मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच तुर्की और इजिप्ट ने मिडिल ईस्ट के इलाके में सैन्य टकराव को बढ़ने से रोकने के लिए अपनी कूटनीतिक कोशिशें तेज कर दी हैं. मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलात्ती और तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान के बीच फोन पर बातचीत हुई. दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय हालात पर चर्चा की और आगे किसी बड़े संकट को रोकने के लिए आपसी तालमेल बनाए रखने पर सहमति जताई. इस घटनाक्रम को केवल दो देशों के बीच सामान्य बातचीत के रूप में देखना ही पर्याप्त नहीं होगा. इसके पीछे अमेरिका, इजरायल और ईरान से जुड़ा सैन्य तनाव, लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से एनर्जी सप्लाई और गाजा में जारी संकट जैसे बड़े मुद्दे हैं.
एक अहम बात यह भी है कि तुर्की और मिस्र अपने मतभेदों के बावजूद क्षेत्रीय संकटों पर साथ मिलकर काम कर रहे हैं. सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ मिलकर दोनों देश R4 नाम के कूटनीतिक समूह में भी शामिल हैं, जो बातचीत और क्षेत्रीय तालमेल के जरिए तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है. आइए समझते हैं कि दोनों देशों के बीच क्या हो रहा है, वे किन संकटों को लेकर चिंतित हैं और इस कूटनीतिक पहल का दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है.
दोनों देशों के बीच आखिर क्या हुआ?
मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलात्ती और तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान के बीच फोन पर बातचीत हुई. उन्होंने क्षेत्रीय तनाव को कम करने और आगे किसी संकट को रोकने के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत पर जोर दिया. ये बातचीत ऐसे समय हुई जब क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने और उसे कम करने की कोशिशें एक साथ चल रही थीं.
इस बातचीत का घोषित मकसद क्षेत्रीय हालात पर बातचीत के साथ ही आगे के संकटों को रोकने के लिए संपर्क बनाए रखना था. ध्यान देने वाली बात यह है कि दोनों देशों ने इस बातचीत में किसी नए मिलिट्री गठबंधन या संयुक्त सैन्य अभियान की घोषणा नहीं की. फिलहाल सामने आई जानकारी कूटनीतिक समन्वय और तनाव कम करने के प्रयासों से संबंधित है.
मिडिल ईस्ट में ऐसा क्या हो रहा है, जिससे दोनों देश चिंतित हैं?
इस कूटनीतिक सक्रियता के पीछे कई आपस में जुड़े संकट हैं. अमेरिका, इजरायल और ईरान से जुड़े सैन्य टकराव ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं. ऐसे हालात में किसी नए हमले या जवाबी कार्रवाई से संघर्ष का दायरा बढ़ने की आशंका रहती है.
तुर्की, मिस्र, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने 23 अक्टूबर को इस्तांबुल में हुई R4 विदेश मंत्रियों की बैठक में इस संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए निकालने की जरूरत पर जोर दिया था. उन्होंने नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा तथा बातचीत के माध्यम से स्थायी समाधान का समर्थन किया.
होर्मुज जलडमरूमध्य और तेल की सप्लाई
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. अगर यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो ऊर्जा आपूर्ति, माल ढुलाई और अंतरराष्ट्रीय बाजार प्रभावित हो सकते हैं. इसलिए क्षेत्रीय देश इस रास्ते पर सुरक्षित और बिना रोकटोक के जहाजों की सर्विस बनाए रखने को प्राथमिकता दे रहे हैं.
लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में जहाजों की सुरक्षा
लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार के अहम रास्ते हैं. यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों और क्षेत्रीय संघर्षों के कारण यहां व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई है. R4 समूह ने 23 अक्टूबर को हूती हमलों और व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने की निंदा की तथा सऊदी अरब के साथ एकजुटता जताई.
गाजा और फिलिस्तीन का मुद्दा
गाजा में मानवीय सहायता पहुंचाना और फिलिस्तीनी क्षेत्रों में तनाव कम करना भी मिस्र और तुर्की की बातचीत का अहम हिस्सा है. दोनों देशों ने पहले की बैठकों में गाजा तक निर्बाध मानवीय सहायता पहुंचाने और राजनीतिक समाधान की जरूरत पर जोर दिया है. इन सभी मुद्दों को एक साथ देखें तो स्पष्ट होता है कि मिस्र और तुर्की की मौजूदा बातचीत किसी एक घटना तक सीमित नहीं है. इसका संबंध क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और मानवीय संकट से है.
