झांसी की 85 वर्षीय सुमन द्विवेदी को पेंटिंग के प्रति है गहरा लगाव, जीवित रखी हैं रचनात्मकता

झांसी की 85 वर्षीय सुमन द्विवेदी को पेंटिंग के प्रति है गहरा लगाव, जीवित रखी हैं रचनात्मकता


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झांसी की 85 वर्षीय सुमन द्विवेदी आज भी अपने शौक को पूरी लगन के साथ जी रही हैं. उम्र भले ही 85 साल हो चुकी है लेकिन पेंटिंग के प्रति उनका लगाव अब भी कायम है. हाथों में ब्रश लेकर रंगों के साथ काम करना उनकी रचनात्मकता का हिस्सा बना हुआ है. चित्रकारी में हर रंग की अपनी अहमियत होती है. एक कलाकार अपनी सोच को कागज या कैनवास पर उतारकर उसे एक अलग रूप देता है.

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झांसी: 85 वर्षीय सुमन द्विवेदी आज भी अपने शौक को पूरी लगन के साथ जी रही हैं. उम्र भले ही 85 साल हो चुकी है लेकिन पेंटिंग के प्रति उनका लगाव अब भी कायम है. हाथों में ब्रश लेकर रंगों के साथ काम करना उनकी रचनात्मकता का हिस्सा बना हुआ है. चित्रकारी में हर रंग की अपनी अहमियत होती है. एक कलाकार अपनी सोच को कागज या कैनवास पर उतारकर उसे एक अलग रूप देता है. इसके लिए धैर्य के साथ हर छोटी बारीकी पर ध्यान देना पड़ता है. सुमन द्विवेदी की बनाई तस्वीरों में भी रंगों के इसी मेल और कलात्मकता की झलक देखने को मिलती है.

कला के जरिए बनाई पहचान

पेंटिंग केवल तस्वीर बनाने तक सीमित नहीं है. यह अपने विचारों को व्यक्त करने का एक तरीका भी है. कलाकार अपनी कल्पना के मुताबिक रंगों और आकृतियों को जोड़ता है और एक नई रचना तैयार करता है. सुमन द्विवेदी भी इसी कला के जरिए अपनी रचनात्मक पहचान बनाए हुए हैं. इस उम्र में भी उनका पेंटिंग करना यह बताता है कि किसी पसंदीदा काम से जुड़े रहने के लिए उम्र का कोई तय पैमाना नहीं होता. असल बात उस काम के प्रति रुचि और उसे जारी रखने की इच्छा है. समय बदलता है लेकिन मन का शौक बरकरार रहे तो इंसान अपनी पसंद की दुनिया से जुड़ा रह सकता है.

जिंदगी के हर पड़ाव जारी रखा काम

सुमन द्विवेदी के इस सफर को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि उनके मन में चित्रकारी का विचार कैसे आया. उन्होंने पहली बार कब ब्रश उठाया और इस कला को सीखने का सफर किस तरह शुरू हुआ. इतने वर्षों में उनकी पेंटिंग के अंदाज में क्या बदलाव आया और आज उन्हें किस तरह की तस्वीरें बनाना सबसे ज्यादा पसंद है. उनकी बनाई पेंटिंग में कौन सी रचना उन्हें सबसे ज्यादा पसंद है और 85 साल की उम्र में भी उन्हें रंगों के बीच समय बिताने की प्रेरणा कहां से मिलती है. ये बातें उनकी कला के साथ उनके व्यक्तिगत अनुभवों को भी सामने लाती हैं.

सुमन द्विवेदी की कहानी बताती है कि रचनात्मकता किसी उम्र की मोहताज नहीं होती. जिंदगी के हर पड़ाव पर अपनी पसंद का काम जारी रखा जा सकता है और रंगों के जरिए अपनी एक अलग दुनिया बनाई जा सकती है.



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