नैनीताल: उत्तराखंड के पहाड़ों में मौसम बदलने के साथ ही लोगों की जीवनशैली में भी बदलाव आने लगता है. खासकर सरोवर नगरी नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव के बाद जब ठंड बढ़ने लगती है, तो यहां के खानपान, रहन-सहन और दिनचर्या में कई तरह के परिवर्तन देखने को मिलते हैं. सर्दियों में लोग गर्म कपड़ों के साथ ही पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों, स्थानीय उत्पादों और मौसमी खाद्य पदार्थों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने लगते हैं. वहीं, शाम को जल्दी घर लौटने और रात में जल्दी सोने की आदत भी बढ़ने लगती है. पहाड़ों की यह बदलती जीवनशैली यहां की संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है.
नैनीताल स्थित डीएसबी परिसर में समाजशास्त्र विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सरोज पालीवाल के मुताबिक, नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव और नवरात्र के बाद मौसम में बदलाव महसूस होने लगता है. तापमान गिरने के साथ ठंड बढ़ती है, जिसके चलते लोगों की दिनचर्या भी बदलने लगती है. कभी खिली धूप तो कभी आसमान में बादलों की आवाजाही के बीच बारिश और ओलावृष्टि ठंड का असर और बढ़ा देती है. ठंड बढ़ने पर स्थानीय लोग धूप में बैठना पसंद करते हैं. नैनी झील के आसपास खूबसूरत नजारे देखने के लिए भी लोगों की आवाजाही बनी रहती है. वहीं, बाजारों में गर्म कपड़ों की रौनक बढ़ने लगती है, लोग स्वेटर, जैकेट और गर्म कपड़ों के साथ खुद को ठंड से बचाने की तैयारी करते दिखाई देते हैं.
सर्दियों में बदल जाता है पहाड़ का खानपान
मौसम में बदलाव का सबसे अधिक असर लोगों के खानपान पर दिखाई देता है. सर्दियां शुरू होते ही स्थानीय लोग पारंपरिक पहाड़ी भोजन को अपनी डाइट में अधिक शामिल करने लगते हैं. भट्ट की चुड़कानी, डूबके, चैस और मौसमी हरी सब्जियां पहाड़ी रसोई का अहम हिस्सा बन जाती हैं. इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली दालों और पारंपरिक खाद्य उत्पादों के प्रति भी लोगों का रुझान बढ़ता है.
डॉ. सरोज पालीवाल के मुताबिक मौसम के साथ खानपान में बदलाव पहाड़ की जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरूक हो रहे हैं और स्थानीय व ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देने लगे हैं. ठंड के मौसम में कई परिवार हल्दी वाला दूध जैसे पारंपरिक घरेलू विकल्पों को भी अपनाते है. सर्दी-जुकाम से बचाव के लिए गर्म कपड़े पहनने और गले को ढककर रखने पर भी जोर दिया जाता है.
मौसम के अनुसार बदलता है खाना
पहाड़ों की खाद्य संस्कृति में पारंपरिक बड़ियों का भी विशेष महत्व है. सर्दियों के लिए महिलाएं घरों में पहाड़ी ककड़ी और मूली की बड़ियां तैयार करती हैं. सर्दियों में जब ताजी सब्जियों की उपलब्धता या विविधता सीमित हो जाती है, तब इन बड़ियों से स्वादिष्ट सब्जी तैयार की जाती है. यह परंपरा पहाड़ों में खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने और मौसम के अनुसार भोजन तैयार करने की पारंपरिक समझ को दर्शाती है. इनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री के आधार पर प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व भी मिलते हैं. साथ ही पहाड़ों में मूंगफली भी सर्दियों के मौसम में खाई जाती है, जगह जगह बाजार में मूंगफली और गजक की दुकानें देखने को मिलती हैं.
जल्दी घर लौटना और सोने-जागने का समय भी बदलता है
ठंड बढ़ने के साथ लोगों की दिनचर्या में भी बदलाव आता है. शाम होते ही तापमान गिरने लगता है, जिसके कारण स्थानीय लोग जल्दी घर लौटना पसंद करते हैं. रात में जल्दी सोने और सुबह की दिनचर्या को मौसम के अनुसार व्यवस्थित करने का चलन भी बढ़ जाता है. इस दौरान लोग धूप सेंकने और ठंड से बचाव के उपायों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करते हैं.
डॉ. सरोज पालीवाल के अनुसार, पारंपरिक खानपान के साथ स्थानीय समुदायों में पीढ़ियों से प्रचलित औषधीय ज्ञान और उपचार पद्धतियों, यानी एथ्नोमेडिसिन, के प्रति भी लोगों का झुकाव देखने को मिलता है. यह ज्ञान पहाड़ी समाज की परंपराओं और प्रकृति के साथ उसके पुराने संबंधों का हिस्सा है, नैनीताल में सर्दियों का आगमन केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि पहाड़ की पूरी जीवनशैली में परिवर्तन होना है. पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों से लेकर धूप सेंकने, गर्म कपड़े पहनने और दिनचर्या बदलने तक, यहां की जिंदगी मौसम के साथ अपना नया रंग ले लेती है. सर्दियों में पहाड़ जरूर घूमें और कड़कड़ाती ठंड के साथ यहां की साधारण जीवन शैली को और करीब से देख सकते हैं.