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Most Terrifying Cyclone Bhola Cyclone: ओडिशा और आंध्र प्रदेश में अर्नब चक्रवात से भारी बारिश और तेज हवाएं चल रही हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया में सबसे खतरनाक तूफान कौन सा था. 1970 में आए भोला चक्रवात ने बंगाल की खाड़ी में तबाही मचाई थी, जिसमें पांच लाख लोगों की मौत हुई थी. भोला साक्षात दैत्य बन गया था और उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान बुरी तरह तबाह हो गया था.
2013 में बंगाल की खाड़ी में फैलिन तूफान आया था. उसमें भी भारी तबाही मची थी. फोटो- रायटर
Most Terrifying Cyclone Bhola Cyclone: ओडिशा और आंध्र प्रदेश में अर्नब चक्रवात ने तबाही शुरू कर दी है. इस दौरान तेज हवाओं के साथ भारी बारिश हो रही है. तटीय इलाकों में 150 किमी की रफ्तार से हवाएं चल रही हैं. मौसम विभाग के मुताबिक बुधवार सुबह में यह तूफान बापटला तथा विशाखापत्तनम के बीच यनम के पास तट पार कर गया. तूफान से बचाव के लिए दोनों राज्यों में व्यापक तैयारियां की गई हैं. जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए हजारों की संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है. इस आपदा से समुद्र तट से लगे 20 से अधिक जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. खैर, अभी हम केवल अर्नब की बात नहीं कर रहे हैं. बंगाल की खाड़ी में पैदा यह दैत्य पूर्व के दैत्यों की तुलना में काफी छोटा है. आज हम 1970 में 12 नवंबर के दिन आई आपदा की बात कर रहे हैं. उस आपदा में भोला नामक चक्रवात ने तबाही मचाई थी और देखते ही देखते पश्चिम बंगाल और मौजूदा बांग्लादेश में करीब पांच लाख लोगों को निगल लिया. उस भोला तूफान को दुनिया के इतिहास में सबसे भयानक चक्रवात बताया जाता है.
नवंबर 1970 में बंगाल की खाड़ी में उठा चक्रवात तेजी से शक्तिशाली होता गया. 8 नवंबर के आसपास यह कम दबाव के क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ. गर्म समुद्री पानी से ऊर्जा मिलने के कारण इसकी ताकत बढ़ती गई. 12 नवंबर की रात इसने उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के तटीय इलाकों में दस्तक दी. उस वक्त हवा की रफ्तार करीब 240 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच गई थी. आज का बांग्लादेश तब पूर्वी पाकिस्तान था. चक्रवात ने मुख्य रूप से इसी इलाके में तबाही मचाई. इसकी भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें करीब तीन लाख से पांच लाख लोगों की मौत का अनुमान है. यह इतिहास के सबसे जानलेवा चक्रवातों में शामिल है.
भोला चक्रवात में ज्यादातर मौतें केवल तेज हवाओं से नहीं, बल्कि समुद्र के पानी में डूबने से हुईं. चक्रवात के साथ उठा तूफानी ज्वार तटीय इलाकों में दूर तक घुस गया. कई निचले क्षेत्रों में पानी की ऊंचाई कई मीटर तक पहुंच गई. रात का अंधेरा और पानी का तेज बहाव लोगों के लिए जानलेवा साबित हुआ. समुद्र के पास बसे गांवों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने का पर्याप्त समय नहीं मिला. कई गांव पूरी तरह तबाह हो गए. घरों के साथ फसलें और पशुधन भी बह गए. निचले द्वीपों और तटीय बस्तियों में ऊंचे स्थानों की कमी ने संकट और बढ़ा दिया. बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए.
बंगाल की खाड़ी से लगे इलाकों में चक्रवाती तूफान उनकी नियती है. फोटो- रायटर
भोला चक्रवात की तबाही ने मौसम की चेतावनी और आपदा प्रबंधन व्यवस्था की कमजोरियां उजागर कर दीं. उस समय उपग्रहों से तूफान पर नजर रखी जा रही थी. मौसम विभाग को खतरे के संकेत मिल रहे थे, लेकिन चेतावनी को प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचाने और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर ले जाने में सफलता नहीं मिली. तटीय इलाकों में संचार के साधन सीमित थे. सुरक्षित आश्रय स्थलों की भी कमी थी. बहुत से लोगों को खतरे की गंभीरता का अंदाजा भी नहीं था. नतीजा यह हुआ कि जब समुद्र का पानी बस्तियों में घुसा, तब बचने का रास्ता लगभग बंद हो चुका था.
भोला चक्रवात का असर प्राकृतिक आपदा तक सीमित नहीं रहा. इसने पाकिस्तान के राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया. 1970 में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों में पश्चिमी पाकिस्तान की सत्ता के खिलाफ पहले से असंतोष था. उन्हें राजनीतिक अधिकारों और आर्थिक संसाधनों के मामले में भेदभाव की शिकायत थी. चक्रवात के बाद राहत और बचाव में हुई देरी ने इस नाराजगी को और बढ़ा दिया. तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या खान की सरकार को आपदा से निपटने में सुस्ती के लिए आलोचना झेलनी पड़ी. दूसरी ओर, शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में अपना जनाधार मजबूत किया. दिसंबर 1970 के आम चुनाव में अवामी लीग ने शानदार जीत दर्ज की और पाकिस्तानी एसेंबली में बहुमत हासिल किया. लेकिन सत्ता हस्तांतरण को लेकर टकराव बढ़ गया. मार्च 1971 में पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई के बाद मुक्ति संग्राम शुरू हुआ. अंततः 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश स्वतंत्र देश बन गया.
बांग्लादेश की आजादी के पीछे भाषाई, आर्थिक और राजनीतिक संघर्षों का लंबा इतिहास था. भोला चक्रवात अकेले इसकी वजह नहीं था, लेकिन आपदा के बाद सरकार की प्रतिक्रिया ने पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष को निर्णायक रूप से बढ़ाने में भूमिका निभाई. भोला चक्रवात आज भी दुनिया के लिए एक सबक है. प्राकृतिक आपदाओं को रोकना संभव नहीं, लेकिन समय पर चेतावनी, सुरक्षित आश्रय और तेज राहत व्यवस्था से हजारों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं. भोला में प्रकृति का कहर तो था ही, कमजोर तैयारी और प्रशासनिक नाकामी ने भी मौतों का आंकड़ा बढ़ाया.
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