शो के दौरान जब वरिष्ठ पत्रकार किशोर अज्यवानी के उनसे उनके जीवन में ‘नाकाम इश्क’ को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने जिस बेबाकी से जवाब दिया, उसने सुनने वालों को गहराई से झकझोर दिया. आचार्य प्रशांत ने न सिर्फ अपने प्रेम को स्वीकारा, बल्कि यह भी बताया कि हम सब इंसानों की जिंदगी में प्रेम की असल परिभाषा क्या है.
‘था क्या, आज भी है मेरा नाकाम इश्क!’
बातचीत के दौरान जब होस्ट ने पूछा कि क्या आपके जीवन में कभी कोई ‘नाकाम इश्क’ रहा है, तो आचार्य प्रशांत ने बड़े ही सहज अंदाज में जवाब दिया, “था क्या, आज भी है!”
उन्होंने आगे कहा कि लोग सोचते हैं कि यहाँ सिर्फ ज्ञान और वेदों की बातें होती हैं, लेकिन सच तो यह है कि इसके केंद्र में सिर्फ और सिर्फ प्रेम है. अगर जीवन में प्रेम नहीं है, तो आपका सारा ज्ञान और आपकी सारी डिग्रियां किसी काम की नहीं हैं. प्रेम के बिना इंसान का जीवन एक मरुस्थल की तरह है.
क्या है प्रेम का असली अर्थ?
प्रेम को परिभाषित करते हुए आचार्य प्रशांत ने एक बहुत ही अनोखा और दार्शनिक पहलू सामने रखा. उन्होंने कहा कि प्रेम का अर्थ होता है, “मैं अपना शुभ खुद भूल जाऊं.” जैसे हम किसी से सच्चा प्रेम करते हैं, तो सबसे पहले उसका कल्याण चाहते हैं, ठीक उसी तरह जीवन में प्रेम वह प्रेरणा है जो हमें खुद से ऊपर उठना सिखाती है.
नाकाम क्यों हो जाता है हर इश्क?
आचार्य प्रशांत ने बहुत ही गहराई से समझाया कि इंसान चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, इस दुनिया में हर इश्क अंततः ‘नाकाम’ ही रहता है. इस नाकामी का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस मंजिल (परमात्मा या पूर्णता) तक हम पहुंचना चाहते हैं, वहां तक पूरी तरह से कभी पहुंचा ही नहीं जा सकता.
थोड़ी सी दूरी हमेशा बनी रह जाती है. लेकिन, हैरानी की बात यह है कि यही अधूरी दूरी ही वह ताकत है जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. यही कशिश और आकर्षण जीवन को चलाए रखती है. अगर सब कुछ पा लिया जाए, तो यात्रा ही खत्म हो जाएगी. इसीलिए, मनुष्य के रूप में पैदा हुए हो तो ‘नाकामी’ और उस अधूरेपन को स्वीकार करना ही पड़ेगा. जो इंसान यह कहे कि उसके जीवन में कभी कोई ऐसा अहसास नहीं आया, वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर बहुत बड़ा पाखंडी है.
ज्ञान से पहले प्रेम जरूरी है
आचार्य प्रशांत ने इस बात पर जोर दिया कि आज की भागदौड़ भरी दुनिया में लोग भौतिक सफलताओं को ही सब कुछ मान बैठते हैं. लेकिन जब तक दिल में किसी के प्रति सच्ची तड़प, करुणा और प्रेम नहीं है, तब तक इंसान भीतर से खाली रहता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रेम और नाकामी जीवन के दो ऐसे पहिए हैं, जो हर इंसान को परिपक्व बनाते हैं.
यह बातचीत हमें यह सिखाती है कि हमारे भीतर की कसक और अधूरापन ही हमें इंसान बनाए रखता है. जरूरत इस बात की है कि हम अपने भीतर के इस प्रेम को समझें और इसे अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाएं.