Israel Election News: इजरायल में चुनाव के बाद सत्ता की लड़ाई केवल सबसे ज्यादा सीटें जीतने तक सीमित नहीं है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसद में बहुमत जुटाने की है. चुनाव के शुरुआती एग्जिट पोल में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिखा. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर कोई नेता सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरता है, तो क्या वह आसानी से सरकार बना पाएगा?
इजरायल की राजनीति में इसका जवाब इतना सीधा नहीं है. यहां सरकार बनाने के लिए संसद में कम से कम 61 सीटों का समर्थन चाहिए. अगर कोई भी गठबंधन इस आंकड़े तक नहीं पहुंचता, तो छोटे दल, अरब लीडरशिप वाली पार्टियां और दूसरे राजनीतिक सहयोगी सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. नतीजों के बाद कई हफ्तों तक गठबंधन की बातचीत चलने या फिर देश में दोबारा चुनाव की नौबत आने की संभावना भी बनी हुई है.
इजरायल में सरकार बनाने का गणित क्या है?
इजरायल में संसद को Knesset यानी नेसेट कहा जाता है. इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं. सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या पार्टियों के गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है. इजरायल में भारत या अमेरिका की तरह मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते. यहां मतदाता राजनीतिक पार्टियों को वोट देते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर संसद की सीटें बांटी जाती हैं. इसके बाद पार्टियां मिलकर सरकार बनाने के लिए गठबंधन तैयार करती हैं.
यही वजह है कि चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता का प्रधानमंत्री बनना तय नहीं होता. असली सवाल यह होता है कि वह संसद में बहुमत का समर्थन जुटा सकता है या नहीं. मिसाल के तौर पर, अगर किसी पार्टी को 30 सीटें मिलती हैं, तो उसे सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों के कम से कम 31 सांसदों का समर्थन जुटाना होगा. इस तरह छोटी पार्टियों की कुछ सीटें भी सरकार के गठन में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.
नेतन्याहू और गादी आइजेनकोट के बीच मुकाबला क्यों अहम है?
- बेंजामिन नेतन्याहू: इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल नेतन्याहू दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता हैं. उनका राजनीतिक गठबंधन दक्षिणपंथी, अति-दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी यहूदी पार्टियों के समर्थन पर निर्भर रहा है. उनकी चुनावी राजनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, ईरान के खिलाफ सख्त रुख और मिलिट्री उपलब्धियां अहम मुद्दे रहे हैं.
- गादी आइजेनकोट: इजरायली सेना के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ गादी आइजेनकोट इस चुनाव में नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं. उनकी पार्टी याशार है. वह सुरक्षा के मामले में सख्त रुख रखने के साथ सरकार की जवाबदेही, सैन्य सेवा में समानता और सरकारी संस्थानों की मजबूती जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं. दोनों नेताओं के बीच मुकाबला केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी का नहीं है. यह नेतन्याहू के लंबे राजनीतिक नेतृत्व 7 अक्टूबर 2023 के हमलों के बाद सुरक्षा संबंधी विफलताओं की जवाबदेही और इजरायल के भविष्य की दिशा से भी जुड़ा है.
एग्जिट पोल में क्या संकेत मिले?
27 अक्टूबर 2026 को हुए चुनाव के बाद सामने आए एग्जिट पोल में नेतन्याहू और आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच कड़ा मुकाबला दिखा. शुरुआती अनुमानों में किसी भी खेमे को 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. अरब नेतृत्व वाली पार्टियां इसमें निर्णायक रोल अदा कर सकती हैं. इस अनुमान के मुताबिक, दोनों प्रमुख खेमे बहुमत के आंकड़े से पीछे रह सकते हैं. ऐसी स्थिति में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों का समर्थन निर्णायक हो सकता है. हालांकि, इन पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने के रास्ते में राजनीतिक मतभेद भी बड़ी बाधा हैं.
छोटी पार्टियां कैसे तय कर सकती हैं प्रधानमंत्री का नाम?
इजरायल की गठबंधन राजनीति में छोटी पार्टियों का महत्व उनकी सीटों की संख्या से कहीं ज्यादा हो सकता है. यदि किसी बड़े गठबंधन को बहुमत के लिए कुछ सीटों की जरूरत है, तो उन सीटों वाली पार्टी सरकार बनाने और नीतियां तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है. नेतन्याहू के लिए दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी यहूदी दल लंबे समय से महत्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं. दूसरी तरफ आइजेनकोट को विपक्षी दलों के बीच समर्थन जुटाने के साथ यह भी तय करना होगा कि वे किन पार्टियों के साथ मिलकर सरकार चला सकते हैं.
अरब नेतृत्व वाली पार्टियां भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. एग्जिट पोल में उन्हें अपेक्षा से अधिक सीटें मिलने के संकेत मिले. लेकिन इजरायल की प्रमुख यहूदी पार्टियों के बीच अरब दलों के समर्थन पर निर्भर सरकार बनाने को लेकर राजनीतिक संकोच है. यही स्थिति बहुमत के गणित को और जटिल बना देती है.
चुनाव जीतने के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया क्या होगी?
