Kerala Road Accident: केरल में पिछले दिनों सड़क हादसे की दो घटनाएं घटीं. इन दोनों घटनाओं के पीछे कारण करीब-करीब एक जैसा था. दोनों हादसों में रसूख वाले लोगों की औलादें लापरवाह तरीके से गाड़ियां चला रही थीं. देश के अन्य इलाकों में भी ऐसी कई घटनाएं देखी जाती हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार कौन हैं? पिछले दिनों कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा था कि नाबालिगों के गाड़ी चलाने और उससे हादसे होने पर पूरी तरह उनके माता-पिता जिम्मेदार होंगे. केरल के चेरानेल्लूर की इस ताजा घटना में एक जज साहब के नाबालिग बेटे पर अपनी गाड़ी से एक व्यक्ति की जान लेने का आरोप है. इसके बाद केरल हाईकोर्ट ने उस जज के खिलाफ मामला दर्ज करने की अनुमति दी है. नाबालिग की जमानत भी रद्द कर दी गई है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसे लोगों की औलादों के दिमाग में यह क्यों बैठा रहता है कि कुछ भी करेंगे लेकिन उनका बाप सब सेट कर देगा? उनको बचा लिया जाएगा. आखिर भारत में यह मानसिकता खत्म क्यों नहीं होती? देशभर में ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें पावर वाले परिवारों के बच्चों के अपराध करने के बाद प्रभाव का इस्तेमाल कर उनको बचाने की कोशिश के आरोप लगते हैं.
केरल के चेरानेल्लूर में 55 वर्षीय जयबालकृष्णन रात करीब दो से तीन बजे अपनी दुकान बंद करके घर लौट रहे थे. तभी तेज रफ्तार मर्सिडीज-बेंज ने उनके स्कूटर को पीछे से टक्कर मार दी. उनकी मौके पर ही मौत हो गई. पुलिस के मुताबिक कार एक अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के नाम पर पंजीकृत थी और उसे उनका 17 वर्षीय बेटा चला रहा था. शुरुआत में नाबालिग को जमानत मिल गई. इसके बाद मृतक के परिवार ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए. विरोध के बीच उसे दोबारा हिरासत में लिया गया. केरल हाईकोर्ट ने न्यायाधीश के खिलाफ मामला दर्ज करने की अनुमति भी दी.
यह घटना एक बड़े सवाल को जन्म देती है. आखिर किसी किशोर के मन में यह भरोसा कैसे पैदा होता है कि गलती होने पर पिता उसे बचा लेंगे? क्या यह सोच अचानक बनती है या परिवार और समाज के व्यवहार से धीरे-धीरे मजबूत होती है?
बच्चों को सुविधाएं देना गलत नहीं है. समस्या तब पैदा होती है, जब सुविधा के साथ जिम्मेदारी नहीं सिखाई जाती. महंगी गाड़ी मिलना अपने आप में गलत नहीं, लेकिन उसके साथ नियमों और दूसरों की जिंदगी के प्रति सम्मान का एहसास जरूरी है. अगर बच्चे को बार-बार यह भरोसा मिले कि गलती करने पर परिवार उसे बचा लेगा, तो कानून का डर कमजोर पड़ सकता है. ऐसे में सवाल परवरिश का भी है. क्या माता-पिता बच्चों को गलती स्वीकार करना सिखाते हैं या हर बार उनके लिए रास्ता निकालते हैं? क्या उन्हें नियमों का पालन करना सिखाया जाता है या यह भरोसा दिया जाता है कि परिवार का नाम उसकी परेशानी आसान कर देगा?
केरल में ही पिछले दिनों कोच्चि एयरपोर्ट के पास नेदुम्बस्सेरी में तेज रफ्तार मिनी कूपर की टक्कर से तीन छात्रों की मौत हो गई थी. मृतकों में दो युवतियां शामिल थीं. पुलिस ने चालक सुहैल सजीव को हिरासत में लिया. खबरों के मुताबिक स्थानीय लोगों से उसने कथित तौर पर कहा था कि उसके पिता सब संभाल लेंगे. दोनों हादसों की कानूनी परिस्थितियां अलग हैं. लेकिन मेरा बाप सब सेट कर देगा वाला रवैया एक ही सवाल खड़ा करता है.
लोकतंत्र में पद किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी बढ़ाता है, उसे कानून से ऊपर नहीं उठाता. न्यायिक अधिकारी से तो निष्पक्षता और कानून के सम्मान की अपेक्षा और भी अधिक होती है. हालांकि किसी अधिकारी के परिवार के सदस्य की गलती के लिए उसे स्वतः दोषी नहीं ठहराया जा सकता. उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए अलग कानूनी आधार और साक्ष्य जरूरी हैं.
चेरानेल्लूर मामले में न्यायाधीश के खिलाफ मामला दर्ज करने की अनुमति इसलिए अहम है कि जांच का रास्ता खुला रहे. अब यह जरूरी है कि पुलिस सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच करे. हादसे की परिस्थितियों और संबंधित लोगों की भूमिका के आधार पर ही जिम्मेदारी तय हो. सवाल यह भी है कि प्रभावशाली परिवारों से जुड़े मामलों में पुलिस की कार्रवाई पर बार-बार संदेह क्यों उठता है? हर जमानत या कानूनी राहत को रसूख का नतीजा नहीं कहा जा सकता. लेकिन यदि जांच में ढिलाई हो, नियमों की अनदेखी हो या पीड़ित परिवार को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़े, तो व्यवस्था को जवाब देना होगा.
ऐसी मानसिकता खत्म करने की शुरुआत घर से होनी चाहिए. माता-पिता का काम हर गलती पर ढाल बनना नहीं, बल्कि बच्चों को उनके परिणामों का सामना करना सिखाना भी है. बच्चों को समझना होगा कि पिता का पद, पैसा या पहुंच किसी दूसरे की जिंदगी से बड़ा नहीं है. सिस्टम की जिम्मेदारी भी कम नहीं है. जांच समय पर हो, साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं और पीड़ित परिवार को कार्रवाई की जानकारी मिले. आरोपी की हैसियत चाहे जो हो, कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए.
जयबालकृष्णन की मौत के बाद उनका परिवार न्याय की लड़ाई लड़ रहा है. एक तरफ किसी घर का सदस्य चला गया, दूसरी तरफ आरोपी के परिवार की हैसियत को लेकर सवाल उठ रहे हैं. न्याय का अर्थ किसी को उसके पिता के पद के कारण दोषी ठहराना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करना है.