MLC Election Result 2026, MLA vs MLC: यूपी में 2.66 लाख, बिहार में 1.60 लाख से ज्यादा सैलरी, एमएलसी को क्या-क्या मिलता है?

MLC Election Result 2026, MLA vs MLC: यूपी में 2.66 लाख, बिहार में 1.60 लाख से ज्यादा सैलरी, एमएलसी को क्या-क्या मिलता है?


MLC Election Result 2026: उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में आज मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को विधान परिषद की 28 सीटों के लिए वोटों की गिनती हो रही है. सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू हो चुकी है. इन सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था. यूपी की 11, बिहार की 8, महाराष्ट्र की 5 और कर्नाटक की 4 सीटों के नतीजों पर सबकी नजर है. खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार की कुल 19 सीटों पर मुकाबला चर्चा में है. बिहार में 150 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. इनमें 90 उम्मीदवार स्नातक और 60 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से हैं लेकिन इन चुनावों के बीच एक सवाल लोगों के मन में है कि आखिर MLC कौन होता है? क्या उसे विधायक जितनी सैलरी मिलती है? चुनाव जीतने के बाद सरकारी आवास, गाड़ी, यात्रा और मेडिकल जैसी कौन-कौन सी सुविधाएं मिलती हैं? आइए जानते हैं कि MLC कैसे चुने जाते हैं और अलग-अलग राज्यों में उन्हें कितनी सैलरी मिलती है.

MLC कौन होता है और विधायक से कैसे अलग है?

MLC का पूरा नाम मेंबर ऑफ लेजिसलेटिव काउंसिल (Member of Legislative Council) यानी विधान परिषद सदस्य है. हिंदी में इसे विधान पार्षद भी कहा जाता है.भारत में जिन राज्यों में दो सदनों वाली विधायिका है वहां विधानसभा निचला सदन और विधान परिषद ऊपरी सदन होता है.विधानसभा के सदस्य को MLA यानी विधायक कहा जाता है जबकि विधान परिषद के सदस्य को MLC कहा जाता है.दोनों राज्य की कानून बनाने की प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं हालांकि दोनों के चुनाव, कार्यकाल और अधिकारों में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं.विधायक सीधे जनता के वोट से चुने जाते हैं जबकि विधान परिषद के अधिकांश सदस्यों का चुनाव विशेष निर्वाचन मंडलों के जरिए होता है. कुछ सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत भी करते हैं.

देश के किन छह राज्यों में है विधान परिषद?

भारत के सभी राज्यों में विधानसभा होती है लेकिन विधान परिषद केवल छह राज्यों में है.इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं.इन राज्यों में विधानसभा के साथ विधान परिषद भी काम करती है.बाकी राज्यों में सामान्य तौर पर एक सदन वाली विधायिका है. विधान परिषद का काम विधेयकों पर चर्चा करना, उनकी समीक्षा करना और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना भी है.

MLA और MLC बनने के लिए कितनी उम्र चाहिए?

विधानसभा और विधान परिषद का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम उम्र अलग-अलग निर्धारित की गई है. विधायक बनने के लिए उम्मीदवार की उम्र कम से कम 25 साल होनी चाहिए.वहीं विधान परिषद सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार की उम्र कम से कम 30 साल होनी चाहिए.विधानसभा चुनाव में वोट देने के लिए भारतीय नागरिक की उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए और उसका नाम संबंधित मतदाता सूची में दर्ज होना चाहिए लेकिन विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में वोट देने के लिए अलग पात्रता शर्तें निर्धारित हैं.

MLC का कार्यकाल छह साल 

विधानसभा और विधान परिषद के बीच एक बड़ा अंतर उनके कार्यकाल का है.विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल होता है. इसे निर्धारित समय से पहले भी भंग किया जा सकता है वहीं विधान परिषद स्थायी सदन है. इसे विधानसभा की तरह भंग नहीं किया जाता.विधान परिषद के एक सदस्य का कार्यकाल छह साल होता है.हर दो साल में इसके लगभग एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं और उनकी जगह नए सदस्यों का चुनाव होता है.यही वजह है कि विधान परिषद की सभी सीटों पर एक साथ चुनाव नहीं होते.

