नैनीताल. उत्तराखंड के नैनीताल की पहचान सिर्फ खूबसूरत झील, पहाड़ों और प्राकृतिक नजारों तक सीमित नहीं है. यहां की रंग-बिरंगी, खुशबूदार और हाथों से तैयार की जाने वाली डिजाइनर मोमबत्तियां भी लंबे समय तक पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रही हैं. नैनीताल आने वाले पर्यटक यहां की यादों को अपने साथ ले जाने के लिए कैंडल खरीदना नहीं भूलते, लेकिन बदलते बाजार, महंगे कच्चे माल, सस्ते मशीन-मेड उत्पादों और टैक्स के बोझ ने इस कारोबार की चमक फीकी कर दी है. कभी करोड़ों रुपये का सालाना कारोबार करने वाला नैनीताल का कैंडल उद्योग अब अस्तित्व बचाने की चुनौती से जूझ रहा है. कारोबारियों के मुताबिक, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था पर पड़े असर और चीन व ईरान से मोम की आपूर्ति प्रभावित होने से उनकी मुश्किलें और बढ़ी हैं.
नैनीताल में कैंडल कारोबार की गिरती स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी इसका सालाना टर्नओवर करीब 8 से 10 करोड़ रुपये तक हुआ करता था, जो अब घटकर लगभग 25 लाख रुपये रह गया है. कारोबारियों के अनुसार, बदलते ट्रेंड और बाजार में सस्ती सजावटी मोमबत्तियों की बढ़ती उपलब्धता ने स्थानीय उत्पादों की मांग को प्रभावित किया है. इसका असर न केवल बिक्री पर पड़ा है, बल्कि इस पारंपरिक हुनर से जुड़े कारीगरों और उनके परिवारों की आजीविका पर भी दिखाई देने लगा है.
45 साल में बदल गई तस्वीर
नैनीताल के मल्लीताल स्थित बुधलाकोटी कैंडल्स के मालिक टीसी बुधलाकोटी लोकल 18 से बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1981 में नैनीताल में मोमबत्तियां बनाने का काम शुरू किया था. उस दौर में शहर में एक दर्जन से अधिक कारीगर इस काम से जुड़े हुए थे. अब कैंडल बनाने वाले पुराने कारीगरों की संख्या घटकर महज दो-तीन रह गई है. पहले नैनीताल में 100 से 150 कैंडल फैक्ट्रियां हुआ करती थीं, लेकिन अब शहर में कुछ चुनिंदा इकाइयां ही बची हैं. टीसी बुधलाकोटी के मुताबिक, पहले कैंडल निर्माण स्थानीय लोगों के लिए स्वरोजगार का बड़ा माध्यम था, लेकिन लगातार बढ़ती लागत, घटती मांग और सरकारी रियायतों में कमी ने इस कारोबार को बेटरी कर दिया है. कच्चे माल पर टैक्स बढ़ने और सब्सिडी खत्म होने से भी व्यापारियों की परेशानियां बढ़ी हैं.
9 रुपये वाला वैक्स अब 200 रुपये का
कैंडल कारोबारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक कच्चे माल की बढ़ती कीमतें हैं. टीसी बुधलाकोटी के अनुसार, जिस वैक्स की कीमत कभी करीब 9 रुपये प्रति किलो थी, वह अब लगभग 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है. कैंडल बनाने में इस्तेमाल होने वाला लिक्विड भी करीब 600 रुपये प्रति किलो मिल रहा है. कच्चे माल की कीमतों में भारी अंतर के कारण उत्पादन लागत बढ़ गई है. दूसरी ओर, बाजार में सस्ती मशीनों से तैयार और चीनी सजावटी मोमबत्तियों से मुकाबला करना स्थानीय कारीगरों के लिए मुश्किल हो रहा है.
18 प्रतिशत टैक्स से बढ़ा बोझ
कैंडल कारोबार से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि 18 प्रतिशत टैक्स का बोझ भी उनकी आर्थिक मुश्किलों को बढ़ा रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था पर पड़े असर और चीन व ईरान से मोम की आपूर्ति में आई कमी को भी वे कारोबार में गिरावट की प्रमुख वजहों में गिनाते हैं. माल रोड स्थित नारायण कैंडल्स के मालिक आलोक तिवारी भी पिछले करीब 30 वर्षों से इस कारोबार से जुड़े हैं. उनका कहना है कि बीते तीन से चार वर्षों में कैंडल की बिक्री और मांग में गिरावट देखने को मिली है. मोम की बढ़ती कीमतों और बदलते बाजार के कारण कारोबार को पहले की तरह चलाना मुश्किल हो गया है.
नई पहचान देने की कोशिश
बदलते बाजार में अपनी जगह बनाए रखने के लिए स्थानीय कारीगर अब नए प्रयोग भी कर रहे हैं. पारंपरिक कैंडल्स को आकर्षक बनाने के लिए उनमें ऐपण जैसी पहाड़ी लोककला का इस्तेमाल किया जा रहा है. डिजाइनर और हस्तनिर्मित मोमबत्तियों के जरिए स्थानीय उत्पादों को सस्ती मशीन-मेड कैंडल्स से अलग पहचान देने की कोशिश हो रही है. नैनीताल के निकट गेठिया गांव में 50 से अधिक महिलाएं कैंडल उत्पादन से जुड़कर इस कला को आगे बढ़ा रही हैं. इससे महिला स्वरोजगार को भी सहारा मिल रहा है.