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Maroth Muthasin Mata Temple History: नागौर के मारोठ में पहाड़ी की तलहटी में स्थित मुठासीण माता का 700 साल पुराना मंदिर आस्था और इतिहास का अनूठा संगम है. गौड़ राजपूतों द्वारा विक्रम संवत 1300 के आसपास निर्मित इस मंदिर में माता पार्वती के सौम्य और काली माता के रौद्र दोनों स्वरूपों की पूजा होती है. यह धाम स्वर्णकार समाज के 11 गोत्रों की कुलदेवी का स्थान है. ऐतिहासिक रूप से गौड़ावाटी और मेड़तिया राजपूतों के शासन का साक्षी रहा यह मंदिर आज भी देश भर से श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है.
नागौर: राजस्थान के नागौर जिले के ऐतिहासिक मारोठ कस्बे में पहाड़ी की तलहटी में स्थित मुठासीण माता का मंदिर लोक आस्था, प्राचीन इतिहास और समृद्ध धार्मिक परंपराओं का अद्भुत संगम है. स्थानीय लोग और श्रद्धालु इस प्राचीन धाम को ‘काल की माता’ के नाम से भी जानते हैं. मान्यता है कि करीब 700 वर्ष पूर्व गौड़ राजपूतों द्वारा इस पावन मंदिर का निर्माण करवाया गया था. आज भी देश के कोने-कोने में बसे गौड़ राजपूत और स्वर्णकार समाज के श्रद्धालु माता के दर पर मन्नतें मांगने और शीश नवाजने पहुंचते हैं. यह पावन स्थल न केवल धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि मारोठ के गौरवशाली और ऐतिहासिक अतीत की याद भी ताजा करता है.
स्थानीय जनश्रुतियों और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, विक्रम संवत 1300 के शुरुआती दौर में गौड़ राजपूतों ने मुठासीण माता मंदिर की स्थापना करवाई थी. उस दौर में मारोठ क्षेत्र संपूर्ण गौड़ावाटी साम्राज्य की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था और यहां गौड़ राजपूतों का मजबूत शासन स्थापित था. इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की वजह से इस मंदिर का महत्व युगों-युगों से बना हुआ है. सदियों के दौरान क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति और सामाजिक ताने-बाने में कई बदलाव आए, लेकिन माता मुठासीण के प्रति श्रद्धालुओं की अटूट आस्था आज भी वैसी ही जीवंत है.
मां पार्वती और काली स्वरूपों का अद्वितीय संगम
मंदिर की सबसे अनूठी और मुख्य विशेषता यहां स्थापित माता की दो दिव्य मूर्तियां हैं. स्थानीय निवासी हंसराज शर्मा के अनुसार, मंदिर परिसर में विराजमान एक मूर्ति मां पार्वती के अत्यंत सौम्य और शांत स्वरूप को दर्शाती है, जबकि दूसरी मूर्ति में मां काली के शक्तिशाली रौद्र स्वरूप की पूजा की जाती है. एक ही स्थान पर भगवती के शांत और उग्र दोनों स्वरूपों का यह समागम बेहद दुर्लभ माना जाता है. श्रद्धालु माता के इन दोनों स्वरूपों के दर्शन कर अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सुरक्षा की कामना करते हैं.
स्वर्णकार समाज की 11 गोत्रों की कुलदेवी
मुठासीण माता मंदिर का स्वर्णकार समाज के साथ अत्यंत गहरा और अटूट सांस्कृतिक संबंध है. धार्मिक परंपराओं के अनुसार, स्वर्णकार समाज की जाड़ा, ढल्ला, बनाथिया, मांडण, मौसूण और रोड़ा सहित कुल 11 गोत्रों की मुठासीण माता कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं. इसके अतिरिक्त सोनी समाज के मांडण, ढल्ला और रोड़ा गोत्र के परिवार भी माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं. यही कारण है कि वर्ष भर राजस्थान और देश के विभिन्न राज्यों से परिवार अपने नवविवाहित जोड़ों के जात-जड़ूले और पारिवारिक अनुष्ठानों के लिए मारोठ पहुंचते हैं.
गौड़ावाटी से मेड़तिया शासन तक की गाथा
इतिहासकारों के अनुसार, विक्रम संवत 1300 से 1700 तक मारोठ पर गौड़ राजपूतों का आधिपत्य रहा, जिससे यह भूभाग ‘गौड़ावाटी’ कहलाया. इसके बाद विक्रम संवत 1715 (सन 1658) में प्रसिद्ध धर्मत के युद्ध के दौरान राठौड़ शासकों और रघुनाथ सिंह मेड़तिया ने मारोठ पर अपना अधिकार स्थापित किया. इसके बाद यहां मेड़तिया राजपूतों का शासन शुरू हुआ. समय बीतने के साथ राजपूत परिवार अन्य स्थानों पर जाकर बस गए, लेकिन माता के प्रति उनकी भक्ति पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रही. आज भी यह मंदिर नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत और परंपराओं से जोड़ता है.