बिहार विधान परिषद में कुल 75 सीटें, कैसे चुने जाते हैं सदस्य?

बिहार विधान परिषद में कुल 75 सीटें हैं.संविधान के अनुच्छेद 171 के तहत विधान परिषद के गठन और सदस्यों के चुनाव की व्यवस्था की गई है.बिहार में विधान परिषद के 27 सदस्यों का चुनाव विधानसभा के निर्वाचित विधायक करते हैं.इसके अलावा स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्रों से 24 सदस्य चुने जाते हैं.शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से छह और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से छह सदस्य चुने जाते हैं.बाकी 12 सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं.इस तरह कुल 75 सदस्य विधान परिषद का हिस्सा बनते हैं.

विधायक कोटे से कैसे चुने जाते हैं MLC?

बिहार विधान परिषद की 27 सीटें विधानसभा कोटे की हैं.इन सीटों पर आम मतदाता सीधे वोट नहीं डालते. इनका चुनाव विधानसभा के निर्वाचित विधायक करते हैं.दिए गए चुनावी विवरण के अनुसार इस कोटे से उम्मीदवार बनने के लिए कम से कम 10 विधायकों का प्रस्तावक होना जरूरी बताया गया है.विधानसभा में राजनीतिक दलों की संख्या और उनके विधायकों का समर्थन ऐसे चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

स्थानीय निकाय कोटे से कौन देता है वोट?

बिहार विधान परिषद की 24 सीटें स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्रों से जुड़ी हैं.इन सीटों पर संबंधित निर्वाचन मंडल में शामिल स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि मतदान करते हैं.इनमें पंचायत और नगर निकायों के पात्र प्रतिनिधि शामिल होते हैं.संबंधित नियमों के अनुसार वार्ड सदस्य, मुखिया, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य और नगर निकायों के प्रतिनिधि मतदान में भाग ले सकते हैं.इस श्रेणी से सामान्य नागरिक भी निर्धारित पात्रता पूरी करने पर चुनाव लड़ सकता है. चुनाव लड़ने के लिए स्थानीय निकाय का सदस्य होना हर स्थिति में अनिवार्य नहीं है.

शिक्षक कोटे से MLC कैसे चुने जाते हैं?

बिहार विधान परिषद में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की छह सीटें हैं.इन सीटों पर मतदान करने के लिए शिक्षक का संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की शिक्षक मतदाता सूची में नाम होना जरूरी है.पात्रता के अनुसार शिक्षक को कम से कम तीन साल तक माध्यमिक स्तर या उससे ऊपर के निर्धारित शिक्षण संस्थान में अध्यापन का अनुभव होना चाहिए.इसमें हाईस्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर के पात्र शिक्षक शामिल हो सकते हैं.शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए निर्धारित फॉर्म-19 का इस्तेमाल किया जाता है.इन सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार को स्वयं शिक्षक होना अनिवार्य नहीं है. उम्मीदवार को विधान परिषद चुनाव की निर्धारित पात्रता पूरी करनी होती है.

ग्रेजुएट कोटे से MLC बनने और वोट देने के क्या नियम हैं?

बिहार विधान परिषद में स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की छह सीटें हैं.इन सीटों पर वोट देने के लिए संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का पात्र मतदाता होना जरूरी है.मतदाता ने कम से कम तीन साल पहले किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की हो या निर्धारित समकक्ष योग्यता रखता हो.इसके अलावा उसका नाम स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज होना चाहिए.इसके लिए फॉर्म-18 के जरिए पंजीकरण कराया जाता है.यहां एक महत्वपूर्ण बात है कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में वोट देने के लिए ग्रेजुएशन की पात्रता जरूरी है लेकिन इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार का ग्रेजुएट होना अनिवार्य नहीं है.उम्मीदवार को संविधान और चुनाव कानून में निर्धारित अन्य पात्रता शर्तें पूरी करनी होती हैं.

राज्यपाल किन 12 सदस्यों को मनोनीत करते हैं?

बिहार विधान परिषद में 12 सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं.इन सीटों के लिए मतदान नहीं होता.
संविधान के अनुसार साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों को मनोनीत किया जा सकता है.इस व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों में अनुभव रखने वाले लोगों को विधायी कामकाज में भागीदारी का अवसर देना है.

