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Egypt Museum News: मिस्र में करीब 3,400 साल पुराने राजा अमेनहोटेप III के मकबरे को दो दशक से ज्यादा समय तक बंद रहने के बाद पर्यटकों के लिए फिर खोल दिया गया है. अक्टूबर 2025 में खुले इस मकबरे में दीवारों पर बनी प्राचीन पेंटिंग, धार्मिक लिखावट और ताबूत का पत्थर का ढांचा आज भी मौजूद है. 2001 से 2024 के बीच इसके संरक्षण का काम चला.
मिस्र घूमने जाने वाले लोगों के लिए इतिहास की एक खास जगह फिर से खुल गई है. करीब 3,400 साल पुराने राजा अमेनहोटेप III के मकबरे में अब पर्यटक 14 मीटर नीचे उतरकर जा सकते हैं. दो दशक से ज्यादा समय तक आम लोगों के लिए बंद रहा यह मकबरा अक्टूबर 2025 में फिर खोला गया था. खास बात यह है कि इसे ऐसे समय में पर्यटकों के लिए खोला गया, जब मिस्र अपने नए ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम के जरिए दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींच रहा है. (Reuters)
मकबरे की दीवारों पर बनी पुरानी पेंटिंग, धार्मिक संदेश और पत्थर की संरचना आज भी उस दौर की कहानी बताती हैं, जब मिस्र की सत्ता और ताकत अपने चरम पर थी. इसे फिर से खोलने के लिए करीब 20 साल तक मरम्मत और संरक्षण का काम चला. (Reuters)
अमेनहोटेप III प्राचीन मिस्र के सबसे ताकतवर शासकों में गिने जाते हैं. उन्होंने किशोर उम्र में राजगद्दी संभाली थी और करीब 1390 ईसा पूर्व से 1350 ईसा पूर्व तक लगभग 38 साल शासन किया. उनका दौर मिस्र के 18वें राजवंश का था, जब देश की ताकत, कला और निर्माण का काम काफी आगे बढ़ा. उनके शासनकाल की पहचान आज भी कई मंदिरों, महलों और विशाल मूर्तियों से होती है. इनमें लक्सर के पास स्थित मेमनॉन की विशाल मूर्तियां भी शामिल हैं. कभी ये मूर्तियां उनके अंतिम संस्कार से जुड़े मंदिर की रखवाली करती थीं. (Reuters)
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अमेनहोटेप III का मकबरा भी इसी दौर की एक अहम निशानी है. इसकी दीवारों पर राजा को देवी-देवताओं के साथ दिखाया गया है. इन चित्रों और लिखावटों में मृत्यु के बाद के जीवन से जुड़ी मान्यताओं की झलक मिलती है. इस मकबरे को फ्रांस के इंजीनियरों ने 1799 में खोजा था. उस समय नेपोलियन का मिस्र अभियान चल रहा था. बाद में ब्रिटिश पुरातत्वविद हॉवर्ड कार्टर ने 1915 में इसकी पूरी खुदाई की. लेकिन तब तक मकबरे को सदियों पहले ही लूटा जा चुका था. मिस्र की प्राचीन वस्तुओं से जुड़ी सुप्रीम काउंसिल के मोहम्मद इस्माइल के मुताबिक, जब मकबरा मिला तो वह खाली था, क्योंकि उसमें पहले ही चोरी हो चुकी थी. (Reuters)
इसके बावजूद यहां देखने के लिए काफी कुछ मौजूद है. दीवारों पर बनी रंगीन पेंटिंग समय के साथ फीकी जरूर हुई हैं, लेकिन अब भी दिखाई देती हैं. यहां ‘बुक ऑफ द डेड’ से जुड़ी पवित्र लिखावट भी है. प्राचीन मिस्र की मान्यताओं के अनुसार, इन धार्मिक संदेशों का मकसद मृत राजा को मृत्यु के बाद की दुनिया तक पहुंचने में मदद करना था. मकबरे में उस पत्थर का ढांचा भी मौजूद है, जिसमें कभी राजा का ताबूत रखा गया था. ताबूत चोरी हो चुका है, लेकिन उसका ढक्कन अब भी वहीं मौजूद है. (Reuters)
इस मकबरे को पर्यटकों के लिए दोबारा तैयार करना आसान नहीं था. इसकी दीवारों और पुरानी पेंटिंग को नुकसान से बचाने के लिए विशेषज्ञों ने लंबे समय तक काम किया. 2001 से 2024 के बीच तीन चरणों में संरक्षण का काम किया गया. इसमें मिस्र, जापान और दूसरे देशों के विशेषज्ञ शामिल हुए. यह काम यूनेस्को के साथ मिलकर किया गया. विशेषज्ञों ने दीवारों पर बनी नाजुक पेंटिंग को साफ किया और उन्हें और खराब होने से बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए. इन चित्रों में अमेनहोटेप III के साथ उनकी शाही पत्नी रानी तिये को भी दिखाया गया है. (Reuters)
मकबरे के अंदर जाने के लिए करीब 36 मीटर लंबा ढलान वाला रास्ता है. यह नीचे जाकर तीन आपस में जुड़े कमरों तक पहुंचता है. इनमें एक कमरा राजा के लिए था, जबकि बाकी दो उनकी रानियों तिये और सितामुन से जुड़े थे. दीवारों पर राजा को देवी-देवताओं के बीच खड़े हुए दिखाया गया है. कई जगह ऐसे संदेश लिखे हैं, जो हमेशा जीवित रहने की कामना से जुड़े हैं. हालांकि, राजाओं की घाटी के कुछ दूसरे मकबरों की तरह इसे पूरी तरह चित्रों से नहीं सजाया गया था. एक खास बात यह भी है कि अमेनहोटेप III की ममी अब इस मकबरे में नहीं है. प्राचीन समय में पुजारियों ने उसे सुरक्षित रखने के लिए दूसरी जगह पहुंचा दिया था. आज उनकी ममी काहिरा के नेशनल म्यूजियम ऑफ इजिप्शियन सिविलाइजेशन में रखी गई है. वहां उनके अलावा 16 अन्य शाही ममियां भी मौजूद हैं. (Reuters)
मकबरे को दोबारा खोलने का समय भी खास है. अक्टूबर 2025 में इसे पर्यटकों के लिए खोला गया. इसके कुछ ही हफ्तों बाद, 1 नवंबर 2025 को गीजा के पिरामिडों के पास ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम का भव्य उद्घाटन हुआ. यह संग्रहालय एक ही प्राचीन सभ्यता को समर्पित दुनिया का सबसे बड़ा संग्रहालय बताया जा रहा है. 2026 में यहां सप्ताहांत के दौरान हर दिन 20,000 से 24,000 लोग पहुंच रहे हैं. यहां पहली बार तूतनखामुन के खजाने को एक साथ प्रदर्शित किया जा रहा है. ये खजाने 1922 में उनकी कब्र की खोज के बाद से दुनिया भर में आकर्षण का केंद्र रहे हैं. (Reuters)