दीप ही नहीं, यहां जलती लोक संस्कृति की ज्योत! ग्वालिन पूजा से सुवा नृत्य तक, ऐसी है छत्तीसगढ़ की अनोखी दिवाली

दीप ही नहीं, यहां जलती लोक संस्कृति की ज्योत! ग्वालिन पूजा से सुवा नृत्य तक, ऐसी है छत्तीसगढ़ की अनोखी दिवाली


Chhattisgarh Surhutti Diwali: छत्तीसगढ़ में दीपावली का त्योहार सिर्फ दीप जलाने और मां लक्ष्मी की पूजा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां इस पर्व का अपना अलग सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व है. छत्तीसगढ़ में दीपावली को स्थानीय परंपरा के अनुसार ‘सुरहुत्ती दिवाली’ या ‘सुहाई दिवाली’ के नाम से भी जाना जाता है. यहां दो दिनों तक पारंपरिक तरीके से दिवाली का उत्सव मनाया जाता है. इस दौरान मिट्टी से बनी ग्वालिन की पूजा, तुलसी चौरा में दीप प्रज्वलन, पारंपरिक पकवानों का भोग और गोवर्धन पूजा की जाती है. खास बात यह है कि दिवाली के साथ ही छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति के कई रंग भी देखने को मिलते हैं. यादव समाज के लोग घर-घर जाकर गाय, बैल और भैंस को सुहाई बांधते हैं. वहीं, महिलाओं के पारंपरिक सुवा नृत्य और यादव समाज के प्रसिद्ध राउत नाचा की शुरुआत भी इसी पर्व से होती है. इसके अलावा गौरा-गौरी पूजा की परंपरा भी इस त्योहार को खास बनाती है. आखिर छत्तीसगढ़ में सुरहुत्ती दिवाली क्यों मनाई जाती है? मिट्टी से बनी ग्वालिन की पूजा का क्या महत्व है और दिवाली का कृषि, पशुधन तथा लोक संस्कृति से क्या संबंध है? इन तमाम परंपराओं और मान्यताओं को लेकर बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव ने लोकल 18 को विस्तार से जानकारी दी.

छत्तीसगढ़ में सुरहुत्ती दिवाली के नाम से मनाया जाता है पर्व
बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में दीपावली को सुरहुत्ती दिवाली या सुहाई दिवाली के नाम से भी जाना जाता है. यह पर्व ग्रामीण क्षेत्रों के साथ शहरों में भी पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है. यहां दिवाली का उत्सव दो दिनों तक चलता है. पहले दिन देवारी माता की पूजा की जाती है. इस दौरान मिट्टी से बनी ग्वालिन की प्रतिमा स्थापित कर उसकी पूजा-अर्चना की जाती है. घरों में तैयार किए गए पारंपरिक पकवानों का भोग लगाया जाता है. साथ ही तुलसी चौरा में भी दीप जलाकर पूजा की जाती है.

मिट्टी से बनाई जाती है ग्वालिन, पूजा का है विशेष महत्व
छत्तीसगढ़ की दिवाली में मिट्टी से बनी ग्वालिन की पूजा एक खास परंपरा है. स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार इसका विशेष महत्व है. दिवाली के अवसर पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है. यह परंपरा छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जीवनशैली और लोक आस्था से जुड़ी हुई है. इस दौरान घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं और पूजा में भोग लगाने के बाद उन्हें प्रसाद के रूप में परिवार और परिचितों के बीच बांटा जाता है.

गोवर्धन पूजा में नई फसल और पशुधन की होती है पूजा
दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की परंपरा निभाई जाती है. गांवों में गोबर से प्रतीकात्मक गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है और उसकी पूजा की जाती है. छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है, इसलिए यहां नई फसल के धान को भी विशेष महत्व दिया जाता है. नए धान के चावल से गुड़ वाली खीर तैयार कर भोग लगाया जाता है. इसके साथ ही गाय, भैंस और बैलों की पूजा-अर्चना की जाती है. इस परंपरा के माध्यम से किसान अपनी खेती और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करते हैं.

