अंग्रेजी में किसी कम अक्ल इंसान को चिढ़ाने के लिए ‘बर्ड ब्रेन’ कहा जाता है. लोग मानते हैं कि पक्षियों के सिर में बहुत छोटा और कमजोर दिमाग होता है. विज्ञान की एक नई खोज ने इंसानों के इस घमंड को पूरी तरह तोड़ दिया है. जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ ट्यूबिंगन के वैज्ञानिकों ने पाया है कि कौए इंसानों और बंदरों से दोगुनी तेजी से फैसले लेते हैं. यह खोज मशहूर साइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है. रिसर्च के दौरान एक कैरियन कौए ने सेकंड के करीब चौथे हिस्से में यह तय कर लिया कि स्क्रीन पर बिंदु किस दिशा में घूम रहे हैं. इतना ही निर्णय लेने में किसी बंदर या इंसान को कौए से दोगुना समय लगता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह कोई अचानक होने वाला शारीरिक रिफ्लेक्स नहीं है. कौआ बाकायदा सबूत इकट्ठा करता है और सोच-समझकर सही नतीजे पर पहुंचता है.
क्या बर्ड ब्रेन कहना कौए की समझदारी का सबसे बड़ा अपमान है?
इंसान हमेशा से यह मानता आया है कि जटिल फैसले लेने के लिए स्तनधारियों जैसा बड़ा दिमाग जरूरी है. हमारे दिमाग में छह परतों वाला एक जटिल नियोकॉर्टेक्स होता है. इसी हिस्से की मदद से इंसान किसी भी समस्या का एनालिसिस करता है. कौए के पास स्तनधारियों जैसा यह लेयर्ड कॉर्टेक्स बिल्कुल नहीं होता है. इसके बावजूद कौआ इंसानों से कहीं ज्यादा तेजी से सही नतीजे पर पहुंच जाता है. ट्यूबिंगन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर फिलिप श्मिडबॉउर और प्रोफेसर एंड्रियास नीडर ने दो कैरियन कौओं को खास ट्रेनिंग दी. उन्होंने देखा कि कौए ने रफ्तार बढ़ाने के चक्कर में अपनी सटीकता से कोई समझौता नहीं किया. प्रोफेसर एंड्रियास नीडर ने कहा, ‘कौए का दिमाग तेज रफ्तार जिंदगी जीने के लिए ही कुदरत ने तैयार किया है’. इस स्टडी से साफ हो गया है कि सटीक और तेज फैसले लेने के लिए स्तनधारियों जैसे दिमाग की बनावट होना बिल्कुल जरूरी नहीं है.
स्क्रीन पर तैरते बिंदुओं को देखकर कौए ने कैसे दिए सटीक जवाब?
वैज्ञानिकों ने कौओं की बुद्धिमत्ता को जांचने के लिए एक विशेष विजुअल टेस्ट तैयार किया था. पिछले 20 सालों से बंदरों और इंसानों की दिमागी क्षमता मापने के लिए इसी टेस्ट का इस्तेमाल किया जाता रहा है. इस टेस्ट में कौओं को कंप्यूटर स्क्रीन पर तैरते हुए बिंदुओं के एक समूह को देखना था. स्क्रीन पर ज्यादातर बिंदु बिना किसी निश्चित दिशा के बेतरतीब घूम रहे थे. हालांकि उनमें से कुछ बिंदु एक साथ मिलकर किसी खास दिशा में आगे बढ़ रहे थे. किसी राउंड में तीन प्रतिशत बिंदु एक साथ घूमते थे तो किसी में 81 प्रतिशत बिंदु एक साथ चलते थे. कुछ राउंड ऐसे भी रखे गए थे जिनमें एक भी बिंदु किसी दिशा में नहीं जा रहा था. ऐसे राउंड में कौए को केवल अपना तुक्का लगाना होता था.
कठिन टेस्ट के दौरान कौओं ने किस तरह अपनी चोंच से फैसले लिए?
परीक्षण की शुरुआत में कौए को स्क्रीन के ठीक सामने एक इन्फ्रारेड बीम के भीतर अपना सिर स्थिर रखना होता था. जैसे ही कौआ अपना सिर वहां रखता था स्क्रीन के दोनों तरफ दो अलग-अलग टारगेट दिखाई देते थे. बीच में तैरते हुए बिंदु सामने आते ही कौआ स्क्रीन को ध्यान से देखता था. इसके बाद वह बीम से अपना सिर बाहर निकालता था और सही टारगेट पर अपनी चोंच से वार करता था. दोनों वैज्ञानिकों ने बिंदु दिखने से लेकर सिर हिलने तक के एक-एक मिलीसेकंड का रिकॉर्ड दर्ज किया. बंदरों और इंसानों ने जब यह टेस्ट दिया था तो वे केवल अपनी पुतलियां घुमाकर जवाब देते थे. कौए को अपना पूरा सिर हिलाना पड़ता था जिसमें शारीरिक रूप से ज्यादा मेहनत लगती है. इसके बावजूद कौए ने इंसानों और बंदरों से आधे समय में अपना जवाब दर्ज करा दिया.