MLC चुनाव में पहली, दूसरी और तीसरी पसंद का क्या मतलब है?

विधान परिषद के चुनाव में आनुपातिक प्रतिनिधित्व और सिंगल ट्रांसफरेबल वोट (Single Transferable Vote) प्रणाली का इस्तेमाल होता है.इस व्यवस्था में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के अनुसार पहली, दूसरी और तीसरी वरीयता दे सकते हैं.मतदाता जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा पसंद करता है उसके सामने पहली वरीयता दर्ज करता है.इसके बाद दूसरे और तीसरे पसंदीदा उम्मीदवार को अगली वरीयता दी जा सकती है.मतगणना के दौरान निर्धारित कोटे और वरीयता के आधार पर वोटों की गणना की जाती है.यदि किसी उम्मीदवार को जरूरी वोट नहीं मिलते तो नियमों के अनुसार सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को बाहर करके उसके मतपत्रों की अगली उपलब्ध वरीयता दूसरे उम्मीदवारों को ट्रांसफर की जा सकती है.यदि किसी उम्मीदवार को निर्धारित कोटे से ज्यादा वोट मिलते हैं तो लागू नियमों के अनुसार उसके अतिरिक्त वोट भी आगे ट्रांसफर किए जा सकते हैं.

100 वोट पड़ें तो कितने वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतेगा?

सिंगल ट्रांसफरेबल वोट प्रणाली को एक उदाहरण से समझ सकते हैं.मान लीजिए किसी निर्वाचन क्षेत्र की एक सीट के लिए कुल 100 वैध वोट पड़े हैं.ऐसी स्थिति में जीत के लिए सामान्य तौर पर 51 वोट का कोटा होगा.यदि चार सीटों के लिए एक साथ 100 वैध वोट पड़ते हैं तो ड्रूप कोटा के अनुसार जीत के लिए 21 वोट की जरूरत होगी हालांकि आज जिन स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव हो रहा है वे अलग-अलग एक-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र हैं.इसलिए चार अलग-अलग सीटों के कुल 100 वोटों को जोड़कर 21 वोट का एक साझा जीत का कोटा नहीं बनाया जा सकता.वास्तविक मतगणना में संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के वैध मतों और चुनाव नियमों के आधार पर जीत का कोटा निर्धारित किया जाता है.

क्या MLA और MLC को बराबर सैलरी मिलती है?

विधान परिषद सदस्य और विधायक दोनों राज्य विधायिका के सदस्य होते हैं.संविधान के अनुच्छेद 195 के अनुसार राज्य विधानमंडल अपने सदस्यों के वेतन और भत्ते कानून के जरिए तय कर सकता है. इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में MLC की सैलरी और सुविधाएं अलग हो सकती हैं.किसी राज्य में मिलने वाला वेतन दूसरे राज्य में भी उतना ही होगा यह जरूरी नहीं है.वेतन के अलावा निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, यात्रा भत्ता, दैनिक भत्ता, चिकित्सा सुविधा और अन्य सुविधाएं भी राज्य के नियमों के अनुसार मिलती हैं.

यूपी में MLC को कितनी सैलरी मिलती है?

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2025 में विधायकों और विधान परिषद सदस्यों के वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी की गई थी.संशोधित व्यवस्था के अनुसार सामान्य सदस्य का मूल वेतन 35,000 रुपये प्रति माह है.इसके अलावा निर्वाचन क्षेत्र भत्ते के रूप में 75,000 रुपये प्रति माह का प्रावधान है यानी केवल मूल वेतन और निर्वाचन क्षेत्र भत्ते को जोड़ने पर 1.10 लाख रुपये होते हैं.इसके अलावा सचिवीय सहायता, चिकित्सा, टेलीफोन और अन्य मदों में निर्धारित सुविधाएं मिलती हैं.यूपी में वेतन और विभिन्न भत्तों को मिलाकर MLC का मासिक पैकेज लगभग 2.66 लाख रुपये तक मिलता है हालांकि इस राशि में अलग-अलग उद्देश्य से दिए जाने वाले भत्ते शामिल हैं. इसे पूरी तरह व्यक्तिगत खर्च के लिए मिलने वाली सैलरी नहीं समझना चाहिए.

