दिल्ली/ ढाका: राजनीतिक मनोविज्ञान का सीधा सिद्धांत है: “किसी प्रभावी नेता की मौजूदगी, उसके विचार और उसकी संभावित वापसी का अहसास ही विरोधियों की रणनीति को डगमगा देता है”. दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर बांग्लादेश हमेशा से एक अत्यंत संवेदनशील केंद्र रहा है. अगस्त 2024 में हुए उथल-पुथल भरे आंदोलन और सत्ता परिवर्तन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा था. हालांकि, निर्वासन के बाद अब शेख हसीना की बांग्लादेशी राजनीति में संभावित वापसी की चर्चाओं ने ढाका से लेकर चटगांव तक के सियासी और कट्टरवादी हलकों में हलचल तेज कर दी है.
एडिटर ब्लिट्ज, सलाउद्दीन शोएब चौधरी ने न्यूज़ 18 से इस खास विषय पर गहराई से चर्चा की. सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि शेख हसीना के पुनः मैदान में उतरने के संकेत मात्र से कट्टरपंथी और जिहादी समूहों के भीतर इतनी खलबली क्यों मची हुई है? यदि उनकी वापसी होती है, तो बांग्लादेश का सुरक्षा, सामाजिक और राजनीतिक ढांचा किस प्रकार बदलेगा?
जिहादी ताकतों के डर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
शेख हसीना का 15 वर्षों से अधिक का कार्यकाल (2009–2024) कट्टरपंथ और आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की सख्त नीति के लिए जाना जाता है. बांग्लादेश में सक्रिय संगठनों जैसे जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) और जमात-ए-इस्लामी के प्रति अवामी लीग सरकार का रुख कभी नरम नहीं रहा.
- अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) की कार्रवाई: शेख हसीना सरकार ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हुए युद्ध अपराधों और नरसंहार के मुकदमे चलाने के लिए विशेष न्यायाधिकरण बनाया था. इसके तहत जमात-ए-इस्लामी के कई शीर्ष नेताओं को फांसी और उम्रकैद की सजा दी गई, जिसने कट्टरपंथी नेटवर्क की कमर तोड़ दी थी.
- जिहादी विरोधी अभियान: 2016 के ढाका होली आर्टिसन बेकरी आतंकी हमले के बाद हसीना प्रशासन ने आतंकियों के खिलाफ देशव्यापी सर्च ऑपरेशन चलाए और उनके पूरे संगठनात्मक ढांचे को ध्वस्त कर दिया.
- संवैधानिक व कानूनी शिकंजा: जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन ‘छात्र शिबिर’ की राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगाकर उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया था.
इसलिए, जब भी शेख हसीना की वापसी की बात होती है, तो इन ताकतों को वही पुराना कानूनी, प्रशासनिक और सुरक्षात्मक शिकंजा याद आता है.
सत्ता परिवर्तन के बाद का परिदृश्य और बढ़ता सांप्रदायिक उन्माद
अवामी लीग सरकार के हटने के बाद से बांग्लादेश में सत्ता का संतुलन और सामाजिक ताना-बाना तेजी से बिगड़ा है. जेलों में बंद कई संदिग्ध और सजायाफ्ता उग्रवादियों की रिहाई ने कट्टरपंथी तत्वों के हौसले बुलंद कर दिए. इसी लामबंदी और घटती प्रशासनिक सख्ती का खौफनाक नतीजा 18 दिसंबर 2025 को मैमनसिंह के भालुका में देखने को मिला, जहाँ हिंदू गारमेंट कर्मचारी दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और उनके शव को पेड़ से बांधकर आग के हवाले कर दिया गया.
यह बर्बर घटना साबित करती है कि राजनीतिक अस्थिरता के बीच अफवाहों के सहारे भीड़ को उकसाना और सांप्रदायिक उन्माद भड़काना कितना आसान हो चुका है. यह घटना केवल कानून-व्यवस्था का पतन नहीं, बल्कि बांग्लादेश में जड़ जमा रही जिहादी सोच के सीधे उभार का प्रमाण है: एक ऐसा उभार जिसकी डोर सीमा पार भारत-विरोधी नेटवर्कों और पाकिस्तानी शह से जुड़े होने की प्रबल आशंका पैदा करती है और जिसकी काट केवल एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति ही हो सकती है.
हसीना की वापसी से क्यों खौफ में हैं जिहादी संगठन?
शेख हसीना केवल अवामी लीग की प्रमुख नहीं, बल्कि ‘बंगबंधु’ शेख मुजीबुर रहमान की उस विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसकी बुनियाद बंगाली राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता पर टिकी है. जिहादी ताकतों के खौफ के मुख्य कारण हैं:
- सुरक्षा तंत्र का पुनर्गठन और सख्त कार्रवाई: कट्टरपंथियों को भली-भांति ज्ञात है कि यदि शेख हसीना या अवामी लीग की राजनीति में वापसी होती है, तो सबसे पहला प्रहार उन ताकतों पर होगा जिन्होंने पिछले कुछ समय में अपने पैर पसारे हैं. देश की खुफिया एजेंसियों (NSI, DGFI) और विशेष सुरक्षा बलों को पुनः जिहादी और कट्टरवादी विरोधी अभियानों में पूरी ताकत से झोंक दिया जाएगा.