R4 क्या है, जिसमें मिस्र और तुर्की साथ आए हैं?
R4 समूह के चार देशों की बात करें तो तुर्की, मिस्र, सऊदी अरब, पाकिस्तान शामिल हैं. ये चारों देश क्षेत्रीय मुद्दों पर विदेश मंत्रियों के स्तर पर तालमेल कर रहे हैं. इसे औपचारिक सामूहिक रक्षा गठबंधन मानना सही नहीं होगा. R4 का मतलब है तुर्की, मिस्र, सऊदी अरब और पाकिस्तान का चार देशों वाला डिप्लोमेटिक समूह.
2026 में ऐक्टिव हुए इस मंच का मकसद क्षेत्रीय संकटों पर साझा चर्चा करना और राजनीतिक समाधान के लिए प्रयास करना है. 23 अक्टूबर को इस्तांबुल में हुई बैठक में इन देशों ने अमेरिका-इजरायल और ईरान से जुड़े संघर्ष, गाजा, हूती हमलों, होर्मुज स्ट्रेट और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षा पर चर्चा की. इसके बाद ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली के विदेश मंत्रियों के साथ भी विस्तारित बैठक हुई.
इस मंच का महत्व इसलिए है कि चारों देशों के पास अलग-अलग तरह का क्षेत्रीय प्रभाव है. तुर्की की सैन्य और कूटनीतिक पहुंच है, मिस्र स्वेज नहर और लाल सागर के आसपास महत्वपूर्ण रोल निभाता है, सऊदी अरब खाड़ी क्षेत्र की प्रमुख शक्ति है और पाकिस्तान के ईरान तथा खाड़ी देशों के साथ संबंध हैं. हालांकि चारों देशों के हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं. इसलिए R4 को एक साझा कूटनीतिक मंच के रूप में देखना अधिक उचित है, ना कि ऐसा गठबंधन जिसमें हर सदस्य हर स्थिति में एक जैसी कार्रवाई करने के लिए मजबूर हो.
क्या मिस्र और तुर्की के बीच पहले दुश्मनी थी?
हां, दोनों देशों के रिश्तों में एक दशक से ज्यादा समय तक गंभीर राजनीतिक तनाव रहा. मौजूदा सहयोग को समझने के लिए इस इतिहास को जानना जरूरी है.
- 2013 में रिश्ते बिगड़े: मिस्र में राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को सत्ता से हटाए जाने के बाद तुर्की और मिस्र के बीच राजनीतिक मतभेद गहरे हो गए. तुर्किये मुर्सी और मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रति अपने समर्थन के लिए जाना जाता था, जबकि मिस्र की नई सरकार मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन मानती थी.
- 2023 में सुधार की शुरुआत: दोनों देशों ने राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए और उच्चस्तरीय बातचीत फिर शुरू हुई.
- 2024 में राष्ट्रपति स्तर की मुलाकातें: एर्दोगन और अल-सीसी की मुलाकातों ने रिश्तों को नई दिशा दी. सितंबर 2024 में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय रणनीतिक सहयोग परिषद की पहली बैठक हुई.
- फरवरी 2026 में साझेदारी को मजबूती: एर्दोगन की मिस्र यात्रा के दौरान रक्षा, व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य और कृषि सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के समझौते हुए. दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को 2028 तक 15 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य भी रखा.
यानी आज का सहयोग केवल ईरान या गाजा के संकट की वजह से अचानक शुरू नहीं हुआ है. इसके पीछे पहले से चल रही संबंध सुधारने की प्रक्रिया भी है.
फिर तुर्की और मिस्र के बीच नया विवाद क्या है?
यहां एक महत्वपूर्ण पेच है. दोनों देश क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए साथ काम कर रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके सभी रणनीतिक मतभेद खत्म हो गए हैं. मिस्र, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने ग्रीस के साथ मिलकर तुर्किये और लीबिया के बीच हुए समुद्री सीमा समझौते की आलोचना की. इन देशों का कहना है कि यह समझौता पूर्वी भूमध्यसागर में क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े सवाल पैदा करता है. तुर्की ने आलोचना को निराधार बताते हुए अपनी नीति का बचाव किया.
