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दुनिया की 80% अवैध अफीम अफगानिस्तान से आती थी. लेकिन साल 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान में अफीम की खेती पर कड़ी पाबंदी लगा दी गई. कुछ सालों तक इस कड़ाई का पालन भी हुआ, लेकिन अब और नहीं.
अफगानिस्तान में तालिबान की कड़ी पाबन्दियों के बाद भी अफीम की खेती बढ़ी. (फोटो- रायटर्स)
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के एक नए सर्वे के अनुसार, अफगानिस्तान में तालिबान की कड़ी पाबन्दियों के बाद भी अफीम की खेती लगातार बढ़ती जा रही है. इतना ही नहीं, अफीम की पैदावार पिछले एक साल में पांच गुना बढ़ गया है. संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय यानी UNODC के गुरुवार को जारी ताजा सर्वेक्षण में अफगानिस्तान में अफीम की खेती और उत्पादन में बड़े पैमाने पर उछाल दर्ज किया गया है. पर सवाल ये है कि इतने बड़े पैमाने पर बाजार होने के बाद भी अफीम की खेती अफ्गानिस्तान में बंद क्यों की गई? और तालिबान की इतनी कड़ाई के बाद भी आखिर किसान खेती कैसे कर पा रहे हैं?
तालिबान ने क्यों लगाया था अफीम पर प्रतिबंध?
अगस्त 2021 में सत्ता में आने के बाद तालिबान ने अप्रैल 2022 में धार्मिक कारणों का हवाला देते हुए अफीम की खेती और सभी नशीले पदार्थों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था. तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि अफीम इस्लामी मान्यताओं के विरुद्ध है और इसका समाज पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है. ये आदेश तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने दिया. बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि यूं तो इसका आधिकारिक कारण धार्मिक निषेध और नशे के हानिकारक प्रभाव बताए गए, लेकिन असल में इसके पीछै की वजह राजनीतिक वैधता, अंतरराष्ट्रीय छवि और देश के भीतर नशीले पदार्थों की समस्या से निपटने का दबाव भी माना जाता है.
तालिबान ने अप्रैल 2022 में धार्मिक कारणों का हवाला देते हुए अफीम की खेती और सभी नशीले पदार्थों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था. (फोटो- रायटर्स)
इस आदेश के बाद कुछ समय तक अफीम की खेती में भारी गिरावट देखने को मिली. लेकिन अब यह फिर तेजी से बढ़ रही है. अफगानिस्तान सालों तक दुनिया में अवैध अफीम का सबसे बड़ा सोर्स रहा है. प्रतिबन्ध से पहले दुनिया की लगभग 80 प्रतिशत अवैध अफीम यहीं से आती थी. UNODC की रिपोर्ट बताती है कि साल 2025 में लगभग 10 हज़ार हैक्टेयर भूमि पर अफीम की खेती हो रही थी, जो अब 330% बढ़कर 43 हज़ार हैक्टेयर से अधिक हो गई है. इसी दौरान अनुमानित उत्पादन भी लगभग 300 टन से बढ़कर 1,500 टन के क़रीब पहुंच गया है. हालांकि खेती का क्षेत्रफल अब भी प्रतिबन्ध से पहले के स्तर से काफी कम है, जब लगभग 2 लाख 32 हज़ार हैक्टेयर ज़मीन पर अफीम उगाई जाती थी.
इतनी सख्ती के बाद भी कैसे हो रही है खेती?
एक तरफ तालिबान प्रशासन का दावा है कि उसने इस साल 22 हज़ार हैक्टेयर जमीन पर अफीम की खेती नष्ट की है. लेकिन UNODC की रिपोर्ट कुछ और ही हालात बता रही है. दरअसल किसानों ने खेती करने के और इस पाबंदी से बचने के कुछ और ही तरीके ढूंढ निकाले हैं. यहां कुछ किसान अनाज के खेतों के बीच या चारदीवारी के भीतर छोटे-छोटे हिस्सों में अफीम उगा रहे हैं. वहीं, कुछ किसान अलग-अलग समय पर बुआई और कटाई कर रहे हैं, ताकि अधिकारियों की नजर से बच सकें.
UNODC की कार्यकारी डायरेक्टर मोनिका जूमा का कहना है कि अफ़ीम की खेती में चार गुना वृद्धि दिखाती है कि जब गरीब किसानों के पास परिवार का पेट पालने का दूसरा जरिया नहीं होता, तो अवैध खेती पर रोक बनाए रखना कितना मुश्किल है.’ असल में तालिबान ने प्रतिबंध तो लगाया पर किसानों को कोई दूसरा वैकल्पिक रोजगार नहीं दिया.
अफगानिस्तान के 34 में से 16 प्रांत ऐसे हैं, जहां अफीम की खेती हो रही है. (फोटो- रायटर्स)
इस सर्वे में एक और बात खास सामने निकलकर आई कि अफगानिस्तान के 34 में से 16 प्रांत ऐसे हैं, जहां अफीम की खेती हो रही है. पर अब 75% खेती पुराने पैटर्न से उलट उत्तर-पूर्व के इलाकों में हो रही है. जबकि बैन से पहले ज्यादातर खेती साउथ-वेस्ट के इलाकों में होती थी. तालिबान के प्रतिबंध के बाद से तस्कर अफीम की मांग के चलते पुराने स्टॉक का ही इस्तेमाल कर रहे थे, पर ये स्टॉक तेजी से कम हो रहा था. विश्व मादक पदार्थ रिपोर्ट 2026 में भी योरोप में हेरोइन की आपूर्ति घटने के संकेत मिले हैं.
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