Government Jobs : अब सरकारी जॉब खा गया AI, खुद सरकार ने 25000 नौकरियों पर चलाई कैंची, 2035 तक और बुरा हाल

Government Jobs : अब सरकारी जॉब खा गया AI, खुद सरकार ने 25000 नौकरियों पर चलाई कैंची, 2035 तक और बुरा हाल


सरकारी महकमों में नौकरी करना और उम्र भर सिक्योर सैलरी पाना लाखों-करोड़ों युवाओं का सपना रहा है. लेकिन अब सरकारी नौकरियां भी सुरक्षित नबीं रह गई हैं. हाल ही में 25000 सरकारी जॉब्स को खत्म किए जाने की खबर ने पूरा नीदरलैंड्स हिला दिया है. यहां की सरकार ने ऐलान कर दिया है कि आने वाले कुछ सालों में हजारों-लाखों सरकारी कर्मचारियों की छुट्टी होने वाली है. अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सरकार को ये ऐसा फैसला क्यों लेना पड़ा और आने वाले दशकों में सरकारी कामकाज की तस्वीर कैसी होने वाली है?

नीदरलैंड्स सरकार का बड़ा फैसला: छंटनी की पूरी प्लानिंग

ये मामला नीदरलैंड्स का है, जहां की सरकार ने प्रशासनिक व्यवस्था में बहुत बड़ा बदलाव करने का ऐलान किया है. डच कैबिनेट ने आने वाले दशक में सरकारी सेवाओं से पूरे 25,000 फुल-टाइम पदों को खत्म करने का फैसला किया है. इस पूरी योजना की जानकारी देश के स्टेट सेक्रेटरी एरिक वान डेरबर्ग ने एक इंटरव्यू के दौरान साझा की है और वो जल्द ही इसे लेकर संसद में एक औपचारिक प्रस्ताव भी भेजने वाले हैं.

वर्तमान में डच सरकार के पास लगभग 1,60,000 सिविल सेवक कार्यरत हैं. ऐसे में 25,000 पदों की ये कटौती कुल वर्कफोर्स का करीब 16% हिस्सा बनती है. हालांकि अधिकारियों ने इसे गोल-मटोल करते हुए 20% से कम बताया है, लेकिन वो खुद मानते हैं कि ये कदम ‘बेहद भारी’ और बड़ा है. सरकार का मुख्य उद्देश्य इस छंटनी के जरिए करीब 3.5 अरब यूरो की भारी-भरकम रकम बचाना है.

किस विभाग पर गिरेगी गाज और 2035 तक कैसा होगा दफ्तर?

ये कटौती सभी विभागों पर एक समान रूप से लागू नहीं होगी. कुछ विभागों में नौकरियों में लगभग 20% तक की कमी की जाएगी, तो वहीं कुछ अन्य विभागों में ये आंकड़ा 60% तक भी पहुंच सकता है. स्टेट सेक्रेटरी वान डेरबर्ग ने साफ कहा है कि साल 2035 तक हालात ऐसे हो जाएंगे कि एक सिविल सेवक को अपने आसपास पहले के मुकाबले काफी कम सहकर्मी नजर आएंगे.

दफ्तरों की आधी संख्या: सरकार अब ‘एक वर्कस्टेशन प्रति दो कर्मचारी’ के फॉर्मूले पर काम कर रही है. उनका तर्क है कि ऑफिस सबसे व्यस्त दिनों में भी 70% से ज्यादा नहीं भरते, क्योंकि कर्मचारी वर्क फ्रॉम होम करना पसंद करते हैं. खाली पड़े सरकारी दफ्तरों पर टैक्सपेयर्स का पैसा बहाना फिजूलखर्ची है, इसलिए इन इमारतों को आगे चलकर हाउसिंग, कमर्शियल स्पेस या होटलों में बदला जा सकता है.

सलाहकार निकायों पर कैंची: सरकार केवल कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने विशाल सलाहकार तंत्र को भी छोटा करने जा रही है. वर्तमान में देश में माइग्रेशन, शिक्षा और विदेश मामलों से जुड़े कुल 176 सलाहकार निकाय चल रहे हैं, जिनकी संख्या बेकाबू हो चुकी है. अब इनमें से कई को बंद करने की तैयारी है.

क्या होगी नई रणनीति? बिना भर्ती रोके कैसे चलेगा काम?

इतनी बड़ी छंटनी का मतलब ये नहीं है कि सरकार ने पूरी तरह से नई भर्तियों पर रोक लगा दी है. वान डेरबर्ग का मानना है कि अगर अहम पदों पर नए लोग नहीं आए और कर्मचारी अचानक काम छोड़कर चले गए, तो पूरा सिस्टम ठप पड़ जाएगा. इसलिए उनकी रणनीति ये है कि हर एक रिटायरमेंट या इस्तीफे के बाद ये परखा जाए कि क्या उस पद पर वाकई किसी नए शख्स की जरूरत है या नहीं.

इसके अलावा, सरकार अब महंगे बाहरी ठेकेदारों पर अपनी निर्भरता तेजी से घटा रही है. उनकी जगह डिजिटल टूल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है. उदाहरण के लिए, जिन सरकारी जानकारियों या मदद के लिए पहले लोगों को ऑफिस के समय में फोन करना पड़ता था, वो अब ऑनलाइन उपलब्ध हैं और चैटबॉट्स के जरिए चौबीसों घंटे नागरिकों के सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं.

नौकरशाही में भारी बढ़ोतरी और बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

आखिर सरकार को ऐसा सख्त कदम उठाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके पीछे पिछले कुछ सालों के आंकड़े बड़ी वजह हैं. साल 2018 के बाद से नीदरलैंड्स में सरकारी मशीनरी में असामान्य रूप से बढोत्तरी हुई है.

  • कानून और नियम लागू करने वाले सिविल सेवकों की संख्या में 28% की बढ़ोतरी हुई.
  • नीतियां बनाने वाले अधिकारियों की संख्या में सीधे 56% का उछाल आया.

वान डेरबर्ग का कहना है कि नीतियां इतनी जटिल हो चुकी हैं कि इससे आम नागरिकों और कर्मचारियों दोनों के लिए गलतियों का खतरा बढ़ गया है. सरकार का मानना है कि छोटे-मोटे बदलावों से 3.5 अरब यूरो की बचत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता था, इसलिए इस भारी-भरकम ढांचे को काटना ही एकमात्र उपाय बचा था.

ये तो सिर्फ ट्रेलर है, बदलने वाली है पूरी पिक्चर

नीदरलैंड्स सरकार का ये कदम सिर्फ नौकरी कटौती का मामला नहीं है, बल्कि ये भविष्य की उस डिजिटल और स्मार्ट गवर्नेंस की झलक है जहां कम लोगों और आधुनिक तकनीक के सहारे पूरा देश चलाया जाएगा. आने वाले सालों में अन्य यूरोपीय और विकसित देश भी इस मॉडल को अपना सकते हैं. लेकिन फिलहाल डच ब्यूरोक्रेट्स के लिए ये आने वाले मुश्किल दिनों का साफ संकेत है, जहां नौकरी बचाए रखने के लिए उन्हें अपनी उपयोगिता साबित करनी होगी.



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