सतना. अंग्रेजों के जमाने से गांवों में सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी निभा रहे कोटवार आज भी अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं. गांव में मुनादी करने से लेकर अपराध, प्राकृतिक आपदा और जरूरी सरकारी सूचनाओं को प्रशासन तक पहुंचाने वाले इन कर्मचारियों का कहना है कि सालों तक सेवा देने के बाद भी उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला है. कम वेतन और सुविधाओं की कमी के बीच परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है. इसी को लेकर मध्य प्रदेश आजाद कोटवार कर्मचारी संघ ने सतना में धरना शुरू कर दिया है. कोटवारों की मांग है कि सरकार उन्हें नियमित करे और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का दर्जा देकर दूसरे सरकारी कर्मचारियों की तरह सुविधाएं उपलब्ध कराए.
अपनी मांगों को लेकर मध्य प्रदेश आजाद कोटवार कर्मचारी संघ के सदस्य सतना में कलेक्ट्रेट परिसर के पास धवारी चौराहे पर कलमबंद हड़ताल कर धरने पर बैठे हैं. कोटवारों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर सरकार और प्रशासन को ज्ञापन सौंप रहे हैं लेकिन अब तक कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया है. इसी नाराजगी के चलते प्रदेश के सभी 53 जिलों में प्रदर्शन किया जा रहा है. संघ ने साफ किया है कि जब तक उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा.
अंग्रेजों के समय से निभा रहे जिम्मेदारी
कोटवार ग्रामीण प्रशासन की सबसे पुरानी व्यवस्थाओं में से एक का हिस्सा हैं. पहले के समय में गांवों की रखवाली, सूचनाएं पहुंचाने और प्रशासनिक कामों में मदद करने के लिए उनकी भूमिका तय की गई थी. उस दौर में कई जगह उन्हें सेवा के बदले जमीन या अनाज दिया जाता था. समय के साथ प्रशासनिक व्यवस्था बदली और कोटवारों की जिम्मेदारियां भी सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन गईं लेकिन आज भी उनके रोजगार और सुविधाओं को लेकर सवाल बने हुए हैं.
केवल मुनादी तक सीमित नहीं जिम्मेदारी
गांवों में कोटवार की जिम्मेदारी केवल मुनादी करने तक सीमित नहीं है, उन्हें सरकारी आदेशों और जरूरी सूचनाओं को लोगों तक पहुंचाना, जन्म-मृत्यु से जुड़े रिकॉर्ड के काम में सहयोग करना और किसी अपराध, संदिग्ध गतिविधि या प्राकृतिक आपदा की जानकारी पुलिस और राजस्व अधिकारियों तक पहुंचाना होता है. इसके अलावा पटवारी और तहसीलदार के निर्देशों का पालन करने में भी वे मदद करते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में जहां संचार के साधन सीमित हैं, वहां सरकारी सूचनाएं लोगों तक पहुंचाने में उनकी भूमिका आज भी अहम मानी जाती है.
इतने वेतन में घर चलाना मुश्किल
लोकल 18 से बातचीत में कोटवार संघ के जिला अध्यक्ष श्यामलाल दहिया ने बताया कि कोटवारों के नियमितीकरण की लड़ाई अंग्रेजों के समय से चली आ रही है लेकिन एक सदी से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उन्हें स्थायी कर्मचारी नहीं बनाया गया है. उन्होंने कहा कि कोटवारों को करीब 9,000 से 9,500 रुपये तक वेतन मिलता है. आज की महंगाई में इतनी कम रकम से घर चलाना और बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना मुश्किल हो रहा है. श्यामलाल दहिया के मुताबिक, कोटवार भी लंबे समय से सरकारी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, इसलिए उन्हें भी सम्मानजनक वेतन और रोजगार की सुरक्षा मिलनी चाहिए. संघ की मांग है कि सभी कोटवारों को नियमित कर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए ताकि वे अपने परिवार का भरण-पोषण बेहतर तरीके से कर सकें.
नियमित करने समेत चार प्रमुख मांगें
मध्य प्रदेश आजाद कोटवार कर्मचारी संघ ने सरकार के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं. पहली मांग है कि प्रदेश के सभी करीब 38000 कोटवारों को नियमित किया जाए. दूसरी मांग में उन्हें दूसरे सरकारी कर्मचारियों की तरह शासन की ओर से मिलने वाली सुविधाएं देने की बात कही गई है. तीसरी मांग है कि किसी कोटवार के सेवा से मुक्त होने के बाद उसके वारिस को कोटवार के पद पर नियुक्ति में प्राथमिकता दी जाए, जिससे परिवार की आजीविका पर संकट न आए. चौथी मांग रिटायरमेंट से जुड़ी है. संघ का कहना है कि कोटवारों को सेवानिवृत्ति के बाद एक लाख रुपये देने के संबंध में जो आदेश जारी किया गया है, उसे पूरे प्रदेश में प्रभावी तरीके से लागू किया जाए.
30 अक्टूबर को भोपाल के नीलम पार्क में जुटेंगे कोटवार
संघ के सचिव ने बताया कि प्रदेशभर के कोटवार अपनी मांगों को लेकर एकजुट हो रहे हैं. इसी कड़ी में 30 अक्टूबर को मध्य प्रदेश के करीब 38000 कोटवार भोपाल के नीलम पार्क में एकत्र होकर धरना-प्रदर्शन करेंगे. संगठन का उद्देश्य सरकार तक अपनी समस्याएं पहुंचाना और नियमितीकरण समेत सभी मांगों पर निर्णय कराने के लिए दबाव बनाना है.
अब देखना होगा कि लंबे समय से सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बने कोटवारों की मांगों पर सरकार क्या कदम उठाती है. फिलहाल सतना समेत प्रदेश के अलग-अलग जिलों में जारी आंदोलन के बीच कोटवार नियमित नौकरी, बेहतर वेतन और सरकारी कर्मचारियों जैसी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं.