सतना. विंध्य क्षेत्र के किसानों के लिए नवंबर का महीना लहसुन और रबी प्याज की खेती की तैयारी के लिहाज से बेहद अहम है. रीवा, सतना, सीधी और शहडोल समेत आसपास के जिलों में किसान इन दोनों फसलों को अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं. हालांकि अच्छी पैदावार के लिए केवल बुवाई करना ही काफी नहीं है बल्कि सही किस्म का चुनाव, खेत की तैयारी, खाद-पानी का प्रबंधन और समय पर रोगों से बचाव करना भी जरूरी है. लहसुन की बुवाई अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक की जा सकती है. वहीं रबी प्याज के लिए इस समय नर्सरी तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए. लोकल 18 को जानकारी देते हुए सतना के किसान अंशुमान सिंह ने बताया कि वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर दोनों फसलों की पैदावार और गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है. लहसुन की फसल को बढ़ने के लिए ठंडी और हल्की नम जलवायु की जरूरत होती है. इसके लिए 12 से 24 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल माना जाता है. वहीं कंद पकने के समय मौसम का सूखा रहना फसल के लिए अच्छा होता है. इसकी खेती के लिए उपजाऊ दोमट या बलुई दोमट मिट्टी चुनें, जिसमें पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था हो.
खेत तैयार करने के लिए कल्टीवेटर और रोटावेटर से दो से तीन बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें. आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ 8 से 10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं. इसके साथ बुवाई के समय मिट्टी में 70 से 80 किलो डीएपी, 40 से 50 किलो पोटाश और 10 से 12 किलो बेंटोनाइट सल्फर देना चाहिए.
लहसुन की बुवाई में इन बातों का रखें ध्यान
एक एकड़ में लहसुन लगाने के लिए करीब 200 से 250 किलो स्वस्थ कलियों की जरूरत पड़ती है. बुवाई के लिए यमुना सफेद जी-41, जी-50, एग्रीफाउंड व्हाइट और ऊटी जैसी किस्मों को अपनाना चाहिए. कलियों को कतार से कतार 15 सेंटीमीटर और कली से कली 10 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाएं. इन्हें लगभग दो सेंटीमीटर गहराई में इस तरह बोएं कि नुकीला हिस्सा ऊपर की ओर रहे.
बुवाई के बाद हल्की सिंचाई
बुवाई के बाद हल्की सिंचाई करें और मिट्टी में नमी के हिसाब से सामान्यतः 10 से 12 दिन के अंतर पर पानी दें. फसल में शुरुआती बढ़वार के दौरान 25 से 30 दिन पर और फिर 45 से 50 दिन पर यूरिया की टॉप ड्रेसिंग करें. वहीं जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने से कंद की गुणवत्ता और पकने पर असर पड़ सकता है. खुदाई से करीब 20 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें ताकि कंद अच्छी तरह पक सकें.
नवंबर में प्याज की नर्सरी तैयार करना जरूरी
रबी प्याज की खेती में नवंबर का सबसे महत्वपूर्ण काम पौध तैयार करना है. एक एकड़ में रोपाई के लिए लगभग 3 से 4 किलो बीज की जरूरत पड़ती है. नर्सरी के लिए जमीन से करीब 15 सेंटीमीटर ऊंचे और 3 फीट चौड़े उठे हुए बेड बनाएं. बीजों को कतारों में बोने के बाद सड़ी हुई गोबर की खाद या केंचुआ खाद की हल्की परत से ढक दें. इसके बाद फव्वारे की मदद से नमी बनाए रखें. प्याज की पौध आमतौर पर 45 से 50 दिन में रोपाई के लायक हो जाती है, इसलिए नवंबर में नर्सरी तैयार करने वाले किसान दिसंबर से जनवरी के मध्य तक मुख्य खेत में रोपाई कर सकते हैं. एग्रीफाउंड लाइट रेड, एन-53, भीमा शक्ति और पूसा रेड जैसी किस्मों का चयन बेहतर रहता है.
प्याज की रोपाई और खाद-पानी का प्रबंधन
मुख्य खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ 50 किलो डीएपी, 30 किलो यूरिया, 30 किलो पोटाश और 5 किलो सल्फर का उपयोग करें. पौधों की रोपाई 15 सेंटीमीटर कतार से कतार और 10 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी पर करें. उठे हुए बेड पर खेती करने से पानी की निकासी और खेत के प्रबंधन में मदद मिल सकती है. रोपाई के बाद फसल में जरूरत के अनुसार सिंचाई करें. खेत में लंबे समय तक पानी जमा न होने दें क्योंकि इससे कंदों के खराब होने का खतरा बढ़ सकता है. प्याज की फसल का चक्र रोपाई के बाद लगभग 130 से 140 दिन का हो सकता है जबकि लहसुन की फसल तैयार होने में करीब 140 से 160 दिन लगते हैं.
थ्रिप्स और बैंगनी धब्बा रोग से फसल को बचाएं
लहसुन और प्याज की फसल में थ्रिप्स कीट नुकसान पहुंचा सकता है. यह पत्तियों का रस चूसता है, जिससे पत्तियां पीली या सफेद दिखाई देने लगती हैं. इसके अलावा प्याज में बैंगनी धब्बा रोग भी समस्या पैदा कर सकता है, जिसमें पत्तियों पर कत्थई या बैंगनी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. लहसुन की खुदाई आमतौर पर मार्च के अंत से अप्रैल की शुरुआत तक हो सकती है जबकि रबी प्याज की फसल अप्रैल के अंत से मई की शुरुआत के बीच तैयार हो सकती है. खुदाई के बाद कंदों को तीन से चार दिन तक छायादार और हवादार जगह पर सुखाना चाहिए ताकि उनकी ऊपरी परत अच्छी तरह सूख सके. इसके बाद उचित भंडारण की व्यवस्था करें और समय-समय पर कंदों की जांच करते रहें.
किसानों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जुलाई से सितंबर के बीच लहसुन या प्याज बेचने पर ज्यादा दाम मिलने की संभावना बाजार की आवक, मांग, गुणवत्ता और भंडारण की स्थिति पर निर्भर करती है, इसलिए केवल अधिक कीमत की उम्मीद में फसल रोकने के बजाय भंडारण का खर्च, खराब होने का जोखिम और बाजार भाव का आकलन जरूर करें. सही समय पर बुवाई, संतुलित खाद-पानी, रोगों से बचाव और सोच-समझकर बिक्री करने से विंध्य क्षेत्र के किसान लहसुन और रबी प्याज की खेती को बेहतर आमदनी का जरिया बना सकते हैं.