OPINION: छोटे सरकार अनंत सिंह की JDU से छुट्टी, क्या तेजस्वी के ‘A to Z’ फॉर्मूले का बनेंगे ट्रंप कार्ड?

OPINION: छोटे सरकार अनंत सिंह की JDU से छुट्टी, क्या तेजस्वी के ‘A to Z’ फॉर्मूले का बनेंगे ट्रंप कार्ड?


Last Updated:

OPINION: बिहार में इस बार का विधानपरिषद चुनाव काफी गर्माहट वाला रहा. मोकामा से विधायक अनंत सिंह ने JDU के MLC प्रत्‍याशी नीरज कुमार का खुल्‍लम-खुल्‍ला विरोध किया. अब पार्टी ने उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्‍हें पार्टी से निष्‍कासित कर दिया है. उनके राजनीतिक भविष्‍य को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है.

पटना (25-10-2026). जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने अनंत सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. मोकामा विधायक को 6 साल के लिए पार्टी से बाहर निकालना बिहार की राजनीति में एक बड़ा मोड़ ला सकता है. राजनीति अगर-मगर के इर्द गिर्द ही घूमती है. इसलिए हर संभावना अनंत सिंह भी टटोल सकते हैं और तेजस्वी यादव भी. अगर तेजस्वी यादव उनके साथ हाथ मिलाते हैं, तो यह एनडीए से नाराज सवर्ण वोटों को जोड़कर समीकरण बदल सकता है. यह वोट बैंक एकजुट हो गया,तो राज्य में सत्ता का संतुलन बदलने में यह बहुत अहम साबित हो सकता है.

बिहार की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों और संख्या बल के बारीक तालमेल पर टिकी रही है. बिहार के जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में कुल सवर्ण आबादी लगभग 15.52% है. इनमें भूमिहारों की हिस्सेदारी 2.87%, ब्राह्मण 3.65%, राजपूत 3.45% और कायस्थ 0.6% हैं. संख्या के लिहाज से भले ही यह आबादी 15-16% के दायरे में सिमटी दिखती हो, लेकिन राज्य के आर्थिक, सामाजिक और चुनावी माहौल पर इसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा है. खासकर मोकामा, मुंगेर, लखीसराय और बेगूसराय जैसे टाल और दियारा क्षेत्रों में भूमिहार मतदाता किसी भी दल की हार-जीत तय करने की क्षमता रखते हैं.

भाजपा और सवर्ण का समीकरण

परंपरागत रूप से यह तबका एनडीए में भाजपा का स्थायी आधार माना जाता रहा है. लेकिन हाल के वर्षों में टिकट वितरण, सत्ता में उचित हिस्सेदारी और स्थानीय मुद्दों को लेकर सवर्णों के एक वर्ग में उपेक्षा का भाव पनपा है. अनंत सिंह सिर्फ एक बाहुबली नेता नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र में इस वर्ग के एक बड़े राजनीतिक प्रतीक के तौर पर जाने जाते हैं. जेडीयू से उनकी विदाई ने एनडीए के इस पारंपरिक गढ़ में दरार पैदा कर दी है.

तेजस्‍वी यादव का BAAP फॉर्मूला

तेजस्वी यादव काफी समय से ‘माई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण से आगे बढ़कर ‘BAAP’ (बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी और पुअर यानी गरीब) और ‘ए टू जेड’ की समावेशी राजनीति की बात कर रहे हैं. राज्य में मुस्लिम (17.7%) और यादव (14.26%) का आधार पहले से ही मजबूत है. ऐसे में यदि अनंत सिंह के जरिए सवर्णों, खासकर भूमिहार मतदाताओं का 2 से 3 प्रतिशत वोट भी महागठबंधन की तरफ झुकता है, तो यह कड़े मुकाबले वाली कई सीटों पर एनडीए का गणित बिगाड़ सकता है.

अगड़ा बनाम पिछड़ा का नैरेटिव होगा धवस्‍त?

यह संभावित गठबंधन अगर जमीन पर उतरता है, तो बिहार में वर्षों से चले आ रहे ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ का पुराना नैरेटिव ध्वस्त होकर एक नया सामाजिक और चुनावी ढांचा तैयार कर सकता है. और ऐसा प्रयास बिहार के लिए नया नहीं होगा. एक जमाने में रामविलास पासवान ने इस तरह की कोशिश की थी और 2005 फरवरी के चुनाव में सबसे ज्यादा 29 सीटें लोजपा की झोली में आई थी.



Source link