अनंत सिंह पर एक्शन: मोकामा-बाढ़ बेल्ट में भूमिहार वोट बैंक पर किसकी पकड़, JDU-NDA का कितना बिगड़ेगा गणित?

अनंत सिंह पर एक्शन: मोकामा-बाढ़ बेल्ट में भूमिहार वोट बैंक पर किसकी पकड़, JDU-NDA का कितना बिगड़ेगा गणित?


जनता दल यूनाइटेड से अनंत सिंह के निष्कासन के बाद मोकामा की राजनीति में एक बार फिर जातीय समीकरण और व्यक्तिगत जनाधार की चर्चा शुरू हो गई है. वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में जदयू के टिकट पर जीतने वाले अनंत सिंह का इससे पहले निर्दलीय और राजद उम्मीदवार के रूप में भी चुनावी प्रदर्शन मजबूत रहा है. ऐसे में सवाल है कि जदयू से अलग होने के बाद उनका व्यक्तिगत जनाधार कितना बचा रहेगा और इसका असर मोकामा तथा आसपास के भूमिहार बहुल इलाकों में जदयू और एनडीए के वोट पर किस तरह पड़ेगा.

बिहार में भूमिहार आबादी 2.86 प्रतिशत, मोकामा में स्थिति अलग

बिहार सरकार के जाति आधारित सर्वेक्षण के मुताबिक, राज्य की कुल आबादी में भूमिहार समुदाय की हिस्सेदारी 2.86 प्रतिशत है, लेकिन मोकामा में भूमिहार मतदाताओं की संख्या राज्य के औसत से काफी अधिक मानी जाती है. स्थानीय स्तर पर आंकड़ा 35 से 38 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. वहीं, स्थानीय चुनावी समीकरणों में यहां भूमिहारों के अलावा यादव, धनुक, मुस्लिम और दलित मतदाताओं को भी महत्वपूर्ण माना जाता है. बिहार में भूमिहारों की आबादी थोड़ी कम लग रही हो, लेकिन मोकामा जैसे विधानसभा क्षेत्र में उनका चुनावी प्रभाव अधिक है.

बाढ़, मोकामा, लखीसराय और मुंगेर बेल्ट में हर जाति-समुदाय में अनंत सिंह की पैठ है.

मोकामा विधानसभा क्षेत्र में जनवरी 2024 की मतदाता सूची के अनुसार, मोकामा में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 2.9 लाख थी. एक आकलन के अनुसार, इनमें भूमिहार मतदाताओं की संख्या लगभग 55 हजार से 65 हजार, करीब 35 प्रतिशत. यादवों की करीब 40 हजार, यानी करीब 20-22 प्रतिशत और धनुक के साथ कुर्मी-कोइरी मतदाताओं की लगभग 45 हजार, यानी 18 से 20 प्रतिशत बताई गई थी. दलितों की आबादी करीब 16-17 प्रतिशत और राजपूतों की आबादी करीब 5 प्रतिशत थी. वहीं, मुस्लिमों की आबादी करीब 5 प्रतिशत बताई जाती है. खास बात यह है कि 1952 से लेकर अब तक इस सीट पर भूमिहार समुदाय से आने वाले उम्मीदवार ही जीतते आये हैं. इसके साथ एक बड़ा फैक्टर यह भी है कि यहां चुनाव पार्टी से ज्यादा जातीय गोलबंदी के साथ बाहुबली छवि पर भी लड़ा जाता है.

अनंत सिंह का वोट पार्टी से बड़ा, आंकड़े गवाह हैं

अब आते हैं अनंत सिंह के जनाधार की बात पर. दरअसल, मोकामा में अनंत सिंह का जनाधार किसी पार्टी का मोहताज नहीं है, ये पिछले चुनावों के परिणाम भी बताते हैं. वर्ष 2015 में जदयू ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय लड़े और 54,005 वोट लेकर जीते. उन्होंने जदयू के स्वजातीय नीरज कुमार को 35,657 पर रोक दिया. वर्ष 2020 में राजद से लड़े तो 78,721 वोट, 52.99 प्रतिशत के साथ जीते. इस बार उन्होंने जेडीयू के राजीव लोचन को 42,964 पर सिमटा दिया. वर्ष 2022 में सजा के बाद अनंत सिंह की सदस्यता गई तो पत्नी नीलम देवी राजद से लड़ीं और 79,744 वोट लेकर जीतीं. वहीं, वर्ष 2025 में जेल में रहते हुए अनंत सिंह जदयू से लड़े तो 91,416 वोट, यानी करीब कुल वोट का 49.44 प्रतिशत मत पाकर 28,206 वोटों के अंतर से जीत प्राप्त की. इसका मतलब साफ है कि अनंत सिंह ने जेडीयू, आरजेडी और निर्दलीय, तीनों सिंबल से जीत प्राप्त की है. खास बात यह कि उनका वोट बैंक किसी एक जाति में नहीं सिमटता है, बल्कि भूमिहार जाति के साथ उनको टाल-दियारा के अति पिछड़े, मल्लाह और यादवों के एक वर्ग का मत मिलता है. खास बात यह भी है कि स्थानीय लोग स्पष्ट तौर पर कहते हैं, “हम पार्टी को नहीं, छोटे सरकार को वोट देते हैं.”

