भारत-चीन बॉर्डर के नक्शे पर खिंची 890 किलोमीटर लंबी रेखा चीन की आंखों में सालों से किरकिरी बनी हुई है. हद तो तब हो गई जब चीनी सैनिकों ने 22 अक्टूबर को पैदल मार्च करते हुए बॉर्डर में घुसने की कोशिश लेकिन भारतीय सैनिकों ने इस चाल क नाकाम कर दिया. ड्रैगन यानी चीन आए दिन अरुणाचल प्रदेश पर अपना झूठा दावा ठोकता है, कभी वहां के इलाकों के मनगढ़ंत नाम रख देता है तो कभी उसे ‘जैंगनान’ या ‘दक्षिणी तिब्बत’ बताकर अपना हक जताने का ढोंग करता है. लेकिन हर बार, भारत की ढाल बनकर खड़ी एक ऐतिहासिक बाउंड्री उसकी सारी चालबाजियों को पूरी तरह नाकाम कर देती है.
क्या है McMahon Line?
ये कोई मामूली सीमा नहीं, बल्कि ‘मैकमोहन रेखा’ है, वो 890 किलोमीटर की अमर लक्ष्मण रेखा, जिसने दशकों से अरुणाचल प्रदेश की एक-एक इंच जमीन को चीन के नापाक कब्जे में जाने से बचा रखा है. लाख कोशिशों, गीदड़भभकियों और सैन्य दबाव के बावजूद, चीन चाहकर भी इस कानूनी और ऐतिहासिक रेखा के वजूद को मिटा नहीं पा रहा है.
आखिर चीन की गंदी नजर अरुणाचल प्रदेश पर क्यों टिकी है?
चीन का अरुणाचल प्रदेश पर बार-बार दावा ठोकना कोई अचानक उठा हुआ कदम नहीं है, बल्कि इसके पीछे उसकी गहरी राजनीतिक चाल, ऐतिहासिक जिद और खतरनाक सैन्य रणनीति छिपी हुई है. चीन अरुणाचल को सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं मानता, बल्कि उसे ‘दक्षिणी तिब्बत’ कहकर अपने प्रोपोगंडा नक्शे में दिखाने की घटिया हरकत करता रहता है. इसके पीछे 3 बड़े कारण हैं.
- ऐतिहासिक बहानेबाजी और झूठ: चीन का ये बेबुनियाद दावा है कि अरुणाचल प्रदेश का तिब्बत के साथ पुराना सांस्कृतिक और धार्मिक नाता रहा है. तवांग जैसे पवित्र क्षेत्रों में तिब्बती बौद्ध धर्म के बड़े केंद्र और मठ मौजूद हैं, जिन्हें चीन अपने प्रभाव क्षेत्र में दिखाना चाहता है.
- सैन्य और रणनीतिक अहमियत: अरुणाचल प्रदेश का भौगोलिक भूगोल ऐसा है कि जो भी इस पर नियंत्रण रखेगा, उसे पूरे पूर्वोत्तर भारत और देश के बेहद संवेदनशील ‘चिकन नेक कॉरिडोर’ पर रणनीतिक बढ़त हासिल हो जाएगी. चीन भारत को हमेशा बैकफुट पर धकेलने के लिए इस ऊंचाई वाले इलाके पर अपनी पकड़ बनाना चाहता है.
- तिब्बत पर पूर्ण नियंत्रण की सनक: साल 1949-1950 में जब चीन ने तिब्बत पर जबरन खूनी कब्जा किया, तो उसने तिब्बत से जुड़ी हर ऐतिहासिक सीमा और दावों को अपना मान लिया और तभी से वो विस्तारवादी नीति पर काम कर रहा है.
1914 का शिमला समझौता: कैसे खींची गई थी ये ऐतिहासिक लक्ष्मण रेखा?
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है साल 1914 से, जब ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधि शिमला में एक बड़ी मेज पर आमने-सामने बैठे थे. उस वक्त ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन थे, जो सीमा निर्धारण की इस प्रक्रिया को लीड कर रहे थे.
इस ऐतिहासिक शिमला सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच पूर्वी सीमा को अंतिम और पक्का रूप दिया गया. ब्रिटिश भारत और तिब्बत के अधिकृत प्रतिनिधियों ने बड़े-बड़े नक्शों पर लाल स्याही से एक साफ रेखा खींची, जिसे बाद में सर हेनरी मैकमोहन के नाम पर ‘मैकमोहन रेखा’ का नाम दिया गया. इस रेखा ने बिल्कुल साफ कर दिया कि तवांग सहित अरुणाचल प्रदेश का पूरा का पूरा भूभाग भारत की संप्रभु सीमा के भीतर आता है. उस वक्त तिब्बत ने इस समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर किए थे और इसे पूरी तरह मान्यता दी थी.
