Jaipur News: जयपुर के सबसे पुराने गुरुद्वारे की अनसुनी कहानी, काबुल से आए पांच सिख परिवारों से जुड़ा है इसका इतिहास

Jaipur News: जयपुर के सबसे पुराने गुरुद्वारे की अनसुनी कहानी, काबुल से आए पांच सिख परिवारों से जुड़ा है इसका इतिहास


जयपुर. जयपुर अपने ऐतिहासिक किलों, महलों, हवेलियों और इमारतों के लिए जितना मशहूर है, उतना ही अपने धार्मिक स्थलों की बसावट और उनसे जुड़े खास इतिहास के लिए भी मशहूर है. 16वीं से 17वीं शताब्दी के दौरान जयपुर के राजा-महाराजाओं ने यहां सैकड़ों मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल बनवाए, जो आज भी ऐतिहासिक रूप से शहर की संस्कृति और धार्मिक आस्था से जुड़े हुए हैं.

जयपुर में भव्य मंदिरों के अलावा कई गुरुद्वारे भी स्थित हैं, लेकिन अगर बात सिख धर्म की आस्था से जुड़े जयपुर के सबसे पहले गुरुद्वारे की करें, तो यह गुरुद्वारा आज भी जयपुर के चारदीवारी बाजार के चौड़ा रास्ता में स्थित है. यहां आज भी लोग दूर-दूर से मत्था टेकने आते हैं. लोकल-18 ने जयपुर के सबसे प्राचीन गुरुद्वारे श्री गुरु नानक देव सत्संग सभा में पहुंचकर यहां के लोगों से इसके इतिहास को लेकर बात की. लोगों का कहना है कि इतिहास की लिखित जानकारी के मुताबिक, यह जयपुर का सबसे पहला गुरुद्वारा है, जहां गुरु स्वरूप पालकी, 10 गुरुओं की प्राचीन तस्वीर और उस दौर के शस्त्र आज भी मौजूद हैं. सैकड़ों वर्षों बाद भी जयपुर का यह पहला गुरुद्वारा अपने इतिहास के साथ लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां स्थानीय लोगों से लेकर विदेशों में रहने वाले सिख धर्म के अनुयायी भी मत्था टेकने आते हैं.

इस गुरुद्वारे के रूप में हुई थी जयपुर की सबसे पहली सिख पीठ की स्थापना
लोकल-18 से बात करते हुए गुरुद्वारे से जुड़े लोगों का कहना है कि जयपुर के राजा-महाराजाओं ने भारत ही नहीं, बल्कि देश के बाहरी इलाकों से भी बेहतरीन कारीगरों, अलग-अलग कलाओं के विद्वानों और पंडित-पुजारियों सहित अन्य धर्मों के लोगों को जयपुर में बसाया था. इसी तरह 16वीं शताब्दी में जयपुर के मिर्जा राजा मानसिंह काबुल-गांधार का युद्ध जीतकर जब आमेर लौटे, तो वह काबुल-गांधार से पांच सिख परिवारों को अपने साथ आमेर लेकर आए थे. इसके बाद सवाई जयसिंह द्वारा जयपुर की बसावट के समय उनके पूर्वजों को जड़ियों के रास्ते में बसाया गया था. बसावट के दौरान ही जयपुर में सिख धर्म की सेवा-पूजा को कायम रखने के लिए इस पहले गुरुद्वारे का निर्माण करवाया गया था.

सवाई जयसिंह ने दी थी जमीन
इस गुरुद्वारे के निर्माण के लिए सवाई जयसिंह ने जमीन दी थी. जयपुर के राजा-महाराजा सभी धर्मों में विश्वास रखते थे और राजपरिवार सिख गुरुओं के विशेष अनुयायी रहे हैं. इसी के चलते जयपुर में गुरुद्वारे के निर्माण के साथ आसपास के क्षेत्रों में सिख परिवारों को भी बसाया गया.

आज भी बेजोड़ है गुरुद्वारे की प्राचीन स्थापत्य कला
आपको बता दें कि जयपुर के चौड़ा रास्ता स्थित गोवर्धन नाथ जी की गली में बना यह गुरुद्वारा आज भी अपनी बेजोड़ स्थापत्य कला के साथ खड़ा है. गुरुद्वारे की वास्तुकला में राजा-महाराजाओं के समय के देवालयों जैसी गुंबदनुमा और कलशनुमा आकृतियों के साथ नक्काशी भी आज तक मौजूद है. इस गुरुद्वारे में राजस्थान का सबसे प्राचीन चित्र भी मौजूद है. इसे नेचर पेंटिंग में इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों और कुंदन मीनाकारी से तैयार किया गया था, जिसमें 10 गुरुओं का चित्र बनाया गया है.

आज भी रखे गए हैं यहां शस्त्र
इसके अलावा, गुरुद्वारे की स्थापना के समय यहां रखे गए शस्त्र भी आज तक मौजूद हैं. गुरु मर्यादा के नियमों के अनुसार, गुरु ग्रंथ साहिब की सवारी का जहां प्रकाश होता है, वहां गुरुओं के शस्त्र भी रखे जाते हैं. आज भी गुरुद्वारे में पीढ़ियों से सेवा-पूजा, लंगर और प्रसाद का काम होता आ रहा है. चाहे गुरु नानक जयंती हो या कोई अन्य पर्व, यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु भी पीढ़ियों से इस गुरुद्वारे में आते रहे हैं. यही वजह है कि यह गुरुद्वारा आज भी जयपुर की धार्मिक संस्कृति की खास पहचान बना हुआ है.



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