लोक गायिका माणिक्यम का छलका दर्द, पारंपरिक धुनों की चोरी का आरोप
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Telangana Folk Music, Song Theft Allegations: तेलंगाना की लोक गायिका माणिक्यम ने संगीत निर्माताओं पर पारंपरिक धुनों को चुराने का आरोप लगाया है. गायिका ने बताया कि भरोसा करके उन्होंने अपने कई लोकगीत रिकॉर्ड करके भेजे थे. निर्माताओं ने ‘गुंटूर पोथावाटा’ जैसे लोकप्रिय गीत की धुन बदलकर मुख्यधारा के गायक से गावाया. माणिक्यम को न स्टूडियो में गाने का वादा किया गया मौका मिला और न ही क्रेडिट मिला. यह घटना दर्शाती है कि कैसे ग्रामीण कलाकारों की प्रतिभा का इस्तेमाल कर उन्हें अधिकारों से वंचित रख दिया जाता है.
तेलंगाना: पारंपरिक लोक संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है. यह किसी भी समाज और संस्कृति की आत्मा, पहचान और ऐतिहासिक धरोहर होता है. भारत के ग्रामीण इलाकों में बसे कलाकार इन अनमोल गीतों और धुनों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी आवाज के जरिए जीवित रखते हैं. ये लोकगीत हमारे समाज की मिट्टी की सोंधी महक और जीवन के विभिन्न रंगों को समेटे हुए होते हैं. हालांकि आधुनिकता के इस दौर में जब इन सीधे-सादे और मासूम लोक कलाकारों की प्रतिभा का अनुचित इस्तेमाल किया जाता है और उन्हें हासिये पर धकेल दिया जाता है, तो यह कला और कलाकार दोनों के अस्तित्व के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन जाता है.
हाल ही में तेलंगाना की प्रसिद्ध लोक गायिका माणिक्यम के साथ हुई नाइंसाफी ने पूरे संगीत जगत को झकझोर कर रख दिया है. माणिक्यम के पास पारंपरिक लोकगीतों का एक समृद्ध खजाना है. उन्होंने संगीत उद्योग के इस कड़वे और काले सच को उजागर करते हुए अपना दर्द बयान किया है. गायिका ने बताया कि कुछ संगीत निर्माताओं ने उनसे संपर्क किया और उनकी सुरीली आवाज में पारंपरिक लोकगीतों की वॉयस रिकॉर्डिंग मांगी. माणिक्यम ने उन पर पूरा भरोसा किया और अपने कई अनमोल पारंपरिक गीत खुद गाकर रिकॉर्ड करके उन्हें भेज दिए.
‘गुंटूर पोथावाटा’ गीत की चोरी और वादाखिलाफी
गायिका माणिक्यम ने बताया कि बाद में उन्हें एक बहुत बड़ा झटका लगा. उन्हें पता चला कि उनके द्वारा भेजे गए गीतों के शब्दों और मूल धुनों में मामूली बदलाव करके उन्हें एक नए अंदाज में बाजार में जारी कर दिया गया. गायिका ने खास तौर पर बेहद लोकप्रिय पारंपरिक गीत ‘गुंटूर पोथावाटा’ का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि यह गीत उन्होंने पूरी लगन के साथ गाकर सुनाया था. लेकिन निर्माताओं ने उस धुन और रचना का इस्तेमाल करके किसी अन्य मुख्यधारा के गायक से उसे दोबारा रिकॉर्ड करवा लिया.
बिना श्रेय और पहचान के रह गए असली कलाकार
माणिक्यम ने यह गीत किसी आर्थिक लाभ या पैसे के लालच में नहीं दिया था. उन्होंने यह काम बिल्कुल मुफ्त में सिर्फ इस उम्मीद और भरोसे पर किया था कि उन्हें भविष्य में बड़े स्टूडियो में गाने का मौका मिलेगा. लेकिन समय बीतने के साथ निर्माताओं के सारे वादे पूरी तरह से झूठे साबित हुए. लोक गायिका को न तो आगे किसी गाने में अपनी आवाज देने का अवसर मिला और न ही उस लोकप्रिय गीत के लिए कोई उचित पहचान या श्रेय दिया गया. जब उन्होंने इस बारे में निर्माताओं से पूछने की कोशिश की तो उन्हें सिर्फ टालमटोल का सामना करना पड़ा.
लोक कला के संरक्षण के लिए न्याय जरूरी
माणिक्यम का यह छलकता हुआ दर्द आज देश के हर उस ग्रामीण लोक कलाकार की दुखद व्यथा को दर्शाता है, जिनकी वर्षों की कड़ी मेहनत और पारंपरिक रचनाओं से बड़े लोग नाम और पैसा कमा लेते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में असली कलाकार अपने वाजिब हक, सम्मान और पहचान के लिए तरसते रह जाते हैं. हमारी अमूल्य लोक कला को सही मायने में तभी बचाया जा सकता है, जब इसके असली और जमीनी कलाकारों को सही मंच, अधिकार और सम्मान दिया जाएगा.