गाजीपुर के मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सुविधाओं, मरीजों की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवाल, प्रशासन तय करे जवादेही

गाजीपुर के मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सुविधाओं, मरीजों की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवाल, प्रशासन तय करे जवादेही


गाजीपुरः मरीजों को बेहतर इलाज देने के उद्देश्य से बनाए गए मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सुविधाओं और व्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं. 21 अक्टूबर को महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध अस्पताल की तीसरी मंजिल पर बने चैंबर में एक मरीज के गिरने की घटना के बाद अब समाजसेवियों ने अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था, सुविधाओं की उपलब्धता और मरीजों को होने वाली परेशानियों पर सवाल उठाए हैं.

अस्पताल में अक्सर आने-जाने वाले समाजसेवियों का कहना है कि यहां सुविधाएं बढ़ाने की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन मरीजों को उनका लाभ लगातार मिल पा रहा है या नहीं, इसकी निगरानी जरूरी है. उन्होंने अस्पताल प्रशासन से व्यवस्थाओं में सुधार करने और मरीजों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देने की मांग की है.

मरीज की सुरक्षा पर सवाल, निगरानी व्यवस्था पर उठाई उंगली

समाजसेवी दीपक उपाध्याय ने 21 अक्टूबर को हुई घटना का हवाला देते हुए अस्पताल की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए. उनका कहना है कि अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल किसी एक कर्मचारी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही है. उन्होंने कहा कि अस्पताल में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए लगातार निगरानी होनी चाहिए. केवल एक दिन निरीक्षण कर लेने से मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती. अस्पताल के अलग-अलग हिस्सों में मरीजों की आवाजाही और सुरक्षा व्यवस्था पर नियमित ध्यान देना जरूरी है.

MRI सुविधा शुरू होने के बाद बंद होने का आरोप

समाजसेवी सुधांशु तिवारी ने अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए.उनका दावा है कि हाल ही में MRI जांच की सुविधा शुरू किए जाने की घोषणा हुई थी और इसका उद्घाटन उपमुख्यमंत्री ने किया था, लेकिन उनके मुताबिक अगले ही दिन यह सुविधा बंद हो गई. आरोप लगाया कि अस्पताल में नई सुविधाएं शुरू होने के बावजूद मरीजों को उनका लाभ नहीं मिल पा रहा है. उन्होंने अस्पताल की व्यवस्थाओं में भ्रष्टाचार होने का भी आरोप लगाया.

दीपक उपाध्याय ने अस्पताल में पर्ची बनवाने, जांच कराने और सही विभाग तक पहुंचने में मरीजों को होने वाली परेशानियों का मुद्दा उठाया. उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले कई मरीजों को यह समझने में कठिनाई होती है कि उन्हें किस वार्ड या विभाग में जाना है. उन्होंने दावा किया कि पर्ची बनवाने में ही काफी समय लग जाता है और ब्लड सैंपल देने तथा उसकी रिपोर्ट मिलने में भी मरीजों को इंतजार करना पड़ता है. उनके मुताबिक, मरीजों को जांच और इलाज के लिए अलग-अलग स्थानों पर जाना पड़ता है, जिससे उनकी परेशानी बढ़ती है. ऐसी स्थिति में अस्पताल में स्पष्ट दिशा-सूचक बोर्ड, मरीजों की सहायता के लिए कर्मचारी और जांच की प्रक्रिया को सुगम बनाने की जरूरत

इलाज में लापरवाही के भी आरोप

समाजसेवी दीपक उपाध्याय ने इलाज के दौरान गलत अंग या गलत पैर से संबंधित उपचार होने की शिकायतें भी सामने रखीं. उन्होंने आरोप लगाया कि कभी दाएं पैर की जगह बाएं पैर के इलाज की शिकायत मिलती है, तो कभी फ्रैक्चर से संबंधित इलाज को लेकर मरीजों को परेशानी होती है. ये गंभीर आरोप हैं, जिनकी पुष्टि के लिए संबंधित मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड, डॉक्टरों का पक्ष और अस्पताल प्रशासन की प्रतिक्रिया जरूरी है. ऐसे मामलों की जांच होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कहीं उपचार में वास्तविक गलती हुई या शिकायत के पीछे कोई अन्य कारण था.

अस्पताल प्रशासन की जवाबदेही जरूरी

21 अक्टूबर की घटना ने मरीजों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं. वहीं, समाजसेवियों की ओर से उठाए गए मुद्दे अस्पताल की सुविधाओं, जांच व्यवस्था, मरीजों के मार्गदर्शन और कर्मचारियों की निगरानी की पड़ताल की जरूरत बताते हैं. अब सवाल यह है कि अस्पताल प्रशासन मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, जांच सुविधाओं को नियमित रूप से उपलब्ध रखने और इलाज की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए क्या कदम उठा रहा है. इन शिकायतों पर अस्पताल प्रशासन का पक्ष और व्यवस्थाओं की जमीनी स्थिति सामने आने के बाद ही तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी.



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