चीन का घटिया पैंतरा: ‘ये कोलोनियल दौर का गैर-कानूनी समझौता है!’
जैसे ही मैकमोहन रेखा कागजों और नक्शों पर खिंची, वैसे ही चीन के पेट में दर्द शुरू हो गया. चीन आज तक इस अंतरराष्ट्रीय रेखा को मानने से साफ इनकार करता है और इसे ‘औपनिवेशिक दौर का असमान समझौता’ कहकर खारिज करने की कोशिश करता है.
चीन का मुख्य कुतर्क ये है कि 1914 में तिब्बत कोई स्वतंत्र देश था ही नहीं, इसलिए उसके पास ब्रिटिश भारत के साथ किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा संधि पर हस्ताक्षर करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था.
लेकिन ऐतिहासिक सच इसके बिल्कुल उलट है. साल 1914 में तिब्बत एक पूरी तरह स्वतंत्र और संप्रभु संस्था की तरह कार्य कर रहा था. उसके पास अपनी स्वतंत्र सरकार थी, अपनी सेना थी और वो खुद अंतरराष्ट्रीय संधियां करने में पूरी तरह सक्षम था. मैकमोहन रेखा के तमाम असली दस्तावेज और नक्शे आज भी लंदन की प्रसिद्ध ब्रिटिश लाइब्रेरी और भारत सरकार के अभिलेखागार में सुरक्षित रखे हुए हैं, जो इस बात का जीता-जागता और अकाट्य सबूत हैं कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अटूट और अभिन्न हिस्सा है.
1950 का काला मोड़: तिब्बत का हड़पा जाना और चीन का बढ़ता दुस्साहस
जब 1949 में चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हुई और 1950 में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत पर जबरन खूनी कब्जा कर लिया, तो ये पूरा विवाद और अधिक गंभीर हो गया. तिब्बत पर कब्जा जमाते ही चीन की सीमाएं सीधे तौर पर भारत से आ लगीं.
चीन ने तिब्बत के पुराने और खारिज किए जा चुके दावों को अपनी ‘विरासत’ बताना शुरू कर दिया. उसने मैकमोहन रेखा को सिरे से नकारते हुए अरुणाचल प्रदेश के लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर के विशालकाय इलाके पर अपना झूठा दावा ठोकना शुरू कर दिया. साल 1962 के भारत-चीन युद्ध में भी ड्रैगन का मेल और एकमात्र टारगेट इसी पूर्वी सीमा को तोड़ना था. हालांकि, युद्ध के बाद भारतीय सेना के कड़े प्रतिरोध के चलते चीनी सेना को वापस लौटना पड़ा और वही मैकमोहन रेखा आज ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ यानी LAC के पूर्वी हिस्से का मुख्य कानूनी और रणनीतिक आधार बनी हुई है.
ड्रैगन की हर चाल हुई नाकाम, भारत का रुख है एकदम साफ!
आज के आधुनिक दौर में चीन चाहे कितनी भी चालें चल ले, चाहे वो अरुणाचल के गांवों और कस्बों के मनगढ़ंत चीनी नाम बदले, अपनी सेना को एलएसी (LAC) के पास जमा करे या फिर कोई नया फर्जी नक्शा जारी करे, वो इस 890 किलोमीटर लंबी लक्ष्मण रेखा को कभी नहीं मिटा सकता. भारत का रुख हमेशा से शीशे की तरह बिल्कुल साफ और अडिग रहा है.
- कानूनी मजबूती: मैकमोहन रेखा साल 1914 की एक पूरी तरह वैध और अंतरराष्ट्रीय संधि का परिणाम है, जिसे दुनिया के तमाम देश सही मानते हैं.
- सैन्य तैयारी और ताकत: आज का भारत साल 1962 वाला कमजोर भारत नहीं है. अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर भारत ने आधुनिक सड़कें, सामरिक सुरंगे (जैसे सेला टनल), एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड्स और भारी मात्रा में अत्याधुनिक सैन्य बल तैनात कर रखा है.
- अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का समर्थन: संयुक्त राज्य अमेरिका समेत दुनिया के तमाम बड़े और ताकतवर देश अरुणाचल प्रदेश को भारत का अखंड और संप्रभु हिस्सा मानते हैं और मैकमोहन रेखा को ही एकमात्र आधिकारिक सीमा स्वीकार करते हैं.
चीन चाहे जितने भी छद्म दावे कर ले, 890 किलोमीटर की ये मैकमोहन रेखा भारत की संप्रभुता और अस्वच्छनीय ताकत का वो अटूट प्रतीक है, जिसे चीर पाना ड्रैगन के बस की बात कभी नहीं हो सकती!