मन मोह लेती है कोंडागांव की लौह कला, लोहे से बनते हैं घोड़े, हिरण और बैल; विदेशों तक पहचान

मन मोह लेती है कोंडागांव की लौह कला, लोहे से बनते हैं घोड़े, हिरण और बैल; विदेशों तक पहचान


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Raipur: बस्तर के कोंडागांव की लौह शिल्पकला आज भी लोगों को आकर्षित कर रही है. कारीगर राधेलाल बघेल के अनुसार उनके पिता और पूर्वज पहले खेती-किसानी और शादी-विवाह के लिए लोहे के दीये और दूसरे सामान बनाते थे, लेकिन अब इसी कला से घोड़े, हिरण और बैल जैसी आकर्षक आकृतियां तैयार की जाती हैं.

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राहुल दुबे(रायपुर), 

Kondagaon Iron Craft: छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला और शिल्पकला देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी पहचान बना रही है. बस्तर के कोंडागांव में लोहे से सुंदर आकृतियां बनाने की कला आज भी लोगों को आकर्षित करती है. कभी खेती-किसानी और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लोहे के सामान बनाए जाते थे, लेकिन आज इसी कला से घोड़े, हिरण, बैल और कई तरह की आकर्षक आकृतियां बनाई जा रही हैं.

पिता से सीखी लोहे से कलाकृतियां बनाने की कला
कोंडागांव के रहने वाले राधेलाल बघेल एक लौह शिल्प कारीगर हैं. उन्होंने बताया कि उनके पिता और पूर्वज भी लोहे से सामान बनाने का काम करते थे. पहले शादी-विवाह के मौके पर हल्दी चढ़ाने के लिए छोटे-छोटे दीये और दूसरी चीजें बनाई जाती थीं. गांव के लोग कारीगरों को बदले में अनाज, जेवर और पैसे देते थे. इसी से उनका जीवन चलता था.

कच्चे लोहे से तैयार होती हैं सुंदर आकृतियां
राधेलाल बघेल ने बताया कि इन कलाकृतियों को बनाने के लिए सबसे पहले कच्चा लोहा लिया जाता है. इसके बाद छैनी से लोहे को काटकर शरीर, हाथ, पैर और सिर के अलग-अलग हिस्से तैयार किए जाते हैं. फिर भट्ठी में लोहे को गर्म किया जाता है और हथौड़े से पीटकर उसे मनचाहा आकार दिया जाता है. इस तरह धीरे-धीरे लोहे का एक सुंदर कलाकृति में रूप बदल जाता है.

एक कलाकृति बनाने में लगते हैं दो से तीन घंटे
कारीगर के मुताबिक, लोहे की एक कलाकृति तैयार करने में करीब दो से तीन घंटे लग जाते हैं. कई बार दो कारीगर मिलकर भी इसे बनाते हैं. कलाकृति का आकार और डिजाइन जितना अलग होता है, उसे तैयार करने में उतनी ही मेहनत और समय लगता है.

जानवरों को देखकर सीखी आकृतियां बनाने की तकनीक
राधेलाल बघेल ने बताया कि पहले उनके पूर्वज गर्म लोहे को हाथ में पकड़कर हथौड़े से पीटते थे. इससे उनके हाथ भी घायल हो जाते थे. बाद में उन्होंने जानवरों को देखकर लोहे से आकृतियां बनाने के नए तरीके सीखे. शुरुआत में दो पैरों वाली आकृतियां बनाई गईं और फिर धीरे-धीरे चार पैरों वाले जानवरों की कलाकृतियां बनने लगीं.

परंपरा से आधुनिक कला तक का सफर
समय के साथ कारीगरों ने अपनी कला में नए-नए डिजाइन और तकनीकें जोड़ीं. घोड़े, हिरण, बैल और दूसरे जानवरों की आकृतियां बनाने का चलन बढ़ा. आज कोंडागांव की लौह शिल्पकला छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह कला कारीगरों की मेहनत, हुनर और परंपरा को दर्शाती है.



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