बिहार में MLC को हर महीने कितने रुपये मिलते हैं?

बिहार में विधायक और विधान परिषद सदस्यों के वेतन तथा भत्तों के लिए अलग नियमावली है.उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार बिहार में MLC का मूल वेतन 50,000 रुपये प्रति माह है.इसके अलावा निर्वाचन क्षेत्र भत्ते के रूप में 55,000 रुपये, निजी सहायक के लिए 40,000 रुपये और कार्यालय तथा स्टेशनरी से जुड़े खर्चों के लिए 15,000 रुपये की राशि बताई गई है.इन मदों को जोड़ने पर 1.60 लाख रुपये प्रति माह होते हैं.कुछ रिपोर्टों में वेतन और भत्तों को मिलाकर मासिक राशि लगभग 1.60 लाख से 1.70 लाख रुपये बताई गई है हालांकि निजी सहायक और कार्यालय खर्च जैसे भत्ते निर्धारित कार्यों के लिए होते हैं. इन्हें केवल व्यक्तिगत वेतन नहीं माना जाना चाहिए.बिहार में वेतन, भत्तों और पेंशन से संबंधित व्यवस्था बिहार विधानमंडल सदस्य वेतन, भत्ता एवं पेंशन नियमावली के तहत संचालित होती है.

कर्नाटक में MLC की बेसिक सैलरी 80 हजार रुपये

कर्नाटक में वर्ष 2025 में विधायकों और विधान परिषद सदस्यों के वेतन में बड़ी बढ़ोतरी की गई थी.इस बदलाव के तहत सामान्य MLA और MLC का मूल मासिक वेतन 40,000 रुपये से बढ़ाकर 80,000 रुपये किया गया यानी मूल वेतन में 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.इसके अलावा निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, यात्रा, टेलीफोन, चिकित्सा और अन्य सुविधाओं की राशि में भी संशोधन किया गया.2025 के संशोधन से संबंधित विवरण के अनुसार निर्वाचन क्षेत्र भत्ते को 60,000 रुपये से बढ़ाकर 1.10 लाख रुपये करने और निर्वाचन क्षेत्र यात्रा भत्ते को 60,000 रुपये से बढ़ाकर 80,000 रुपये करने का प्रावधान किया गया.इसके अलावा रेल और हवाई यात्रा के लिए सालाना सीमा 2.50 लाख रुपये से बढ़ाकर 3.50 लाख रुपये की गई.पूर्व विधायकों और विधान परिषद सदस्यों की सामान्य पेंशन भी 50,000 रुपये से बढ़ाकर 75,000 रुपये प्रति माह की गई.

महाराष्ट्र में MLC की सैलरी कैसे तय होती है?

महाराष्ट्र में विधान परिषद सदस्यों के वेतन की व्यवस्था दूसरे राज्यों से कुछ अलग है.महाराष्ट्र विधानमंडल सदस्य वेतन एवं भत्ता अधिनियम 1956 के अनुसार सामान्य सदस्यों का वेतन राज्य सरकार के प्रधान सचिव के न्यूनतम मूल वेतन और लागू महंगाई भत्ते से जुड़ा है.इसका मतलब है कि यहां वेतन की गणना एक निश्चित पुराने आंकड़े के बजाय संबंधित वेतनमान और महंगाई भत्ते के आधार पर होती है.इसके अलावा सदस्यों को निर्धारित नियमों के अनुसार दैनिक भत्ता, यात्रा भत्ता और अन्य सुविधाएं मिलती हैं.विधान परिषद के सदस्यों के लिए चिकित्सा, आवास और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था भी संबंधित कानूनों और नियमों के अनुसार होती है.

MLC को कौन-कौन सी सुविधाएं मिलती हैं?

विधान परिषद के सदस्यों को केवल मासिक वेतन ही नहीं मिलता, बल्कि राज्य के नियमों के अनुसार कई अन्य सुविधाएं भी दी जाती हैं.इनमें सरकारी आवास या आवास से संबंधित सुविधा, यात्रा भत्ता, चिकित्सा सुविधा, टेलीफोन, कार्यालय संबंधी खर्च और कर्मचारियों की सहायता जैसी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं.कुछ राज्यों में रेल और हवाई यात्रा के लिए निर्धारित राशि या यात्रा कूपन की व्यवस्था होती है.विधान परिषद की बैठकों और समितियों के कामकाज में भाग लेने पर नियमों के अनुसार दैनिक भत्ता भी मिल सकता है हालांकि सभी राज्यों में इन सुविधाओं की राशि और शर्तें एक जैसी नहीं हैं.

