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Crude Import : होर्मुज के रास्ते तेल की आवाजाही बंद हुई तो लगा कि भारत के सामने ईंधन का संकट आ जाएगा, लेकिन ईरान युद्ध के बीच भारत ने अपने तेल आयात को इस कदर डाईवर्सिफाई किया कि अक्टूबर में कुल आयात रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया है. भारत अब अपनी जरूरत का तेल खरीदने के लिए सिर्फ पश्चिम एशियाई देशों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि रूस, अमेरिका और वेनेजुएला तक से तेल मंगा रहा है.
भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है.
नई दिल्ली. अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध और होर्मुज संकट ने जहां दुनियाभर को परेशान कर रखा है, वहीं भारत ने इस संकट का तोड़ निकाल लिया और अक्टूबर में तो रिकॉर्ड तेल का आयात किया. भारत का कच्चे तेल का आयात अक्टूबर में बढ़कर रिकॉर्ड करीब 56 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर पहुंच गया है. ऊर्जा क्षेत्र पर नजर रखने वाली कंपनी केप्लर ने बताया है कि भारतीय रिफाइनरी इकाइयों ने भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद पश्चिम एशिया और रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है और अक्टूबर में रिकॉर्ड आयात किया.
केप्लर के प्रमुख विश्लेषक निखिल दुबे ने बताया कि अक्टूबर में पश्चिम एशिया से भारत को करीब 23 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल की आपूर्ति हुई, जबकि रूस से आयात लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर बना रहा. उन्होंने कहा कि जहाज से जहाज के बीच तेल ट्रांसफर बढ़ने से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते कच्चे तेल की आवाजाही में मदद मिली. इससे सितंबर और अक्टूबर के दौरान खाड़ी देशों से आपूर्ति में सुधार हुआ और भारतीय रिफाइनरी इकाइयों को तेल खरीद के अधिक विकल्प मिले.
नवंबर-दिसंबर में आ सकती है कमी
केप्लर ने बताया कि नवंबर और दिसंबर में रूस से तेल की आपूर्ति में कुछ कमी आने की आशंका है. काला सागर क्षेत्र में हमलों के कारण माल ढुलाई की लागत बढ़ रही है, जिससे रूसी कच्चा तेल भारतीय खरीदारों के लिए महंगा पड़ सकता है. दूसरी ओर, खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ता भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल उपलब्ध करा रहे हैं. दुबे के मुताबिक, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति दोबारा बाधित होती है, तो भारतीय रिफाइनरी कंपनियां अधिक परिवहन लागत के बावजूद रूसी तेल की खरीद फिर बढ़ा सकती हैं.
जरूरत का 90 फीसदी आयात करता है भारत
उन्होंने कहा कि 16 अक्टूबर को ग्राहम अधिनियम के तहत मिली छूट से कुछ भारतीय खरीदारों की रूसी तेल खरीद से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंताएं कम हो सकती हैं. इससे रिफाइनरी इकाइयों को खरीद संबंधी फैसले लेने में अधिक लचीलापन मिलेगा. भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का लगभग 90 फीसदी आयात करता है. ऐसे में वैकल्पिक स्रोतों से तेल की उपलब्धता और उसकी वास्तविक लागत देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि रूस और पश्चिम एशिया के बीच तेल खरीद का फैसला केवल भू-राजनीतिक परिस्थितियों से नहीं, बल्कि कीमत, परिवहन खर्च और आपूर्ति की सुरक्षा जैसे व्यावसायिक पहलुओं से भी तय हो रहा है.
यूक्रेन हमले के बाद से ही बदल गया नजारा
फरवरी, 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से ही ग्लोबल तेल बाजार का नजारा बदल गया है. पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए. यूरोपीय संघ ने समुद्री मार्ग से रूसी कच्चे तेल के आयात पर प्रतिबंध लगाया, जबकि जी-7 देशों ने रूसी तेल पर मूल्य सीमा लागू की. इसके अलावा यूरोपीय खरीदारों के रूसी तेल से दूरी बनाने के बाद रूस ने दूसरे बाजारों को आकर्षित करने के लिए भारी छूट दी. इसमें भारत सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा. युद्ध से पहले जहां भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बेहद कम थी, वहीं बाद में यह बढ़कर 40 से 50 फीसदी तक पहुंच गई थी.