बंदरों और इंसानों को कौए ने सोचने की रफ्तार में कैसे पछाड़ दिया?
वैज्ञानिकों ने परीक्षण के दौरान दर्जनों सत्र आयोजित किए. पहले कौए ने 55 सत्रों में भाग लिया जबकि दूसरे कौए ने 102 सत्रों में टेस्ट पूरा किया. हर एक सत्र में लगभग 280 राउंड का मुकाबला होता था. दोनों कौओं ने औसतन लगभग 235 मिलीसेकंड में अपना अंतिम फैसला ले लिया. जब स्क्रीन पर 81 प्रतिशत बिंदु एक दिशा में चल रहे थे तब कौए ने सिर्फ 220 मिलीसेकंड में जवाब दे दिया. इस दौरान उसकी सटीकता 99 प्रतिशत से भी ज्यादा दर्ज की गई. जब बिंदुओं की संख्या घटकर नौ प्रतिशत रह गई तब भी कौए ने 75 प्रतिशत मामलों में सही जवाब दिया. दूसरी तरफ पुराने अध्ययनों में बंदरों ने इसी टेस्ट को पूरा करने में 410 से 600 मिलीसेकंड का समय लिया था. वहीं इंसानों को यही फैसला करने में 450 से 820 मिलीसेकंड का वक्त लगा था. कौए की यह रफ्तार वैज्ञानिकों की उम्मीद से कहीं ज्यादा तेज थी.
गलत जवाब देने पर कौए ने सोचने में ज्यादा वक्त क्यों लगाया?
कौए के फैसले केवल आंख बंद करके किए गए तुक्के नहीं थे. इसका सबसे बड़ा सबूत यह था कि जिन राउंड्स में कौए से गलती हुई उनमें उसने फैसला लेने में ज्यादा समय लगाया. जब भी टास्क ज्यादा कठिन हुआ तो कौए के दिमाग ने जानकारी जुटाने में कुछ अतिरिक्त मिलीसेकंड खर्च किए. यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि कौआ अपने दिमाग में उपलब्ध सबूतों को तौलता है. वह जल्दबाजी में गलत चोंच मारने के बजाय सही नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करता है. वैज्ञानिकों ने बिंदुओं की संख्या और उनके चलने के तरीके में कई बदलाव किए. इन तमाम बदलावों के बावजूद कौए की सोचने की रफ्तार पर कोई असर नहीं पड़ा. इससे यह साबित हो गया कि यह फुर्ती टेस्ट की बनावट की वजह से नहीं थी बल्कि यह कौए के दिमाग की अपनी अंदरूनी ताकत थी.
न्यूरॉन्स की हलचल ने कौए के चोंच मारने से पहले क्या राज खोला?
कौए जब स्क्रीन पर फैसले ले रहे थे तब रिसर्च टीम ने उनके दिमाग के अग्रभाग के 248 न्यूरॉन्स की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया. पक्षी अपने दिमाग के इस हिस्से का इस्तेमाल लचीले और जटिल फैसले लेने के लिए करते हैं. इंसानों और बंदरों में इसी काम के लिए प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स का उपयोग होता है. रिकॉर्ड किए गए न्यूरॉन्स में से करीब 58 न्यूरॉन्स दिशा को लेकर बेहद संवेदनशील पाए गए. स्क्रीन पर बिंदु दिखने के मात्र 67 मिलीसेकंड बाद ही इन न्यूरॉन्स ने तेजी से सिग्नल देना शुरू कर दिया. यह हलचल कौए द्वारा अपना सिर हिलाने से करीब 170 मिलीसेकंड पहले ही शुरू हो चुकी थी. जैसे-जैसे गति की दिशा साफ होती गई न्यूरॉन्स की फायरिंग की रफ्तार भी उतनी ही तेज होती चली गई.
इंसानों के दिमाग से कितनी मिलती-जुलती है कौए की दिमागी प्रक्रिया?
