बीजिंग: संयुक्त राष्ट्र के मंच पर 27 अक्टूबर को एक बड़ा ही अजीबोगरीब वाकया देखने को मिला. चीन ने ईमानदारी का मुखौटा पहनकर अमेरिका को जमकर ज्ञान दिया. चीन के संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि फू कोंग ने क्यूबा के खिलाफ दशकों से जारी आर्थिक पाबंदी को तुरंत खत्म करने की वकालत की. चीन ने UN में बड़े-बड़े भाषण झाड़ते हुए कहा कि हर देश की अपनी संप्रभुता होती है, और किसी बड़े देश को अपने से छोटे देश पर दादागिरी नहीं दिखानी चाहिए. ये उपदेश देते वक्त फू कोंग खुद अपने देश का ट्रैक रिकॉर्ड भूल गए.
पड़ोसियों के साथ चीन की करतूतें
जो चीन खुद भारत, ताइवान, फिलीपींस और वियतनाम जैसे अपने तमाम पड़ोसी देशों की जमीन और समंदर पर गिद्ध की नजरें गड़ाए बैठा है. वो कई देशों को बार-बार अपने सैनिक भेजकर परेशान करता रहता है. यही चीन आज अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता की पट्टी पढ़ा रहा है.
संयुक्त राष्ट्र में चीन ने क्या-क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘क्यूबा पर अमेरिका के आर्थिक, वाणिज्यिक और वित्तीय प्रतिबंधों को खत्म करने की सख्त जरूरत’ वाले विषय पर बहस चल रही थी. इसी दौरान चीनी राजदूत फू कोंग ने अमेरिका को आड़े हाथों लिया और गजब के दोगलेपन का प्रदर्शन करते हुए नैतिकता का पाठ पढ़ाया.
- 60 साल का अवैध नाकाबंदी: चीन ने कहा कि अमेरिका पिछले 60 से ज्यादा सालों से क्यूबा पर गैर-कानूनी आर्थिक पाबंदियां थोप रहा है. यूएन में 34 बार इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है, फिर भी अमेरिका टस से मस नहीं हो रहा है.
- सब देश बराबर हैं: फू कोंग ने कहा कि चाहे कोई देश छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या गरीब, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सभी को बराबर का हक है. हर देश को अपनी मर्जी से अपनी सरकार और विकास का रास्ता चुनने का पूरा अधिकार है.
- थोप नहीं सकते अपनी मर्जी: चीन ने दलील दी कि कोई भी देश सैन्य धमकी या अदालती कार्रवाई का ढोंग करके किसी दूसरे देश पर अपनी मर्जी नहीं थोप सकता. क्यूबा का भविष्य सिर्फ वहां के लोग तय करेंगे.
- अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई: चीन ने दावा किया कि यूएन सुरक्षा परिषद (UNSC) की मंजूरी के बिना लगाई गई एकतरफा पाबंदियां अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय नैतिकता के खिलाफ हैं.
चीन का अपना रिकॉर्ड: खुद क्या करता है ड्रैगन?
चीन के ये बड़े-बड़े और लुभावने बोल सुनकर दुनिया को हंसी भी आती है और गुस्सा भी. चीन जिस ‘संप्रभुता और बराबरी’ की बात कर रहा है, उसकी धज्जियां उड़ाने में वो खुद दुनिया में नंबर-1 है.
- भारत के साथ सीमा विवाद और दगाबाजी : भारत के अरुणाचल प्रदेश को चीन जबरन ‘दक्षिणी तिब्बत’ बताता है. 1914 की मैकमोहन रेखा को नकारना हो या फिर लद्दाख में गलवान घाटी जैसी हिंसक घुसपैठ करना, चीन ने भारत की संप्रभुता का कभी सम्मान नहीं किया. वो आए दिन भारत के इलाकों के नाम बदलकर अपनी घटिया चालबाजियां चलता रहता है.
- ताइवान को हड़पने की सनक : चीन का दावा है कि ताइवान उसका हिस्सा है. जबकि ताइवान अपनी खुद की लोकतांत्रिक सरकार चलाता है. चीन आए दिन ताइवान के एयरस्पेस और समुद्री सीमाओं में लड़ाकू विमान भेजकर उसे युद्ध की धमकी देता रहता है. ताइवान की आजादी और संप्रभुता को चीन एक झटके में कुचल देना चाहता है.
- दक्षिण चीन सागर में गुंडागर्दी : फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे छोटे-छोटे देश दक्षिण चीन सागर के किनारे बसे हैं. अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यह समंदर सबका है. लेकिन चीन ने पूरे समंदर पर अपना दाबा ठोक दिया है और आर्टिफिशियल द्वीप बनाकर वहां मिसाइलें तैनात कर दी हैं. फिलीपींस के मछुआरों पर चीनी कोस्टगार्ड वाटर कैनन और गोलियां चलाते हैं.
- कर्ज के जाल वाली कूटनीति : श्रीलंका, पाकिस्तान और अफ्रीका के कई छोटे देशों को पहले भारी भरकम ब्याज पर कर्ज देना और जब वो चुका न पाएं तो उनके बंदरगाहों पर 99 साल के लिए कब्जा कर लेना, जैसा उसने श्रीलंका का हंबनटोटा के साथ किया था. क्या ये किसी देश की संप्रभुता पर हमला नहीं है?
अमेरिका पर निशाना, लेकिन असल मकसद कुछ और है!
सवाल ये उठता है कि चीन अचानक क्यूबा का इतना बड़ा हमदर्द क्यों बन गया है? इसके पीछे चीन की सोची-समझी कूटनीति है.
- ग्लोबल साउथ का नेता बनने का नाटक: चीन खुद को उन सभी छोटे और विकासशील देशों का ‘मसीहा’ साबित करना चाहता है जो अमेरिका से नाराज हैं.
- अमेरिका के घर के पास अपना ठिकाना: क्यूबा अमेरिका के बेहद करीब फ्लोरिडा से महज कुछ मील दूर स्थित है. चीन क्यूबा की मदद के बहाने वहां अपना खुफिया और सैन्य बेस मजबूत कर रहा है ताकि वह अमेरिका पर सीधे नज़र रख सके.
- खुद के प्रतिबंधों से बचाव: चीन जानता है कि भविष्य में अगर वो ताइवान पर हमला करता है, तो अमेरिका उस पर भी ऐसे ही आर्थिक प्रतिबंध लगाएगा. इसीलिए वह अभी से एकतरफा पाबंदियों को गैर-कानूनी साबित करने का माहौल बना रहा है.
‘हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और’
चीन का ये यूएन वाला भाषण ‘सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’ जैसी कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करता है. एक तरफ चीन खुद अपने छोटे और शांतिप्रिय पड़ोसी देशों की ज़मीन हड़पने के लिए अपनी ताकत का नंगा नाच दिखाता है तो दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र के मंच पर खड़े होकर अमेरिका को संप्रभुता और नैतिकता का पाठ पढ़ाता है.
दुनिया आज चीन के इस दोहरे चरित्र को बहुत अच्छी तरह समझ चुकी है. अगर चीन सचमुच अंतरराष्ट्रीय कानून और बराबरी में विश्वास रखता है, तो उसे सबसे पहले अपने पड़ोसियों के बॉर्डर से अपनी आक्रामक सेना पीछे हटानी चाहिए और दूसरों की जमीन पर डाका डालना बंद करना चाहिए!