- अस्तित्व का संकट: शेख हसीना की राजनीति की धुरी कट्टरपंथ का विरोध रही है. उनके सत्ता में या मजबूत विपक्ष में आने से जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े उग्रवादी गुटों की गतिविधियों पर फिर से पूर्ण प्रतिबंध लग सकता है, जिससे उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा.
- अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय समर्थन का समीकरण: दक्षिण एशिया में कट्टरवाद के फैलाव को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय हमेशा एक स्थिर और धर्मनिरपेक्ष सरकार को प्राथमिकता देता है. हसीना की वापसी का सीधा अर्थ होगा अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों और पड़ोसी देशों के साथ ढाका का फिर से मजबूत तालमेल, जो सीमा पार से चलने वाले जिहादी नेटवर्कों के लिए घातक सिद्ध होगा.
बांग्लादेश में क्या-क्या बदल जाएगा?
यदि शेख हसीना का राजनीतिक प्रभाव पुनर्स्थापित होता है या वे प्रत्यक्ष रूप से देश लौटती हैं, तो बांग्लादेश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में निम्नलिखित बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. शेख हसीना की संभावित वापसी के मुख्य प्रभाव:
- सुरक्षा व कानून-व्यवस्था: कट्टरवादी संगठनों पर पुनः कठोर कार्रवाई का डर
- अल्पसंख्यक सुरक्षा: हिंदू व अन्य अल्पसंख्यकों में सुरक्षा भाव
- विदेश नीति व क्षेत्रीय संतुलन: भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार
- आर्थिक स्थिरता: विदेशी निवेश व गारमेंट उद्योग की बहाली
1. बंगाली राष्ट्रवाद बनाम कट्टरपंथी विचारधारा की सीधी जंग: बांग्लादेश एक बार फिर अपनी वैचारिक पहचान के चौराहे पर खड़ा होगा. एक तरफ 1971 के मुक्ति संग्राम की धर्मनिरपेक्ष बंगाली राष्ट्रवाद की सोच होगी, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान-समर्थित या कट्टरपंथी विचारधारा. हसीना की वापसी से धर्मनिरपेक्ष बंगाली राष्ट्रवाद की धारा पुनः मजबूत होगी.
2. अल्पसंख्यकों को राहत और सुरक्षा: पिछले कुछ समय से बांग्लादेशी हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय लगातार हिंसा और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं. हसीना की उपस्थिति और अवामी लीग के पुनरुत्थान से अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही लक्षित हिंसा पर लगाम लगने की ठोस उम्मीद जगेगी.
3. भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया मोड़: हसीना के दौर में भारत और बांग्लादेश के संबंध अपने सबसे मजबूत दौर में थे. सीमा पार आतंकवाद को कुचलने, पूर्वोत्तर भारत में शांति स्थापित करने और रणनीतिक समझौतों में हसीना सरकार का बड़ा योगदान था. उनकी वापसी से द्विपक्षीय संबंधों में आई खटास दूर होगी और क्षेत्रीय सुरक्षा को बल मिलेगा.
4. आर्थिक सुधार और विदेशी निवेश की वापसी: राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा के कारण बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग (RMG सेक्टर) और विदेशी निवेश बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. शेख हसीना के शासनकाल को देश के बुनियादी ढांचे के विकास (जैसे पद्मा ब्रिज, ढाका मेट्रो) और आर्थिक स्थिरता के लिए जाना जाता है. उनकी वापसी से वैश्विक निवेशकों और व्यापारिक साझेदारों का भरोसा फिर से कायम हो सकता है.
5. चुनौतियां और भावी राह: हालांकि, शेख हसीना के लिए वापसी की राह में कई जटिल बाधाएं हैं. वर्तमान प्रशासनिक ढांचे द्वारा उन पर और उनकी पार्टी के कई नेताओं पर दर्जनों मुकदमे दर्ज किए गए हैं. तथापि, बांग्लादेश में जब भी निष्पक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं बहाल होंगी, तो अवामी लीग जैसी जमीनी और ऐतिहासिक पार्टी को राजनीति के मुख्य मंच से दूर रखना संभव नहीं होगा.
बांग्लादेश का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह जिहादी कट्टरवाद और अराजकता की ओर बढ़ता है या लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और आर्थिक प्रगति की ओर. शेख हसीना की वापसी की केवल सुगबुगाहट ही यह साबित करने के लिए काफी है कि बांग्लादेश की राजनीति में उनका प्रभाव आज भी प्रासंगिक है. जिहादी ताकतों का खौफ अकारण नहीं है; वे जानते हैं कि हसीना की मौजूदगी का सीधा अर्थ है: करारा प्रहार और 1971 की धर्मनिरपेक्ष चेतना का पुनरुत्थान.