अनंत सिंह के चुनावी आंकड़े क्या बताते हैं?

ऐसे में स्पष्ट है कि मोकामा में भूमिहार मतदाताओं की बड़ी भूमिका है, लेकिन पूरे समुदाय को अनंत सिंह का समर्थक मानना सही नहीं होगा. इसी तरह जदयू या भाजपा को मिलने वाले सभी भूमिहार वोटों को पार्टी का स्थायी वोट बैंक भी नहीं माना जा सकता. यहां तीन तरह के मतदाता महत्वपूर्ण होंगे. पहला, अनंत सिंह के व्यक्तिगत समर्थक. दूसरा, जदयू और भाजपा के परंपरागत समर्थक. तीसरा, ऐसे मतदाता जो उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दों और गठबंधन के आधार पर फैसला करते हैं. यही वजह है कि अनंत सिंह के निष्कासन का असर केवल जातीय आंकड़ों से तय नहीं होगा.

मोकामा से बाहर कितना असर होगा?

मोकामा में अनंत सिंह की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ सबसे अधिक है. बाढ़ और आसपास के क्षेत्रों में उनका प्रभाव स्थानीय नेतृत्व और जातीय समीकरणों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है. लखीसराय, मुंगेर और बेगूसराय जैसे भूमिहार बहुल इलाकों में समुदाय की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन वहां अनंत सिंह का व्यक्तिगत जनाधार मोकामा जैसा नहीं माना जा सकता. इसलिए मोकामा में उनके समर्थकों की नाराजगी को पूरे बिहार के भूमिहार मतदाताओं की नाराजगी मानना सही नहीं होगा.

जदयू और एनडीए पर असर, मोकामा में सीधा नुकसान!

मोकामा में जदयू का अपना कैडर वोट 8 से 10 प्रतिशत ही है. वर्ष 2020 में जब अनंत सिंह राजद में थे तो जदयू तीसरे नंबर पर चली गई थी. अब अनंत सिंह के बिना जदयू मोकामा में लगभग शून्य पर है. भाजपा का कोर वोटर भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए के साथ रहे, लेकिन मोकामा-घोसवरी-पंडारक-बाढ़-लखीसराय-मुंगेर-बेगूसराय बेल्ट में 8 से 10 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां भूमिहार 15 से 35 प्रतिशत हैं. वर्ष 2023 जाति जनगणना के बाद ये वोटर और ज्यादा संगठित हुआ है.

जानकारों का माना है कि इस बेल्ट में दो तरह का बंटवारा होगा. पहला, बीजेपी का कट्टर सवर्ण वोटर एनडीए के साथ रहेगा. दूसरा, जो वोटर अनंत सिंह को भूमिहार अस्मिता के प्रतीक के तौर पर देखता है, वो उनके साथ शिफ्ट होगा. अगर अनंत सिंह जन सुराज या निर्दलीय होते हैं तो हर सीट पर 15 से 20 हजार वोट काटकर एनडीए का गणित बिगाड़ देंगे. वर्ष 2024 में बाढ़ लोकसभा में ललन सिंह की जीत का मार्जिन घटने के पीछे यही नाराजगी कही गई थी.

क्या अनंत सिंह का जनाधार बरकरार रहेगा?

जवाब है हां, और पहले से ज्यादा. जदयू से निष्कासन के बाद उन्हें सहानुभूति मिल रही है. मोकामा में उनकी पत्नी और उनके समर्थक इसे भूमिहार स्वाभिमान से जोड़ रहे हैं. जदयू ने एक जनाधार वाले नेता को खोकर एक बिना जनाधार वाले चेहरे नीरज कुमार को बचाया है. वहीं, जदयू में ललन सिंह और विजय कुमार चौधरी के अतिरिक्त अब कोई बड़ा भूमिहार चेहरा नहीं बचा. ललन सिंह खुद इस एक्शन के खिलाफ थे. उन्होंने कहा था कि अगर अनंत सिंह पर कार्रवाई हुई तो नीरज कुमार पर भी होनी चाहिए. इसलिए साफ है कि मोकामा सीट पर जदयू को सीधा नुकसान होगा, अनंत सिंह का पर्सनल वोट बैंक बरकरार रहेगा, और बाढ़, मोकामा, लखीसराय और मुंगेर बेल्ट में एनडीए के भूमिहार वोट में 30 से 40 प्रतिशत तक सेंध लग सकती है.



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