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जब भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में पौराणिक कहानियों और महाकाव्यों को पर्दे पर लाने की बात आती है, तो दादासाहेब फाल्के का नाम अक्सर सबसे पहले लिया जाता है. 1917 की साइलेंट फिल्म ‘लंका दहन’ भारतीय सिनेमा के इतिहास की पहली फिल्म थी जिसने रामायण के एक अहम हिस्से को बड़े पर्दे पर जीवंत किया. ऐसे समय में जब टेक्नोलॉजी बहुत कम थी और फिल्मों में बोलना नामुमकिन था, इस साइलेंट फिल्म ने देशवासियों के दिलों में ऐसा घर किया कि टिकट खरीदने के लिए सिनेमाघरों के बाहर मीलों लंबी लाइनें लग जाती थीं.
नई दिल्ली. आज के मॉडर्न जमाने में जहां पौराणिक फिल्में VFX और करोड़ों के बजट में बनती हैं. वहीं साल 1917 भी एक ऐसा समय था जब भारतीय सिनेमा अपने शुरुआती दौर में था. दादासाहेब फाल्के के डायरेक्शन में बनी साइलेंट फिल्म ‘लंका दहन’ ने न सिर्फ भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी, बल्कि पहली बार रामायण की कहानी को सेल्युलाइड पर भी उतारा. इस फिल्म में एक भी डायलॉग नहीं था, फिर भी इसके विजुअल्स और एक्टर्स की एक्टिंग दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी थी. यह फिल्म भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई. (फोटो साभार: IMDB)
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक धुंधिराज गोविंद, जिन्हें दादासाहेब फाल्के के नाम से भी जाना जाता है, जिन्होंने 1913 में पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ के साथ भारतीय सिनेमा की नींव रखी. उन्होंने 1917 में दर्शकों के सामने एक और यादगार काम ‘लंका दहन’ पेश किया. ‘राजा हरिश्चंद्र’ की जबरदस्त सफलता के बाद, फाल्के ने हिंदू महाकाव्य रामायण के एक बहुत लोकप्रिय और रोमांचक हिस्से हनुमानजी द्वारा लंका दहन को बड़े पर्दे पर लाने का काम किया. इस फिल्म ने न सिर्फ उनकी टेक्निकल काबिलियत दिखाई, बल्कि भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं के प्रति उनकी अटूट भक्ति भी दिखाई, जिसने बाद में भारतीय सिनेमा के जॉनर को हमेशा के लिए बदल दिया. (फोटो साभार: IMDB)
आजकल की फिल्में अपने दमदार डायलॉग और गानों पर आधारित मानी जाती हैं, लेकिन 1917 साइलेंट फिल्मों का दौर था. ‘लंका दहन’ एक साइलेंट फिल्म थी, जिसमें एक भी बोला हुआ डायलॉग नहीं था. किरदारों के डायलॉग दिखाने के लिए स्क्रीन पर बीच-बीच में इंग्लिश और मराठी/हिंदी में लाइनों वाले इंटरटाइटल इस्तेमाल किए जाते थे. इसके बावजूद, एक्टर्स की बॉडी लैंग्वेज, वोकल परफॉर्मेंस और विजुअल्स की भव्यता ने दर्शकों को इतना बांध लिया कि बिना आवाज के भी रामायण की गाथा हर देखने वाले के दिल में सीधे उतर गई. (फोटो साभार: IMDB)
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फिल्म ‘लंका दहन’ के इतिहास में एक और अनोखी और दिलचस्प बात इसके लीड एक्टर्स की कास्टिंग है. उस पुराने जमाने में फिल्मों में महिलाओं का काम करना समाज में टैबू माना जाता था. इसलिए, दादासाहेब फाल्के ने राम और सीता दोनों के लीड रोल के लिए मेल एक्टर को चुना. दिलचस्प बात यह है कि एक्टर अन्ना सालुंके ने भगवान राम का रोल करने के अलावा माता सीता का फीमेल कैरेक्टर भी निभाया. इस तरह अन्ना सालुंके इंडियन सिनेमा के पहले एक्टर बने जिन्होंने एक ही फिल्म में (डबल रोल में) लीड एक्टर और लीड एक्ट्रेस दोनों का रोल किया. (फोटो साभार: IMDB)
1917 में जब फिल्म बनाने के रिसोर्स बहुत कम थे, दादासाहेब फाल्के ने अपनी सूझबूझ और कड़ी मेहनत से ‘लंका दहन’ में ऐसे विजुअल इफेक्ट्स का इस्तेमाल किया जिसने दर्शकों को हैरान कर दिया. खासकर, जब हनुमान लंका में आग लगाते हैं, तो कैमरा ट्रिक्स और एडिटिंग का शानदार इस्तेमाल उस समय किसी चमत्कार से कम नहीं था. फाल्के की टेक्निकल महारत ने यह पक्का किया कि साइलेंट फिल्म के जमाने में भी, उन्होंने एक्शन और ड्रामा के बीच एकदम सही बैलेंस बनाया, एक ऐसा काम जिसने दर्शकों को हैरान कर दिया. (फोटो साभार: IMDB)
‘लंका दहन’ की पॉपुलैरिटी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन दिनों दर्शक इस साइलेंट फिल्म को देखने के लिए मीलों पैदल चलकर थिएटर जाते थे. कई थिएटर में टिकटों की डिमांड इतनी ज्यादा थी कि थिएटर मालिक टिकट से मिली कमाई को बोरों में गिनते थे. यह फिल्म फाइनेंशियली भी सफल रही, जिससे दादासाहेब फाल्के और उनके प्रोडक्शन हाउस को फाइनेंशियली मजबूती मिली और यह साबित हुआ कि भारतीय दर्शक पौराणिक कहानियों पर आधारित फिल्में देखने के लिए कितने उत्सुक हैं. (फोटो साभार: IMDB)
भारत में रामायण सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि लोगों की आस्था का प्रतीक है. ‘लंका दहन’ पहली फिल्म थी जिसने रामायण के एक लाइव एपिसोड को बड़े पर्दे पर दिखाया. कहा तो ये भी जाता है जब भगवान राम, लक्ष्मण और हनुमान की तस्वीरें पर्दे पर आईं, तो थिएटर में दर्शक फिल्म देखने के बजाय श्रद्धा से हाथ जोड़ने लगे. कई जगहों पर तो लोगों ने थिएटर में घुसने से पहले अपने जूते भी उतार दिए. इस फिल्म ने सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन के साधन से आगे बढ़कर आस्था और संस्कृति से जोड़कर एक नया आयाम दिया, एक ऐसी भावना जो आज भी भारतीय सिनेमा में गूंजती है. (फोटो साभार: IMDB)