यादव समाज की सुहाई परंपरा, घर-घर जाकर पशुओं को बांधते हैं सुहाई
छत्तीसगढ़ की दिवाली में यादव समाज की सुहाई बांधने की परंपरा भी बेहद खास है. समाज के चरवाहे घर-घर जाकर गाय, भैंस और बैलों को सुहाई बांधते हैं. इस दौरान पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और मंत्रों के माध्यम से पशुओं के सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की जाती है. इसके बदले पशुओं के मालिक चरवाहों को दक्षिणा, प्रसाद, कपड़े या नगद राशि भेंट करते हैं. यह परंपरा पशुधन के महत्व के साथ यादव समाज की सांस्कृतिक पहचान को भी दर्शाती है.

दिवाली से शुरू होता है महिलाओं का पारंपरिक सुवा नृत्य
छत्तीसगढ़ का सुवा नृत्य महिलाओं का प्रसिद्ध पारंपरिक लोकनृत्य है. इसमें सुवा यानी तोते को प्रतीक के रूप में रखकर महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं. गीतों की लय और ताल पर महिलाएं समूह में गोल घेरा बनाकर नृत्य करती हैं. यह नृत्य छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और ग्रामीण महिलाओं की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का एक पारंपरिक माध्यम है. डॉ. सोमनाथ यादव के अनुसार, दीपावली के अवसर से ही इस लोकनृत्य की शुरुआत होती है और गांवों में इसकी अलग ही रौनक देखने को मिलती है.

राउत नाचा में दिखता है यादव समाज का शौर्य और परंपरा
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोकनृत्य राउत नाचा की शुरुआत भी दीपावली से होती है. यादव समाज के लोग पारंपरिक वेशभूषा में सजकर समूह में नृत्य करते हैं. यह नृत्य वीर रस, शौर्य और पारंपरिक लोकगीतों से जुड़ा हुआ है. इसमें यादव समाज के लोग अपनी पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करते हैं. दीपावली से शुरू होने वाला यह नृत्य प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में उत्सव और उल्लास का माहौल बनाता है.

गौरा-गौरी पूजा में मिट्टी से बनाई जाती हैं शिव-पार्वती की प्रतिमाएं
छत्तीसगढ़ में गौरा-गौरी पूजा की परंपरा भी बेहद खास है. इसमें मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं. इन्हें घरों या निर्धारित स्थानों पर स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है. परंपरा के अनुसार एक, तीन या पांच दिनों तक पूजा करने के बाद प्रतिमाओं का तालाबों और नदियों में विसर्जन किया जाता है. यह परंपरा छत्तीसगढ़ की लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

कृषि संस्कृति, पशुधन और लोक कलाओं का संगम है छत्तीसगढ़ की दिवाली
डॉ. सोमनाथ यादव बताते हैं कि छत्तीसगढ़ की दिवाली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यहां की कृषि संस्कृति, पशुधन और लोक कलाओं का भी उत्सव है. इस त्योहार में नई फसल, गाय-बैल, पारंपरिक पकवान और लोकनृत्यों को विशेष स्थान दिया जाता है. ग्वालिन पूजा, सुहाई बांधने की परंपरा, गोवर्धन पूजा, सुवा नृत्य, राउत नाचा और गौरा-गौरी पूजा जैसी परंपराएं छत्तीसगढ़ की दिवाली को एक अलग पहचान देती हैं. छत्तीसगढ़ की सुरहुत्ती दिवाली आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अनूठा संगम है. यहां दिवाली के दीप केवल घरों को रोशन नहीं करते, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं. यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की दिवाली का रंग देश के दूसरे हिस्सों में मनाई जाने वाली दीपावली से अलग और खास नजर आता है.



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