Bilaspur News: दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ गई है. घरों को रोशन करने के लिए लोग तरह-तरह के दीये, झालर और सजावटी सामान खरीद रहे हैं. लेकिन, इस बदलते बाजार में मिट्टी के दीये और पारंपरिक मूर्तियां बनाने वाले कुम्हार परिवारों की चिंता बढ़ गई है. बिलासपुर के कुम्हारपारा में आज भी कई परिवार पीढ़ियों से मिट्टी को आकार देकर दीपावली के लिए दीये, ग्वालिन और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां तैयार कर रहे हैं. घर के पुरुषों से लेकर महिलाएं और बच्चे तक इस काम में हाथ बंटाते हैं. इसके बावजूद बाजार में आर्टिफिशियल दीये, चाइनीज झालर और बाहर से आने वाले सजावटी सामान की बढ़ती मांग ने इनके कारोबार को प्रभावित किया है.
कारीगरों का कहना है कि पहले जहां लोग घरों को सजाने के लिए बड़ी संख्या में मिट्टी के दीये खरीदते थे, वहीं अब उनकी खरीदारी सीमित हो गई है. दूसरी तरफ मिट्टी, भूसा और लकड़ी जैसी कच्ची सामग्री के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन ग्राहक पुराने रेट पर ही सामान मांग रहे हैं. ऐसे में लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है. कुछ कुम्हार परिवारों ने तो दीये बनाना तक बंद कर दिया है और अब केवल मूर्तियां बनाने पर ध्यान दे रहे हैं. कुम्हारों की अपील है कि दीपावली पर लोग स्थानीय कारीगरों के हाथों से बने मिट्टी के दीये और मूर्तियां खरीदें, ताकि वर्षों पुरानी इस कला के साथ इन परिवारों का रोजगार भी बचा रहे.
पीढ़ियों से मिट्टी को आकार दे रहा कुम्हार परिवार
बिलासपुर के कुम्हारपारा में रहने वाले वीरेंद्र प्रजापति 25-26 वर्षों से मिट्टी के दीये और दीपावली में पूजी जाने वाली मूर्तियां बना रहे हैं. उनका कहना है कि यह काम उनके परिवार में दो-तीन पीढ़ियों से चला आ रहा है. उनके दादा-दादी और पिता भी इसी पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े थे. आज भी पूरा परिवार मिलकर दीपावली के लिए ग्वालिन समेत अलग-अलग तरह की मूर्तियां तैयार करता है. हालांकि, पहले की तुलना में अब इस काम की मांग कम हो गई है.
आर्टिफिशियल दीयों और चाइनीज झालरों ने घटाई मांग
वीरेंद्र प्रजापति बताते हैं कि बाजार में बाहर से आने वाले आर्टिफिशियल दीये, चाइनीज झालर और सजावटी सामान की वजह से मिट्टी के दीयों की बिक्री प्रभावित हुई है. पहले लोग घरों को सजाने के लिए बड़ी संख्या में मिट्टी के दीये खरीदते थे, लेकिन अब ग्राहक कम मात्रा में दीये खरीद रहे हैं. लोग सुंदरता और सुविधा के हिसाब से बाजार में उपलब्ध नए विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं. इसका सीधा असर स्थानीय कुम्हारों के कारोबार पर पड़ रहा है.
कच्चे माल की कीमत बढ़ी, लेकिन पुराने रेट पर सामान बेचने का दबाव
कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी परेशानी बढ़ती लागत है. वीरेंद्र प्रजापति के मुताबिक, पहले जिस मिट्टी को ट्रैक्टर से करीब 3000 रुपये में मंगाया जाता था, अब उसकी कीमत बढ़कर 3500 रुपये तक पहुंच गई है. इसी तरह भूसे और लकड़ी के दाम भी बढ़ गए हैं. दूसरी तरफ व्यापारी और ग्राहक पुराने रेट पर ही दीये और मूर्तियां मांगते हैं. ऐसे में कारीगरों ने सामान की कीमत में करीब 5 रुपये तक की बढ़ोतरी की है, लेकिन बढ़े हुए दाम पर सामान बेचने में भी उन्हें परेशानी हो रही है.
तीन पीढ़ियों से दीये बना रहा परिवार, महंगाई के कारण कई ने छोड़ा काम
कुम्हारपारा के ही दीपक प्रजापति पिछले 10 से 12 वर्षों से चाक पर मिट्टी के दीये बना रहे हैं. उनका कहना है कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से इस काम में लगा हुआ है. लेकिन अब महंगाई और बाहर से आने वाले सजावटी सामान के कारण मिट्टी के दीयों की मांग कम हो गई है. यही वजह है कि कुम्हारपारा के कई परिवारों ने दीये बनाना बंद कर दिया है और अब केवल मूर्तियां बनाने का काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि बाहर से आने वाले सामान के कारण स्थानीय कारीगरों का बनाया हुआ माल बाजार में आसानी से नहीं बिक पाता.
हर साल हजारों मूर्तियां तैयार, बिक्री बाजार और मौसम पर निर्भर
कुम्हार परिवार दीपावली के लिए हर साल हजारों की संख्या में मूर्तियां तैयार करते हैं. वीरेंद्र प्रजापति के मुताबिक, उनके यहां एक सीजन में करीब 5 से 6 हजार मूर्तियां तैयार होती हैं, जबकि परिवार के काम के हिसाब से उत्पादन 6 से 8 हजार तक भी पहुंचता है. इन मूर्तियों को स्थानीय व्यापारियों के माध्यम से बाजार में पहुंचाया जाता है. हालांकि, इस बार भी बिक्री को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. उनका कहना है कि अगर मौसम अच्छा रहा और बाजार में मांग बनी रही तो मूर्तियां बिक जाती हैं, लेकिन बारिश या बाजार में मंदी आने पर काफी मूर्तियां बच जाती हैं.
आखिरी दिनों में आधे दाम पर बेचना पड़ता सामान
कारीगरों के मुताबिक, दीपावली के आखिरी दिनों में अगर मूर्तियां नहीं बिकतीं तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है. कई बार तैयार मूर्तियों को लागत से भी कम कीमत पर बेचना पड़ता है. कुछ मामलों में व्यापारी आधे दाम पर भी मूर्तियां खरीदने की बात करते हैं. ऐसे में पूरे सीजन की मेहनत के बाद भी कुम्हार परिवारों को मुनाफा नहीं मिल पाता.
अपील- लोकल दीये और मूर्तियां खरीदकर बचाएं रोजगार
कुम्हार परिवारों का कहना है कि मिट्टी के दीये सिर्फ रोशनी का साधन नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और संस्कृति का हिस्सा हैं. आज भी कई लोग दीपावली पर घरों में मिट्टी के दीये जलाते हैं. कारीगरों ने लोगों से अपील की है कि इस दीपावली आर्टिफिशियल सामान के साथ-साथ स्थानीय कुम्हारों के हाथों से बने मिट्टी के दीये और पारंपरिक मूर्तियां भी खरीदें. इससे न सिर्फ स्थानीय कला और परंपरा को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पीढ़ियों से इस काम में लगे कुम्हार परिवारों का रोजगार भी सुरक्षित रह सकेगा.