जहा मुकुट नहीं, पगड़ी में दर्शन देते हैं संकटमोचन! 1554 में प्रकट हुई इस मूर्ति की महिमा और फसल चढ़ाने की अनोखी परंपरा

जहा मुकुट नहीं, पगड़ी में दर्शन देते हैं संकटमोचन! 1554 में प्रकट हुई इस मूर्ति की महिमा और फसल चढ़ाने की अनोखी परंपरा


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जहा मुकुट नहीं, पगड़ी में दर्शन देते हैं संकटमोचन! 1554 में प्रकट हुई मूर्ति

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Veer Hanuman Temple : राजस्थान के चौमूं क्षेत्र में स्थित वीर हनुमान जी का 700 साल पुराना मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं और स्वरूप के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है. सामान्य मूर्तियों से अलग यहां हनुमान जी मुकुट की बजाय पगड़ी पहने और अद्भुत मुद्रा में विराजमान हैं. उत्तराखंड के संत मगनदास जी की तपस्या और स्वप्न के आधार पर प्रकट हुई इस पावन मूर्ति का इतिहास 1554 से जुड़ा है. मंदिर का भव्य दर्पण मंडप, अखंड दीप और किसानों द्वारा अपनी फसल का पहला हिस्सा समर्पित करने की अनूठी परंपरा यहां आने वाले हर श्रद्धालु को अपनी ओर आकर्षित करती है.

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वीर हनुमान मंदिर जयपुर.

जयपुर के पास चोमूं में स्थित सामोद वाले बाला जी पूरे देश में खास मंदिर है. यह मंदिर 700 साल पुराना है. यहां वीर हनुमान पगड़ी में है. इसलिए इन्हें पगड़ी वाले वीर हनुमान मंदिर कहा जाता है. अरावली की पहाड़ियों की गोद में बसा यह एक अत्यंत पवित्र और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है. पहाड़ी की चोटी पर स्थित होने के कारण यहां का प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है. मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों के साथ-साथ रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है. इस कारण बड़े-बुजुर्ग भी हनुमान जी के दर्शन करने आसानी से पहुंच जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि यहां सच्चे मन से आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. मंगलवार और शनिवार को यहां विशेष मेलों जैसा माहौल रहता है और दूर-दूर से भक्त बजरंगबली के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. शांत वातावरण, ऊंचे पहाड़ों की श्रृंखला और मंदिर की दिव्यता यहां आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को एक अलौकिक शांति का अनुभव कराती है.

पगड़ी वाले हनुमान और विलक्षण स्वरूप का रहस्य

आम तौर पर आपने देश के अन्य मंदिरों में हनुमान जी की मूर्तियां मुकुट धारी या सादगी से युक्त देखी हैं, लेकिन चौमूं के इस मंदिर में हनुमान जी सिंदूर वर्ण, नेत्रत्रय और सिर पर पगड़ी सुशोभित रूप में दर्शन देते हैं. विद्वान इसे ब्राह्मणोत्तम लक्षणों से जोड़कर देखते हैं, जो राजस्थान की लोक-संस्कृति के अनुरूप है. इसके अलावा, सामान्य मूर्तियों के विपरीत यहां हनुमान जी के जबड़े भीतर की ओर होते हैं. मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करते ही भक्तों को एक अलौकिक ऊर्जा और शांति का अहसास होता है, जो इसे देश के अन्य हनुमान मंदिरों से बिल्कुल अलग बनाता है.

दर्पण मंडप का आकर्षण और संतों की पावन स्मृति

इस मंदिर की वास्तुकला में दर्पण मंडप इसका सबसे प्रमुख और मुख्य आकर्षण है. सुंदर नक्काशी और शीशों से सजे इस मंडप में रामायण काल की प्रमुख घटनाओं को दृश्यात्मक रूप में उकेरा गया है, जो यहां आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं का मन मोह लेता है. इसके साथ ही, मंदिर के प्रांगण में इस धाम को विकास की ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले 10 दिवंगत महंतों के चरण-चिन्ह संगमरमर पर सजीले रूप में अंकित हैं. मुख्य मंदिर के पास ही स्थित श्री सीताराम मंदिर और प्रज्ज्वलित अखंड दीप इस पवित्र स्थल की दिव्यता को और अधिक बढ़ाते हैं.

किसानों की अनोखी परंपरा और वार्षिक मेला

चौमूं के वीर हनुमान जी यहां की स्थानीय ग्रामीण जनता और किसानों के विशेष आराध्य देवता हैं. यहां की एक बेहद अनूठी परंपरा है कि किसान अपनी फसल की कटाई शुरू करने से पहले और फसल घर आने पर उसका एक अंश (गेहूं, बाजरा, ज्वार आदि) पूरी श्रद्धा के साथ अपने आराध्य वीर हनुमान को समर्पित करते हैं. छोटी दीपावली को यहां हनुमान जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. भाद्रपद शुक्ल पक्ष में राखी के 15 दिन बाद यहां विशाल मेला लगता है. देश के कोने-कोने से आने वाले भक्त यहां आकर अपनी मनौतियां पूरी करते हैं और भगवान से कार्य-सिद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.



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