क्या MLC को विकास कार्यों के लिए भी पैसा मिलता है?

कुछ राज्यों में विधान परिषद सदस्यों को अपने निर्वाचन क्षेत्र या निर्धारित क्षेत्र में विकास कार्यों की सिफारिश करने के लिए विकास निधि से जुड़ी व्यवस्था का लाभ मिलता है.उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में विधानमंडल सदस्यों के लिए सालाना पांच करोड़ रुपये की विधायक निधि की व्यवस्था बताई गई है लेकिन यह राशि MLC की व्यक्तिगत आय या वेतन का हिस्सा नहीं होती.इसका इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुसार सार्वजनिक विकास कार्यों के लिए किया जाता है.

क्या MLC भी कानून बना सकते हैं?

विधान परिषद सदस्य राज्य की कानून बनाने की प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं.वे सदन में विधेयकों पर चर्चा कर सकते हैं, सुझाव दे सकते हैं और सामान्य विधेयकों के संबंध में अपनी भूमिका निभा सकते हैं हालांकि विधानसभा और विधान परिषद की विधायी शक्तियां पूरी तरह बराबर नहीं हैं.विशेष रूप से वित्तीय मामलों और सरकार के बहुमत से जुड़े सवालों में विधानसभा की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है.

क्या MLC बजट और धन विधेयक रोक सकते हैं?

राज्य का धन विधेयक केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है. विधान परिषद में धन विधेयक पेश नहीं किया जा सकता.विधानसभा से पारित धन विधेयक विधान परिषद को भेजा जाता है जहां परिषद अधिकतम 14 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशें दे सकती है. विधानसभा इन सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है.यदि विधान परिषद 14 दिनों के भीतर धन विधेयक वापस नहीं करती तो वह संविधान के अनुसार दोनों सदनों से पारित माना जाता है इसलिए धन विधेयक के मामले में विधानसभा की शक्ति ज्यादा है.

क्या MLC मुख्यमंत्री की सरकार गिरा सकते हैं?

विधान परिषद सदस्य सरकार की नीतियों पर सवाल उठा सकते हैं और सदन में चर्चा कर सकते हैं लेकिन राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है इसलिए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का निर्णायक अधिकार विधानसभा के पास होता है.यदि विधानसभा में सरकार विश्वास खो देती है तो मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ सकता है.विधान परिषद अपने स्तर पर अविश्वास प्रस्ताव पारित करके सरकार को नहीं गिरा सकती.

क्या MLC राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनाव में वोट देते हैं?

विधान परिषद और विधानसभा सदस्यों के अधिकारों में एक महत्वपूर्ण अंतर राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनाव से भी जुड़ा है.राष्ट्रपति चुनाव में राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं.विधान परिषद के सदस्यों को राष्ट्रपति चुनाव में मतदान करने का अधिकार नहीं होता.इसी तरह राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव संबंधित राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य करते हैं इसलिए विधान परिषद सदस्य राज्यसभा चुनाव में भी मतदान नहीं करते.

यूपी-बिहार समेत चार राज्यों की 28 सीटों पर मतगणना

देश के चार राज्यों में विधान परिषद चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं. चुनाव आयोग के घोषित कार्यक्रम के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुल 28 सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था.इन सीटों के लिए आज मंगलवार 27 अक्टूबर को मतगणना हो रही है.उत्तर प्रदेश की 11 सीटों पर चुनाव हुआ है. इनमें पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं.बिहार की आठ सीटों में चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र हैं.महाराष्ट्र की पांच सीटों में तीन स्नातक और दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं.वहीं कर्नाटक की चार सीटों में दो स्नातक और दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र हैं.इन सभी सीटों पर निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने के कारण चुनाव कराए गए हैं. चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार पूरी चुनाव प्रक्रिया 31 अक्टूबर तक पूरी की जानी है.



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