Last Updated:
हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज कपूर सिर्फ अपनी शानदार एक्टिंग ही नहीं, बल्कि थिएटर के प्रति अपने जुनून और सादगी के लिए भी याद किए जाते हैं. वह राज्यसभा सांसद बने, लेकिन उनका रहन-सहन और अंदाज नहीं बदला. उन्होंने अपनी थिएटर टीम के साथ थर्ड क्लास में सफर किया और देश के 112 शहरों में 2,662 नाटक पेश किए. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने एक्टिंग से ब्रेक लेने के बाद आखिर जिंदगी कॉटेज में गुजारी थी.
नई दिल्ली. हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी एक्टिंग से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई. लेकिन कुछ सितारे ऐसे भी रहे, जिनका फिल्मों से आगे भी एक बड़ा सपना था. पृथ्वीराज कपूर उन्हीं में से एक थे. उन्होंने फिल्मों में खूब नाम कमाया, लेकिन उनका दिल हमेशा थिएटर के लिए धड़कता रहा. थिएटर के प्रति उनका जुनून ऐसा था कि राज्यसभा सांसद बनने के बाद भी उन्होंने अपनी आदत नहीं बदली. वह अपनी पूरी थिएटर टीम के साथ थर्ड क्लास में सफर करते थे. (फोटो- news18English)
पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को पंजाब के समुंदरी में हुआ था. यह जगह अब पाकिस्तान में है. उनके पिता बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में अधिकारी थे. बचपन से ही पृथ्वीराज को नाटक देखने और अभिनय करने का काफी शौक था. उन्होंने शुरुआती पढ़ाई पंजाब में की और आगे की पढ़ाई के लिए पेशावर चले गए. वहां पढ़ाई के दौरान उनका मन थिएटर में लगने लगा. उन्होंने कानून की पढ़ाई भी शुरू की थी, लेकिन अभिनय के जुनून के आगे पढ़ाई छोड़ दी. (फोटो साभार:instagram@ultraplayott)
अपने सपने को पूरा करने के लिए वह साल 1928 में मुंबई पहुंच गए. यहां उनके लिए शुरुआत आसान नहीं थी. काम पाने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा. उन्होंने फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाए और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई. साल 1930 में आई मूक फिल्म ‘सिनेमा गर्ल’ से उन्हें पहचान मिलने लगी. इसके बाद 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ में भी उन्होंने काम किया. उनकी दमदार आवाज और अभिनय ने दर्शकों का ध्यान खींचा. (फोटो- news18English)
Add News18 as
Preferred Source on Google
पृथ्वीराज कपूर ने अपने करियर में कई यादगार फिल्मों में काम किया. वह कोलकाता के न्यू थिएटर्स से भी जुड़े और वहां कई फिल्मों में नजर आए. फिल्म ‘विद्यापति’ में उनके अभिनय को खूब पसंद किया गया. हालांकि, साल 1941 में आई सोहराब मोदी की फिल्म ‘सिकंदर’ ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई. इसमें उन्होंने सिकंदर का किरदार निभाया था. इसके बाद वह ‘आवारा’, ‘दहेज’ और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी फिल्मों में भी नजर आए. (फोटो- news18English)
फिल्मों में सफलता मिलने के बाद भी उनका थिएटर से रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ा. वह चाहते थे कि अच्छे नाटक सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित न रहें, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोग भी उन्हें देख सकें. इसी सोच के साथ उन्होंने साल 1944 में अपनी थिएटर कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर्स’ शुरू की.
पृथ्वी थिएटर्स का पहला नाटक ‘शकुंतला’ था. इसके बाद कंपनी ने ‘दीवार’, ‘पठान’, ‘गद्दार’, ‘आहूति’ और ‘पैसा’ जैसे कई नाटक पेश किए. इन नाटकों में सिर्फ मनोरंजन ही नहीं था, बल्कि समाज से जुड़े कई गंभीर मुद्दे भी उठाए जाते थे. परिवार, गरीबी, देश के बंटवारे और हिंदू-मुस्लिम एकता जैसे विषयों को नाटकों के जरिए लोगों तक पहुंचाया गया. (फोटो- news18English)
पृथ्वी थिएटर्स के साथ सफर करना बिल्कुल आसान नहीं था. पूरी टीम को एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता था. थिएटर की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, कंपनी ने अपने 16 साल के सफर में 112 शहरों में कुल 2,662 शो किए. सबसे खास बात यह थी कि पृथ्वीराज कपूर ने इन सभी शो में खुद मुख्य भूमिका निभाई. वह अपनी टीम के साथ लगातार सफर करते थे और कलाकारों से अलग किसी खास सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते थे. वह साल 1952 में राज्यसभा के मनोनीत सदस्य बने और 1960 तक इस पद पर रहे. सुविधाएं होने के बाद भी वह अपने साथियों के साथ ही थर्ड क्लास में सफर करते थे. उनके लिए पद और सुविधाओं से ज्यादा जरूरी अपनी टीम के साथ रहना था. (फोटो- news18English)
साल 1960 में उनकी तबीयत खराब रहने लगी, जिसके चलते पृथ्वी थिएटर्स का सफर भी थम गया. थिएटर और सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले. साल 1954 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से सम्मानित किया गया. इसके बाद 1969 में उन्हें पद्म भूषण मिला. साल 1971 में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मानों में शामिल दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया.पृथ्वीराज कपूर का निधन 29 मई 1972 को मुंबई में हुआ. वह कैंसर से जूझ रहे थे. भले ही आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन फिल्मों और थिएटर के लिए उनका जुनून आज भी कलाकारों को प्रेरित करता है. उनका जीवन बताता है कि किसी बड़े मुकाम पर पहुंचने के बाद भी अपनी जड़ों और साथियों को नहीं भूलना चाहिए. (फोटो- news18English)
बता दें कि मुगल-ए-आजम जैसी फिल्में करने वाले पृथ्वीराज कपूर ने इस फिल्म के लिए महज 1 रुपए फीस ली थी. उम्र के साथ पृथ्वीराज फिल्मों से दूरी बनाने लगे. ये जुहू बीच के पास बसे पृथ्वी झोपड़ें में पत्नी के साथ रहने लगे. ये प्रॉपर्टी पृथ्वी ने लीज पर ली थी, लेकिन बाद में उनके बेटे शशि कपूर ने इसे माता-पिता के लिए खरीद लिया था. पृथ्वीराज कपूर का 29 मई 1972 में निधन हो गया था. (फोटो- news18English)