इजरायल में चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार गठन की एक संवैधानिक प्रक्रिया होती है. इसमें राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, हालांकि देश की वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और सरकार के पास होती है. सबसे पहले मतों की गिनती पूरी होने के बाद अंतिम नतीजे घोषित किए जाते हैं. एग्जिट पोल केवल शुरुआती संकेत देते हैं. इसके बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से चर्चा करते हैं कि वे किस नेता को सरकार बनाने का मौका देने के पक्ष में हैं. फिर गठबंधन की बातचीत का मौका आता है.
राष्ट्रपति उस उम्मीदवार को सरकार बनाने का मौका देते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे अच्छी संभावना हो. आम तौर पर उसे 28 दिन मिलते हैं. जरूरत पड़ने पर 14 दिन का एक्स्ट्रा समय दिया जा सकता है. इसके बाद बारी आती है संसद में विश्वास मत हासिल करने की. गठबंधन तैयार होने के बाद सरकार को नेसेट में विश्वास हासिल करना होता है. इसके बाद ही नई सरकार कामकाज संभालती है.
अगर कोई भी 61 सीटें नहीं जुटा पाया तो क्या होगा?
अगर नेतन्याहू और आइजेनकोट में से कोई भी सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाता, तो इजरायल में राजनीतिक गतिरोध लंबा खिंच सकता है. ऐसी स्थिति में तीन प्रमुख रास्ते सामने आ सकते हैं. वो क्या-क्या हैं, हर एक पर गौर कर लेते हैं.
- अल्पमत सरकार: कोई नेता 61 सांसदों को अपने औपचारिक गठबंधन में शामिल किए बिना भी सरकार बनाने की कोशिश कर सकता है, बशर्ते उसे नेसेट में विश्वास मत हासिल करने के लिए पर्याप्त समर्थन मिले. दूसरे दल सरकार में शामिल हुए बिना उसका समर्थन कर सकती हैं या मतदान से दूर रह सकती हैं.
- गठबंधन या सत्ता शेयर करने का समझौता: विरोधी राजनीतिक खेमे देश में स्थिर सरकार बनाने के लिए आपसी मतभेदों के बावजूद समझौता कर सकते हैं. हालांकि, नेतन्याहू और आइजेनकोट के बीच ऐसा समझौता आसान नहीं होगा.
- दोबारा चुनाव: अगर कोई भी नेता सरकार बनाने में नाकाम रहता है और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत गतिरोध दूर नहीं होता, तो नए चुनाव कराने की नौबत आ सकती है. तब तक मौजूदा सरकार कार्यवाहक सरकार के तौर पर काम करती रहेगी.
इजरायल में पहले भी ऐसा हो चुका है. अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच देश में पांच बार चुनाव हुए थे. बार-बार होने वाले चुनावों की प्रमुख वजह राजनीतिक गठबंधनों का बहुमत जुटाने में नाकाम रहना था.
इस चुनाव का इजरायल की नीतियों पर क्या असर पड़ सकता है?
सरकार किसकी बनेगी, इससे इजरायल की घरेलू और विदेश नीति दोनों प्रभावित हो सकती हैं. चुनाव में कई बड़े मुद्दे चर्चा में रहे.
- 7 अक्टूबर के हमलों की जवाबदेही: 2023 में हमास के हमले के बाद इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे. विपक्षी नेता सुरक्षा संबंधी विफलताओं की स्वतंत्र जांच की मांग करते रहे हैं.
- अति-रूढ़िवादी समुदाय की सैन्य सेवा: इजरायल में सैन्य सेवा से अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों को मिलने वाली छूट लंबे समय से विवाद का विषय है. सेना पर बढ़ते दबाव के बीच यह मुद्दा चुनाव में अहम रहा.
- जूडिशरी की स्वतंत्रता: नेतन्याहू सरकार की न्यायिक बदलावों से जुड़ी योजनाओं का इजरायल में व्यापक विरोध हुआ था. विपक्ष न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही पर जोर देता रहा है.
- ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा: नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख और सैन्य कार्रवाई को अपनी राजनीति का अहम हिस्सा बनाया है. आइजेनकोट भी सुरक्षा के मामले में सख्त माने जाते हैं, लेकिन सरकार की रणनीति और जवाबदेही को लेकर उनका नजरिया अलग हो सकता है.
इजरायल में असली जीत बहुमत जुटाने की है
इजरायल के चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सबसे ज्यादा सीटें जीतना और सरकार बना लेना दो अलग-अलग बातें हैं. प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए किसी नेता को संसद में बहुमत का समर्थन जुटाना पड़ता है. इसी कारण नेतन्याहू और आइजेनकोट के बीच मुकाबले का अंतिम फैसला केवल चुनावी आंकड़ों से नहीं, बल्कि चुनाव के बाद होने वाली गठबंधन वाली डील से भी तय होगा.
अगर कोई भी खेमा 61 सीटों तक नहीं पहुंचता, तो छोटी पार्टियों और अरब नेतृत्व वाले दलों की भूमिका बढ़ सकती है. वहीं गठबंधन की बातचीत विफल होने पर अल्पमत सरकार, सत्ता साझा करने का समझौता या नए चुनाव जैसे ऑप्शन सामने आ सकते हैं. फिलहाल एग्जिट पोल के आधार पर किसी को विजेता घोषित करना जल्दबाजी होगी.