वैज्ञानिकों को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि कौए के न्यूरॉन्स बिल्कुल इंसानों की तरह काम कर रहे थे. प्राइमेट्स पर पिछले 20 सालों के शोध से पता चलता है कि फैसला लेने से पहले दिमाग में सबूतों का एक दायरा बनता है. जब न्यूरॉन्स की सक्रियता उस निश्चित स्तर तक पहुंच जाती है तभी शरीर कोई एक्शन लेता है. कौए के दिमाग में भी सिर हिलाने से ठीक 50 मिलीसेकंड पहले न्यूरॉन्स बिल्कुल उसी तय सीमा तक पहुंचे. चाहे कौए ने तेज फैसला लिया हो या धीमा लिया हो अंतिम सीमा हमेशा एक जैसी ही रही. प्रोफेसर एंड्रियास नीडर ने बताया कि पक्षियों के दिमाग की बनावट इंसानों से बिल्कुल अलग होती है. इसके बावजूद दोनों में फैसला लेने का न्यूरल पैटर्न पूरी तरह एक जैसा दिखाई दिया.
जब स्क्रीन पर कोई दिशा नहीं थी तब कौए के दिमाग में क्या हुआ?
रिसर्च टीम ने उन राउंड्स का भी गहराई से अध्ययन किया जिनमें बिंदु किसी भी दिशा में नहीं घूम रहे थे. ऐसे मामलों में स्क्रीन पर कोई सबूत नहीं था और कौए को सिर्फ अनुमान लगाना था. वैज्ञानिकों ने देखा कि बिंदु दिखने के 96 मिलीसेकंड बाद ही न्यूरॉन्स ने उस दिशा के लिए सिग्नल देना शुरू कर दिया जिसे कौआ चुनने वाला था. अगर कौआ गलत दिशा चुनने जा रहा था तब भी उसके न्यूरॉन्स उसी गलत विकल्प की तरफ झुक रहे थे. इसका मतलब यह है कि जब बाहर कोई संकेत नहीं होता तब दिमाग के अंदरूनी पूर्वाग्रह फैसले को तय करते हैं. वैज्ञानिकों ने इन न्यूरॉन्स के डेटा से एक कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किया. इस प्रोग्राम ने केवल न्यूरॉन्स की हलचल देखकर 87 प्रतिशत सही मामलों में यह पहले ही बता दिया कि कौआ किस तरफ चोंच मारने वाला है.
बिना सेरेब्रल कॉर्टेक्स के कौए का दिमाग इतनी फुर्ती से कैसे काम करता है?
पक्षी और स्तनधारी जीव आज से करीब 36 करोड़ साल पहले एक-दूसरे से अलग हुए थे. यह वह दौर था जब धरती पर डायनासोर भी पैदा नहीं हुए थे. इतने लंबे समय के दौरान दोनों प्रजातियों ने दिमाग के विकास के लिए दो अलग-अलग रास्ते चुने. स्तनधारियों ने अपने दिमाग में परतों वाला नियोकॉर्टेक्स विकसित किया. वहीं पक्षियों ने परतों के बजाय न्यूरॉन्स के घने गुच्छे तैयार किए. कौवा परिवार के पक्षी हमेशा से अपनी असाधारण याददाश्त और योजना बनाने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं. कौए अपने साथियों की आवाज गिन सकते हैं और भविष्य के लिए औजार भी संभाल कर रखते हैं. कौए के दिमाग में न्यूरॉन्स एक-दूसरे के बहुत पास सटे होते हैं. दिमाग का आकार छोटा होने के कारण सिग्नल को एक छोर से दूसरे छोर तक जाने में बहुत कम दूरी तय करनी पड़ती है.
उड़ने की मजबूरी ने कौए की आंखों और दिमाग को कितना तेज बनाया?
कौए की तेज रफ्तार के पीछे उसकी आंखों की अनोखी बनावट का भी बड़ा हाथ है. कई छोटे पक्षी एक सेकंड में 145 बार टिमटिमाने वाली रोशनी को भी अलग-अलग पकड़ सकते हैं. जहां इंसानी आंखें इसे एक स्थिर रोशनी मान लेती हैं वहीं पक्षी उसकी हर हलचल को साफ देख लेते हैं. पक्षियों के दिमाग का देखने वाला मुख्य केंद्र किसी भी दृश्य के सामने आने के 5 मिलीसेकंड के भीतर सक्रिय हो जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह जबर्दस्त तेजी उड़ने की जरूरत से पैदा हुई है. हवा में तेज रफ्तार से उड़ते समय हर सेकंड रास्ता बदलना पड़ता है. शिकारी से खुद को बचाना और उड़ते हुए सटीक निशाना लगाकर शिकार पकड़ना भी बेहद जरूरी होता है. इन्हीं प्राकृतिक जरूरतों ने कौए के दिमाग को सुपरकंप्यूटर जैसी रफ्तार दे दी है.
कौए की बुद्धिमत्ता पर अब वैज्ञानिकों के सामने कौन से नए सवाल खड़े हैं?