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एक बटन दबाइए. रात का खाना घर मंगवाना है? दूसरा बटन दबाइए. कोई सवाल मन में कौंधा, जवाब तुरंत हाजिर है. सबकुछ एक बटन पर होने की फीलिंग सुकून और आराम तो देती है, लेकिन परेशानी वहां शुरू होती है जब AI हर वो काम करने लगे जिसमें दिमाग को दौड़ाने की जरूरत होती है. लोग ‘तेजी’ का मतलब ‘सही’ समझ रहे हैं. एआई तेजी से जवाब देता है, ये सही है. लेकिन तेजी का मतलब हमेशा समझदारी या सही नहीं होता है. इसलिए बेहद जरूरी है कि इंसान इस पूरी प्रक्रिया में अपने दिमाग को सजग रखे.
इंसान को कैसे ‘बुद्धू’ और ‘आलसी’ बना रहा है AI (प्रतीकात्मक फोटो- रायटर्स)
ऑफिस से घर के लिए निकली तो लिफ्ट में मेरे साथ 3 और लोग थे. 2 लोग बात कर रहे थे, ‘AI ने काम कर रखा है. मैंने अपने बेटे के कॉलेज में मेल किया, तो प्रिंसिपल भी इंप्रैस हो गया. अरे अपन को कहां इतनी अच्छी इंग्लिश आती है पर AI से लिखवाया था.’ ये कहकर दोनों हंसने लगे. फिर एक-दूसरे की अंग्रेजी का मजाक बनाने लगे कि ‘इंग्लिश बोलने में दिक्कत नहीं है, पर लिखने में स्पैलिंग की गड़बड़ हो जाती है.’ लिफ्ट से निकल हम सब लॉबी की तरफ जा रहे थे, थोड़ी देर उनकी बातें चली तो एक ने यह भी कहा, ‘यार बेटी बड़े अजीब-अजीब साल पूछती है, मैंने तो उसे भी अब चैटजीपीटी से पूछकर बता दूता हूं.. अपनी टेंशन खत्म.’ दरअसल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कई टूल्स अब हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं.
AI की मदद के बिना होने लगी है मुश्किल
लोग इनकी मदद से मेल लिखते हैं, सोशल मीडिया पोस्ट बनाते हैं, होमवर्क कर रहे हैं. यहां तक की वॉट्स पर बधाई भेजनी हो तो उसके मैसेज भी AI की मदद से लिखवा रहे हैं. इंस्टाग्राम पर तो कुछ ऐसी पूरी की पूरी प्रोफाइलें हैं जो सिर्फ AI प्रोम्प्ट बताने वाले पोस्ट ही डालते हैं. लोग इनका इस्तेमाल भी खूब कर रहे हैं. लेकिन AI की ये आदत धीरे-धीरे इंसानों के दिमाग को कुंद करती जा रही है. ये चिंता और चर्चा अब सिर्फ दूर की बात नहीं है. अक्टूबर के महीने की शुरुआत में सैन फ्रांसिस्को में ‘2026 कॉन्फ्रेंस ऑन लैंग्वेज मॉडलिंग’ हुई. इसमें पेश की गई एक रिसर्च में बताया गया कि जो लोग गणित के सवाल हल करने या पढ़कर समझने जैसे कामों के लिए AI की मदद लेते हैं, वो बिना AI के उस काम को करने में बहुत परेशानी महसूस करते हैं. LiveScience में आई रिपोर्ट बताती है कि इस रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि कैसे AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता इंसान की कोशिश करने की क्षमता और क्रिएटिव सोचने की शक्ति को कम कर देती है.
‘न्यूरोलीडरशीप इंस्टीट्यूट’ के सह-संस्थापक, डॉक्टर डेविड रॉक के अनुसार, बड़ा सवाल यह नहीं है कि एआई हमारे लिए क्या कर रही है, बल्कि यह है कि एआई हमारे ऊपर क्या प्रभाव डाल रही है. (प्रतीकात्मक फोटो- रायटर्स)
तकनीक दे रही है हर चीज पर ‘कंट्रोल’ की फीलिंग
एआई के बारे में यह चिंता अब वैश्विक स्तर पर होने लगी है. ‘न्यूरोलीडरशीप इंस्टीट्यूट’ के सह-संस्थापक, डॉक्टर डेविड रॉक के अनुसार, बड़ा सवाल यह नहीं है कि एआई हमारे लिए क्या कर रही है, बल्कि यह है कि एआई हमारे ऊपर क्या प्रभाव डाल रही है. टैक्नॉलॉजी में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब हमें लगभग हर चीज पर ‘कंट्रोल’ होने का एहसास होने लगा है. आपको कार की सवारी चाहिए? एक बटन दबाइए. रात का खाना घर मंगवाना है? दूसरा बटन दबाइए. कोई सवाल मन में कौंधा, जवाब तुरंत हाजिर है. सबकुछ एक बटन पर होने की फीलिंग सुकून और आराम तो देती है, लेकिन परेशानी वहां शुरू होती है जब AI हर वो काम करने लगे जिसमें दिमाग को दौड़ाने की जरूरत होती है.
आपको बता दें कि ‘न्यूरोलीडरशीप इंस्टीट्यूट’ एक ग्लोबल कंसलटेशन संस्था है, जो नेतृत्व पदों और संगठनों के काम को बेहतर बनाने के लिए न्यूरोसाइंस का उपयोग करती है. डॉक्टर रॉक इस साल UN Skills Fest 2026 के प्रमुख वक्ताओं में से एक भी हैं. यूएस टीवी से बात करते हुए डॉक्टर डेविड रॉक ने का कि शायद 10 प्रतिशत कर्मचारी ही एआई का सही तरीके से यूज कर रहे हैं. वो अपने रुटीन या नॉर्मल काम को एआई को सौंप अपनी मानसिक क्षमता को ज्यादा कठिन कामों में लगा रहे हैं. जबकि बाकी लोग अपने दिमाग का इस्तेमाल बंद कर, जैसे ही कोई मुश्किल काम आता है, उसे AI को सौंप रहे हैं. इसका रिजल्ट ये है कि धीरे-धीरे हमारी फैसले लेने की क्षमता में गिरावट आने लगी है. जब लोग केवल सामान्य काम ही नहीं, बल्कि विश्लेषण, मूल्यांकन और निर्णय लेने जैसे कार्य भी एआई को सौंपने लगते हैं, तो वे अच्छे और बुरे विचारो के बीच अन्तर करने की अपनी क्षमता खोने का जोखिम उठाते हैं.
AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता इंसान की कोशिश करने की क्षमता और क्रिएटिव सोचने की शक्ति को कम कर देती है.
(सांकेतिक तस्वीर-रॉयटर्स)
लैंडलाइन गए तो लोग भूले फोन नंबर भी
AI के इस दौर में मुझे 2000 का वो दौर याद आता है, जब मोबाइल फोन नए-नए भारत में आए थे. लैंडलाइन वाले फोन के दौर में लोगों को कई फोन नंबर याद रहते थे. लोग फोन नंबर याद रखते थे या डायरियों में लिखते थे. पर जैसे ही मोबाइल आए, नंबर फीड होने शुरू हो गए. पर मोबाइल के आने के बाद दिमाग ने नंबर याद रखने जैसा कम पूरी तरह बंद कर दिया. अब बिरले ही ऐसे लोग होंगे जिन्हें अपने करीबियों के भी 5 से ज्यादा मोबाइल नंबर याद हों.
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