इस विवाद की जड़ क्या है?
2019 में तुर्की और लीबिया की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त त्रिपोली स्थित सरकार ने समुद्री अधिकार क्षेत्र को लेकर एक समझौता किया था. इसके तहत दोनों देशों ने पूर्वी भूमध्यसागर में अपने समुद्री क्षेत्रों की सीमाएं तय करने से संबंधित व्यवस्था बनाई. ग्रीस और साइप्रस इस समझौते पर आपत्ति जताते रहे हैं. उनका कहना है कि इससे उनके समुद्री अधिकारों और क्षेत्रीय दावों पर असर पड़ता है. तुर्की इसके विपरीत अपने समुद्री हितों की रक्षा के लिए इस समझौते को महत्वपूर्ण मानता है.
यह विवाद ऊर्जा संसाधनों, समुद्री सीमाओं और संभावित गैस परियोजनाओं से भी जुड़ा है. मिस्र का ग्रीस के साथ सहयोग और तुर्की के साथ उसके अपने हित इस मामले को और जटिल बनाते हैं. इसलिए मौजूदा स्थिति को समझने का सही तरीका यह है कि मिस्र और तुर्की कुछ क्षेत्रीय संकटों पर सहयोग कर रहे हैं, लेकिन पूर्वी भूमध्यसागर जैसे मुद्दों पर उनके हित अब भी टकरा सकते हैं.
सऊदी अरब को लेकर मिस्र, तुर्की का रोल क्यों अहम है?
अक्टूबर में हूती विद्रोहियों के सऊदी अरब पर हमलों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है. 11 अक्टूबर को R4 समूह ने सऊदी अरब पर हुए हमलों की निंदा की थी. इसके बाद 26 अक्टूबर को मिस्र की संसद ने सऊदी अरब की रक्षा में मदद के लिए राष्ट्रपति अल-सीसी को जरूरी कदम उठाने की अनुमति दी. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मिस्र ने अपनी संभावित भूमिका को डिफेंसिव बताया है.
इस घटनाक्रम में तुर्की की भूमिका भी खास है. तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच अगस्त 2026 में हुए रक्षा समझौते के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग बढ़ा है. हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि मिस्र और तुर्किये ने मिलकर यमन में कोई संयुक्त सैन्य अभियान शुरू करने का फैसला किया है. मौजूदा स्थिति में कुछ बातों को समझना जरूरी है.
पहला मिस्र का मामला है, जो सऊदी अरब की सुरक्षा और समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा को महत्वपूर्ण मानता है. दूसरा है कि तुर्की क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ ईरान से जुड़े संघर्ष को बातचीत के जरिए सुलझाने पर जोर दे रहा है. फिर R4 समूह की बात करें तो ये क्षेत्रीय देशों के बीच कूटनीतिक समन्वय और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने का मंच है.
भारत और दुनिया के लिए इसका क्या मतलब है?
मिस्र और तुर्की की सक्रियता भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मिडिल ईस्ट में तनाव का असर तेल, गैस, समुद्री व्यापार और माल ढुलाई की लागत पर पड़ सकता है. भारत के नजरिए से बात करें तो होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा होने से कच्चे तेल और ऊर्जा आपूर्ति की लागत बढ़ सकती है. लाल सागर में जहाजों पर हमले होने से जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है, जिससे माल ढुलाई महंगी हो सकती है. गाजा और क्षेत्रीय संघर्ष की वजह से मानवीय सहायता और क्षेत्रीय कूटनीति पर दबाव बढ़ सकता है. तनाव कम करने की बातचीत से समुद्री मार्गों और व्यापार में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है.
इन सभी बातों की संभावना है. ऐसा नहीं है कि इस बात का दावा किया जा रहा है कि 28 अक्टूबर की बातचीत से तेल की कीमतों या जहाजों की आवाजाही में तत्काल कोई बदलाव आ गया है. असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि स्थानीय तनाव आगे किस दिशा में जाता है और कूटनीतिक कोशिशें कितनी सफल होती हैं.