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Medically Assisted Death: हॉलीवुड सिल्वर स्क्रीन पर अपने अभिनय से लाखों दिलों पर राज करने वाली एक ऑस्कर नॉमिनेटेड अभिनेत्री बारबरा कैंसर की असहनीय वेदना से जूझ रही थी. उन्हें पूरे शरीर में कैंसर ने जकड़ लिया था. हालांकि वे 95 साल की थी लेकिन वे पूरे होशो-हवास में थी. और उन्होंने इस असहनीय वेदना से मुक्ति के लिए मेडिकली एसिस्टेड डेथ का रास्ता चुनीं. आखिर क्या होता है यह और इसमें इतना दर्द क्यों होता है. इस विषय पर हमने सर गंगाराम अस्पताल में कैंसर डिपार्टमेंट के डायरेक्टर और मशहूर ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. श्याम अग्रवाल से बात की.
बारबरा बैरी की तस्वीर @Variety के X पोस्ट से साभार.
हॉलीवुड फिल्म ब्रेकिंग अवे और ब्रॉडवे में अपने काम के लिए सालों से मशहूर अभिनेत्री बारबरा बैरी का निधन हो गया. उन्हें टर्मिनल कैंसर था. यानी वे कैंसर के अंतिम चरण से गुजर रही थीं. सालों पहले बारबरा को कोलोन कैंसर हुआ था. यह कैंसर पूरे शरीर में फैल गया और जकड़ लिया. वे इस कारण बेपनाह दर्द से गुजर रही थीं. उन्हें जीने में बहुत तकलीफ हो रही थी. इतना ही नहीं उन्हें इडियोपैथिक प्लमोनरी फाइब्रोसिस की भी समस्या थी. लंग्स की इस बीमारी से सांस लेने में भारी तकलीफ होता है. इन सब स्थितियों को देखते हुए बारबरा ने मेडिकली एसिस्टेट डेथ को चुना और 95 साल की उम्र में आखिरी सांस ली. न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर में उनकी बेटी जेन हार्निक ने इस खबर की पुष्टि की. आखिर किसी कैंसर मरीज को इतना दर्द क्यों सहना पड़ता है और मेडिकली एसिस्टेट डेथ होता क्या है, इस बारे में हमने सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली में मशहूर ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. श्याम अग्रवाल से बात की.
टर्मिनल कैंसर क्या होता है
डॉ. श्याम अग्रवाल ने बताया कि टर्मिनल कैंसर का मतलब होता है कि कैंसर कोशिकाएं शरीर के कई अंगों में पहुंच गया है और वर्तमान मेडिकल व्यवस्था में अब इसे ठीक करना लगभग मुश्किल है. इसमें शरीर की सामान्य शारीरिक प्रक्रिया पूरी तरह चरमरा जाती है. शरीर दवा पर कोई रिएक्शन नहीं देता है. धीरे-धीरे शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते हैं और शरीर मल्टी ऑर्गेन फेल्योर की तरफ बढ़ता जाता है. बारबरा बैरी को 1994 में कोलोन कैंसर हुआ था. उसका इलाज इतने लंबे समय तक चला लेकिन अब यह कैंसर टर्मिनल कैंसर में पहुंच गया था. इसमें कई डॉक्टर मिलकर यह तय करते हैं मरीज अब मुश्किल से कुछ महीने जीवित रह सकता है. हालांकि डॉक्टर भगवान नहीं हैं लेकिन वे वर्तमान उपलब्ध मेडिकल व्यवस्था के आधार पर अनुमान लगाते हैं कि मरीज कितने दिनों तक और जीवित रह सकता है.
दर्द क्यों होता है इतना
बारबरा बैरी का कैंसर हड्डियों तक पहुंच गया था या शरीर के कई हिस्सों में बड़ी गांठ हो गई थी जो नसों को दबा रही थी और इससे असहनीय दर्द हो रहा था. डॉ. श्याम अग्रवाल बताते हैं कि अगर कैंसर बढ़कर हड्डियों में पहुंच गया तो इसमें बहुत दर्द करता है. अगर कैंसर की गांढें बड़ी है और कोई ऐसी जगह है जहां की नसें दबी रहती है तो इस हाल में भी कैंसर के कारण दर्द हो सकता है.
क्या सभी कैंसर में दर्द करता है
बिल्कुल नहीं. डॉ. श्याम अग्रवाल बताते हैं कि लोगों में यह गलत धारणा है कि सभी कैंसर में दर्द करता है. किस कैंसर में दर्द करेगा और किसमें नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर की बीमारी कहां-कहां फैली है और शरीर के किस हिस्से में फैली है. मान लीजिए किसी को कोलोन कैंसर हुआ और यह शरीर में फैलकर लिवर में पहुंच गया है और वहां बड़ी गांठें नहीं है तो इससे लिवर अंतिम चरण में फेल हो सकता है लेकिन लिवर में दर्द नहीं करेगा. इसी तरह अगर कैंसर कहीं से पहुंचकर ब्रेन में पहुंच गया तो भी दर्द नहीं होगा. दर्द उस स्थिति में होगा जब गांठे बड़ी हो और वह नसों को दबा रही हो, इसके साथ ही कैंसर हड्डियों में फैल गया हो.
मेडिकली एसिस्टेड डेथ क्या है
यह एक कानून है. न्यूयॉर्क शहर में हाल ही में यह कानून बना है. डॉ. श्याम अग्रवाल कहते हैं कि अमेरिका में कैंसर के बारे में सारी जानकारी मरीज को देनी होती है. मसलन कौन सा कैंसर है. कैंसर अभी कहां तक फैला है. इसके ठीक होने की संभावना कितनी है. किस स्टेज में है. कितने दिनों तक जीवित रहने की संभावना है आदि. अब इस नए कानून के तहत अगर किसी को ऐसी बीमारी है जिसमें उसके जीने की उम्मीद बहुत कम है. सभी उपलब्ध दवाई काम नहीं कर रही है तो डॉक्टरों की एक टीम बैठती है और यह निर्णय लेती है कि वह व्यक्ति कितने दिनों तक जीवित रह सकता है और उसे क्या क्या तकलीफें हो सकती हैं. इस आधार पर अगर मरीज अपने होशो-हवास में स्वेच्छा से शांतिपूर्ण मौत चाहता है तो सरकार इसकी अनुमति दे सकता है. हालांकि यह पूरी तरह मरीज पर निर्भर करता है. इसमें व्यक्ति के जीने की गुणवत्ता को कायम रखा जा सकता है.