी पहचान बना सकता है. यह पहल रोजगार देने के साथ समाज में समानता और आत्मनिर्भरता का संदेश भी दे रही है.



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